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आपके लिये होगा, हमारे लिये समलैंगिकता का अधिकार न सबसे बड़ा मुद्दा है और न एकमात्र मुद्दा

Right to homosexuality is neither the biggest issue nor the only issue for us

जनसत्ता में प्रकाशित लेखक चित्रकार प्रभू जोशी के समलैंगिकता पर लिखे आलेख (Writer Prabhu Joshi's article on homosexuality, published in Jansatta) पर मेरी टिप्पणी पर फिल्म विशेषज्ञ प्रकाश के रे की प्रतिक्रिया मिली है। उनके मुताबिक प्रभू का लेख बेवकूफाना है। उन्होंने हम दोनों को थोड़ा बहुत पढ़ लेने की सलाह दी है, जिस पर आपत्ति हो ही नहीं सकती। अब छात्र जीवन की तरह तो हम पढ़ते ही नहीं हैं।

प्रकाश जी का लिखा हुआ भी अक्सर पढ़ लेता हूँ। उनका प्रशंसक भी हूँ। मूलतः वैकल्पिक मीडिया के साथियों को सम्बोधित टिप्पणी पर अभी सम्बंधित लोगों की प्रतिक्रिया आयी नहीं है। प्रकाश जी ने हमारे तुच्छ लेखन का नोटिस लिया है और प्रतिक्रिया देने की पहल भी कर दी, इसके लिये उनका आभार।

वैसे हम जनसत्ता में होते हुये जनसत्ता में छपने वाले बेवकूफाना आलेखों को सबसे ज्यादा झेलते रहते हैं, लेकिन प्रभू का यह आलेख बेवकूफाना नहीं है।

प्रकाश जी, प्रभू को नहीं जानते तो हमारी क्या बिसात। लेकिन उम्मीद है कि हिन्दी के गम्भीर पाठक प्रभूजी को अवश्य जानते होंगे।

प्रकाश जी ने हम दोनों को कम से कम सुप्रीम कोर्ट का फैसला पढ़ लेने की सलाह दी है। अति उत्तम। हालाँकि विधि विशेषज्ञ न होने के कारण हम उसका विश्लेषण कर पाने में असमर्थ हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बाकी दूसरे मामलों में हालिया जो आदेश पारित किया है और फैसले दिये हैं, उम्मीद है कि विद्वत जनों ने उन्हें भी पढ़ा होगा।

पाँचवीं और छठीं अनुसूचियों के सन्दर्भ में संवैधानिक रक्षा कवच की पुष्टि करते हुये खनन समेत तमाम विकास परियोजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण के लिये सुप्रीम कोर्ट ने जन सुनवाई अनिवार्य कर दिया है। लेकिन इस फैसले

को और भारतीय संविधान को,कानून का राज लागू करने के मुद्दे पर विमर्श क्यों नहीं हो रहा है, जबकि सारा देश समलैंगिकता पर बहस कर रहा है, हमारा मुद्दा दरअसल यही है।

The government has made it clear by making a statement in Parliament that the Aadhaar card is not mandatory

भारत सरकार ने संसद में बयान देकर साफ कर दिया है कि आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि बुनियादी नागरिक सेवाओं से आधार को नत्थी नहीं किया जाये। लेकिन बेशर्मी से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हो रही है। बंगाल विधानसभा ने असंवैधानिक आधार कार्ड के खिलाफ सर्वदलीय प्रस्ताव पारित किया है। फिर नाटो योजना आधार के तथ्य सीआईए के हवाले करने की खबर भी आयी है। लेकिन यह सार्वजनिक विमर्श का विषय नहीं है, हमें आपत्ति इस पर है।

जल जंगल जमीन आजीविका और नागरिकता से बेदखली के खिलाफ तमाम आदेश और फैसले सुप्रीम कोर्ट ने दिये हैं। मसलन, खनिज उसी का, जमीन जिसका। यह भी कोई मुद्दा नहीं है।

उम्मीद है कि लोग उन तमाम आदेशों और फैसलों को पढ़ चुके होंगे और आपकी प्रतिक्रिया की इस सन्दर्भ में भी प्रतीक्षा रहेगी।

Debate on homosexuality in Hindi.

समलैंगिकता के प्रश्न पर पूरा राष्ट्र एकमत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जाहिर है। आपके लिये और दूसरे विद्वतजनों के लिये यह मुद्दा सबसे बड़ा होगा, हमारे लिये नहीं है। हमारे लिये दूसरे मुद्दे ज्यादा जरूरी हैं, जिन पर कोई चर्चा ही नहीं हो रही है। हमारे लिये सरदर्द यह है कि समलैंगिकता पर खड़ा तूफान की आड़ में तमाम जनविरोधी कानून आर्थिक सुधारों के लिये सर्वदलीय सहति से संसद के भीतर या बाहर गिलोटिन हो जायेंगे।

हमारे लिये वर्ण वर्चस्वी जायनवादी महाविध्वंसक कॉरपोरेट राज का प्रतिरोध सबसे बड़ा मुद्दा है। लेकिन तमाम अर्थशास्त्रियों और बहुजन नायकों के लिये यह छनछनाता विकास ही स्वर्णकाल है। हमारे मुद्दे उनके मुद्दे नहीं हैं।

हमने समलैंगिकता को एकमात्र मुद्दा बनाने पर आपत्ति की है। इन मुद्दों पर समयानुसार प्रसंगानुसार बहस जारी रखने पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन जैसा कि प्रभूजी ने लिखा है कि किसी दुश्चक्र के जरिये ऐसे मुद्दे की आड़ में बाकी सारे मुद्दे सिरे से गायब करने की बुद्धिमत्ता पर हम सवालिया निशान लगा रहे हैं। मोनिका लिवनेस्की और पामेला बोर्डेस प्रसंगों को भी याद कर लें, ये फर्जी बहुचर्चित मुद्दे एकध्रुवीय कॉरपोरेट जायनवादी वैश्विक व्यवस्था बनाने में सबसे ज्यादा मददगार रहे हैं। आप इसे कोई समस्या नहीं मानते तो यह आपकी मर्जी।

ध्यान दिया होगा कि हमने फैसलों की टाइमिंग की बात की है। जानबूझकर यह मुद्दा बनाया जा रहा है। इस पर ध्यान जरूर दें। इस पर चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था में जरूर होनी चाहिए। लेकिन जैसे मीडिया में एकमेव मुद्दे की चर्चा होती है, बाकी मुद्दों को हाशिये पर डालकर, हमारी आपत्ति इसे लेकर है। इसीलिये हमने अपने वैकल्पिक मीडिया और सोशल मीडिया के लोगों को सम्बोधित किया है। जिनकी आलोचना की है, संयोग से वे सारे लोग मुझे बहुत प्रिय हैं और उनसे हम दूसरे मुद्दों पर भी विमर्श शुरु करने की उम्मीद पालते हैं। हो सकता है कि यह उम्मीद ही नाजायज हो। मुझे अफसोस है कि ऐसे प्रियमित्रों को चेताने के लिये मुझे कॉरपोरेट जाल में उलझने और उलझाने के यथार्थ का भी उल्लेख करना पड़ा।

जो हमसे असहमत हों, जनसत्ता में प्रभू जोशी का लेख पूरा दोबारा पढ़ लें। हमारे युवा पत्रकार मित्र अभिषेक ने इस प्रकरण में प्रकाश के रे की माँग के मुताबिक शायद बेहतर अध्ययन किया है। हम भले उतने पढ़ाकू न हों, लेकिन हनुमान संप्रदाय के लोग और भी हैं। यह आलेख पढ़कर बताये कि तमाम मुद्दों को हाशिये पर धकेलकर आप लोग संसद के सत्र के दौरान समलैंगिकता को एकमात्र मुद्दा बनाकर किसका एजेण्डा अमल में ला रहे हैं।

पलाश विश्वास

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के पॉपुलर ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना ।

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