जब यह खबर आयी की प्रधान मंत्री रंगून जायगे और वहाँ बहादुए शाह जफ़र की मजार पर चादर चढाएंगे तो संघी घराने ने फिर वही राग राग अलापा ‘बाबर की औलाद ‘ हमने बाबर की एक औलाद का जिक्र किया है .. रो रहा था लिख रहा था ..
संघी घराने का कोई लिखित दस्तावेज नही है …लेकिन हर साल इनके कुछ उत्तेजक नारे निकल आते हैं और कुछ देर बाद खुद ब खुद मिट जाते हैं, लेकिन इनके कमजर्फ रंगरूट उसे चलाते रहते हैं. इसी में से एक नारा निकला था ‘बाबर की औलादें ‘. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद यह नारा जूनून के साथ आया और चल पड़ा . बाबर इतिहास् से निकल कर खलनायक बन गया और मुसलमान बाबर की औलाद. मै उस विषय में फिलहाल नहीं उलझना चाहता कि भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास ‘इतिहास बोध ‘ के साथ कब लिखा जाएगा या अंग्रेजों के लिखे इतिहास का अनुवाद हमारे इतिहासकार करते चले जायंगे ? बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को जो वसीयत दी है उसमे हुमायूं के लिए नसीहत भी है. ‘अगर भारत में हुकूमत करनी है तो यहाँ के सभी धर्मो का आदर करना होगा ‘ ( बाबर के इस वसीयतनामे का सबसे खूबसूरत तर्जुमा जयपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘अनौपचारिका’ में संपादक भाई रमेश थानवी ने प्रकाशित किया है उसे आप देख सकते हैं ) समूची मुग़ल सल्तनत बाबर के इस फरमान के साथ ही चली है और उस सल्तनत ने अपने को कभी भी विदेशी नहीं माना.
अभी एक खबर छपी है कि भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह मुग़ल सल्तनत के आख़िरी बादशाह और स्वतंत्रता सेनानी बहादुर शाह जफ़र के मजार पर चादर चढाने रंगून जाएंगे. कुल एक सौ पचास साल हुए बहादुर शाह जफ़र को मरे हुए. १८५७ के ग़दर के बाद बहादुर शाह जफ़र को गिरफ्तार करके रंगून भेज दिया गया था और उनकी मौत भी वहीं हुई और वहीं दफना भी दिए गए.
इस बाबर की औलाद ने अपनी औलादों के कटे सिर अपनी आँखों से देखे थे जिसे अंग्रेजों ने कलम कर थाल में सजा कर बहादुर शाह जफ़र के पास भेजा था … तमाम तकलीफों के बावजूद वह अपने मुल्क से मोहब्बत करता रहा. नजरबंदी के दौरान बहादुर शाह जफ़र को लिखने के लिए कागद कलम तक नहीं दिया गया. कैदखाने की दीवार पर कोयले की मदद से जफ़र दर्ज होता रहा …जफ़र साहब लिखते है —”पढ़ने फातिहा कोइ आये क्यों/ कोइ चार फूल चढाने आये क्यों/ कोइ एक शमा जलाए क्यों /मै वो बेकसी का मजार हूँ. “अपनी बेबसी और अपने वतन से मोहब्बत जफ़र की रूह थीजो कहती है ‘लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में/ किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में/ कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें/ इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में / उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन/ दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में/ कितना है बदनसीब “ज़फ़र” दफ़्न के लिये/ दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में”. उसकी आख़िरी तमन्ना है अपने वतन पर जीने के लिए नहीं, न हुकूमत करने के लिए वह दफन होने के लिए अपने मुल्क में दो गज जमीन मांग रहा है …’
छ साल पहले उसी मजार के सामने फूल और मोमबती लिए लिए खड़ा एक शख्स बहादुर शाह जफ़र के सामने हाथ फैला कर कहता है .. जफ़र साहब यह बेकसी का मजार नहीं है अपने वतन की आजादी के लिए शहीद हुए एक सेनानी की मजार है .. इस पर फूल चढाने आया हूँ शमा जलाने आया हूँ ..भारत के करोड़ो लोंगो कीतरफ से आया हूँ .. यह थे भारत के पहले नागरिक डॉ कलाम .. राष्ट्रपति … कल वही प्रधान मंत्री जा रहें है चादर चढाने …
बाबर की औलाद रंगून में सो रहा है, जश्न यहाँ मन रहा है इमारत ढहा कर………………………..
चंचल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चित्रकार व समाजवादी कार्यकर्ता हैं।
Hastakshep.com is a joint venture of more than hundred journalists. We invite open and contradictory debate on various contemporary political, economic and social issues. Therefore, the views expressed in the articles published here are the views of the respective authors and they alone are responsible for this. Hastakshep.com need not subscribe to the views published in these articles.
Since this is an open platform for sound and serious debate, we publish articles from other sources as well, such as blogs, newspapers etc. in order to make them available at one platform. However, we mention their original source by courtesy of------. Hence, we also want other newspapers or media to mention Hastakshep.com as source, whenever they publish our articles.
Hastakshep.com is not responsible for any advertising information published on it. It is the exclusive responsibility of the advertiser. So please verify the genuineness of the advertisement yourself.
If you find any misleading or fictitious information, please bring into the notice of its editor via mail to amalendu.upadhyaya@gmail.com.
Ghaziabad Court shall have exclusive jurisdiction in the event of any dispute.
Posted by hastakshep
on 27/05/2012. Filed under आजकल.
You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0.
Both comments and pings are currently closed.
Socialize