क्या हम एक और बंटवारे की ओर बढ़ रहे हैं?
क्या 14 अगस्त को बंटवारे का दिन मनाने से पहले हमें देश के भीतर जारी नए 'विभाजनों' पर नजर डालनी चाहिए? डॉ. सुरेश खैरनार का एक ज्वलंत विश्लेषण पढ़ें।

14 अगस्त: बंटवारे की राजनीति या राष्ट्रीय एकता का सवाल?
- आजादी के 78 साल बाद: क्या सचमुच हम आज़ाद हैं?
- प्रवासी मज़दूर और दो करोड़ रोजगार का वादा
- बंगालियों की पहचान पर हमला या राजनीतिक रणनीति?
- 14 अगस्त को 'बंटवारे का दिवस' मनाने का क्या मतलब है?
- ध्रुवीकरण की राजनीति और भारत की अखंडता पर संकट
संघ, सावरकर और 'दो राष्ट्र सिद्धांत' की विरासत
क्या 14 अगस्त को बंटवारे का दिन मनाने से पहले हमें देश के भीतर जारी नए 'विभाजनों' पर नजर डालनी चाहिए? डॉ. सुरेश खैरनार का एक ज्वलंत विश्लेषण पढ़ें।
14 अगस्त बंटवारे का दिवस को मनाने के बहाने
आगामी 15 अगस्त को हमारी आजादी के 78 सालों बाद 28 % जनसंख्या को अपनी आजीविका चलाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह रोजगार के लिए जाना पड़ रहा है. हालांकि वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में बार-बार वादा किया था कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया तो वह हर साल दो करोड़ रोजगार देंगे। मतलब ग्यारह साल में 22 करोड़ बेरोजगार लोगों को रोजगार का वादा किया है तो फिर आज भी हमारे देश में अभी भी 28 % प्रतिशत बेरोजगारी का आकड़ा नहीं रहना चाहिए था. लेकिन फुटकर लोगों को रोजगार देने के प्रचार - प्रसार करने के कार्यक्रमों का प्रदर्शन करने के बजाय सार्थक प्रयास बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने की जगह अमानवीय हथकंडों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
बहुसंख्यक समुदाय को इकट्ठा करने के लिए भाजपा शासित राज्यों में बंगला भाषा बोलने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के मजदूरों को चुन - चुनकर, गैर भाजपा राज्यों से जिस बेरहमी से उठा कर, उनके सभी तरह के पहचान पत्रों को कब्जे में ले कर, और सबसे हैरानी की बात जिस मजबूरी से उन्हें अपने घरों से बाहर निकल कर जो भी मेहनत - मजदूरी करने के बाद बचाए हुए पैसा, तथा उनके मोबाइल फोन आदि कीमती सामान कब्जे में करने के बाद, उन्हें जबरदस्ती से उठाकर बंगला देश के सीमावर्ती इलाकों में छोड़ने की घटनाओं को लेकर कल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के सडकों पर लाखों लोगों के साथ इस तरह की भाजपा के तरफ से चल रही कार्रवाई के खिलाफ प्रोटेस्ट मार्च निकालने के लिए मजबूर होना पड़ा. क्या हमारे देश के प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री महोदय देश को धर्म भाषा तथा उनके खानपान तथा वेशभूषा को लेकर कर रही राजनीति से भारत की एकता और अखंडता के लिए भयावह स्थिति बनाते हुए, बवंडर के तरफ तो नहीं ना ले जा रहे ?
लॉक डाउन की घोषणा करने के बाद भारत के सभी हिस्सों से आज से पांच-छह साल पहले कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों को अपने पूरे परिवार के साथ माथे पर अपना संसार लेकर 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में लहूलुहान नंगेपाव चलने के विडियो और फोटो आज मेरे आंखों के सामने आने लगे हैं. वैसै ही अमेरिका में ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति की शपथ ग्रहण समारोह के तत्काल बाद ही अवैध प्रवासियों के नाम पर जो अमानवीय व्यवहार करते हुए, भारतीय मूल के लोगों को जंजीरों से हाथ-पैर बांधकर मालवाहक हवाई जहाजों में भर - भरकर भारत में कूड़े कचरे के जैसे डालकर जाने की हरकत पर तो भाजपा सरकार के किसी भी सदस्य या पदाधिकारी को एक शब्द भी बोलते या लिखते हुए नहीं देखा, लेकिन भारत में भाजपा शासित राज्यों में चल रहे बंगला भाषा बोलने वाले, तथा लुंगी पहनने वाले अल्पसंख्याक समुदाय के मजदूरों को चुन - चुनकर उठाकर बंगला देश की सीमा पार कराने का काम लगातार हो रहा है. क्या यही आप लोगों का ट्रंप को जवाब है ?
कल कोलकाता में ममता बनर्जी को लाखों लोगों के साथ इस मुद्दे पर जुलूस निकालना पड़ा. और सबसे हैरानी की बात पश्चिम बंगाल विधानसभा के विरोधी नेता सुवेंदु अधिकारी कह रहे हैं कि ममता बनर्जी अवैध घुसपैठियों को बचाने की कोशिश कर रही हैं. सुवेंदु के खुद के जिले से भी कुछ लोग हैं जिनके सब दस्तावेजों को दिखाने के बावजूद उन्हें बंगलादेशी करार देकर जबरदस्ती उठाकर किसी को विमान से तो किसी को अन्य वाहनों पर ले जाकर बंगला देश की सीमापार कर देने के दर्जनों उदाहरण देखकर, मैं बहुत ही दुःखद मनःस्थिति में यह लेख लिखने बैठा हूँ.
भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की राजनीति मंदिर - मस्जिद के विवादों के साथ गुजरात के दंगे से होते हुए मॉबलिंचिग, आर्टिकल 370, समान नागरिक संहिता, वक्फ संशोधन कानून से लेकर, हिजाब, गोहत्या बंदी, लवजेहाद, धर्मांतरण, और अब भाषा को लेकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. एक तरफ हिंदी भाषा की सख्ती, और दूसरी तरफ प्रवासी मजदूरों में सिर्फ बंगला भाषा बोलने वाले और विशेष रूप से मुस्लिम को देख कर की जा रही कारवाई से भाजपा क्या मैसेज देना चाहती है ?
पिछले साल के पंद्रह अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से झंडा फहराने के बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अब इसके आगे 14 अगस्त भारत के बंटवारे के दिवस के रूप में मनाया जायेगा. यह घोषणा की है. जिसका मैंने तहे-दिल से स्वागत करते हुए सवाल किया था. कि "सबसे पहले भारत का बटवारा क्यों हुआ ? और वह हिंदू मुस्लिम यह दो राष्ट्र के सिद्धांत पर आधारित हुआ है. जिसका मैने अपने उम्र के पंद्रह साल के पहले ही विरोध किया था. और मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी आरएसएस की शाखा में प्रवेश देने के लिए वरिष्ठों से पूछा था. कि "अगर आरएसएस अपने को अखंड भारत का कर्ता- धर्ता समझता है. तो हिंदुओं के अलावा अन्य धर्म के लोगों को भी शाखाओं में शामिल करना चाहिए. मेरे कुछ मुस्लिम मित्र भी शाखा में आना चाहते हैं. तो आप उन्हें शामिल करने के लिए टालमटोल कर रहे हों ? मेरे इस सवाल का जवाब देने के जगह मुझे ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. यह बात आरएसएस के स्थापना के पचास वर्ष के पहले की है. (1965-66) इस साल आरएसएस शताब्दी महोत्सव मनाने की तैयारियां कर रहा है. अगर आरएसएस को लगता होगा कि सौ साल पहले ही हमारी तरफ से शुरू की गई हमारी राजनीतिक ईकाई भाजपा सत्ता में आ गई है. लेकिन कौन सी कीमत देकर, आज भाजपा सत्ताधारी दल बना है ? आजादी के 78 सालों के सफर में. आज भारत धर्म तथा जाति और भाषाओं के मुद्दों पर जितना बंटा हुआ है, उतना इसके पहले कभी नहीं था.
आपातकाल के दौरान जेल में आरएसएस के भी सदस्य मेरे साथ जेल में बंद थे. उन्हें बार - बार कहा था कि "मैं सेक्युलर हूँ. लेकिन आप लोग तो हिंदुत्ववादी हो. तो जरूर हिंदुओं को संगठित करो. लेकिन कौन से हिंदुओं को ? डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने नासिक जिले के येवला में अक्तूबर 1936 मे "मैं हिंदु धर्म में पैदा जरूर हुआ. लेकिन मैं अपने मृत्यु के समय हिंदु के रूप में नहीं मरुंगा." ऐसी घोषणा करते हुए "सिर्फ रुके नहीं बीस साल बाद अक्तूबर के ही महीने में संघ स्थापना दिवस के ही दिन दशहरे को 1956 में नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों को साथ में लेकर बौद्ध धर्म की दीक्षा लिए हैं. इसलिए उस जगह का नाम आज दीक्षा भूमि है.
शिकागो के सर्वधर्म परिषद में जाने के पहले स्वामी विवेकानंद जी ने दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान कहा है कि "अगर मुस्लिम धर्म के और ख्रिस्चियन धर्म का प्रचार- प्रसार करने में तत्कालीन शासकों के की जोर-जबरदस्ती की भूमिका रही, यह गलत है. हमारे धर्म की जाति-व्यवस्था में ऊंच - नींच की वजह से ही ज्यादातर लोगों ने इस्लाम और ख्रिस्चियन धर्मों का स्वीकार किया है. यह गैरबराबरी जबतक रहेगी तब तक हिंदु धर्म का संगठन कैसे होगा ? सिर्फ 15 % ऊँची जाति के लोगों का संगठन करने से कभी भी हिंदु धर्म का भला नहीं होगा. और इसीलिए सतत ध्रुवीकरण करने के लिए ही बंगला भाषा बोलने वाले और मुख्यतः मुस्लिम समुदाय के मजदूरों के साथ जो बर्बर व्यवहार भाजपा शासित राज्यों में चल रहा है. वह अमानवीय और बहुसंख्यक समुदाय को गोलबंद करने के लिए अल्पसंख्यकों को हर जगह पर सताते हुए असुरक्षित मानसिकता में ढकेलने वाले सभी करतूतों की वजह से भारत को और एक बंटवारे की तरफ ले जाने की, तैयारी भाजपा और उसका मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर मैं सावधान करने के लिए ही यह प्रयास कर रहा हूं.
1947 के पंद्रह अगस्त को हमें कटा- छंटा भारत का स्वीकार क्यों करना पडा? 1923 में ही बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर ने 'हिंदुत्व' शीर्षक की किताब में लिखा है. कि हिंदु और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं, और उसी के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ है. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने सचमुच ही 14 अगस्त को बंटवारे के दिवस मनाने की घोषणा की है. तो सबसे पहले बचा - खुचा भारत को बचाने के लिये ध्रुवीकरण की राजनीति को तिलांजलि देनी होगी, तभी बंटवारे के दिवस को मनाने का औचित्य है.
डॉ. सुरेश खैरनार,
17 जुलाई 2025. नागपुर.


