विधानसभाई चुनाव : रुकेगा मोदीशाही का रथ !

विधानसभाई चुनाव : मोदी राज का कठिन इम्तहान पांच विधानसभाओं के चुनाव का मोदी राज के लिए महत्व मार्च-अप्रैल में होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनाव (Election of five assemblies) में मोदी सरकार की दूसरी पारी की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। जिन चार राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र के चुनाव के …
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विधानसभाई चुनाव : रुकेगा मोदीशाही का रथ !

विधानसभाई चुनाव : मोदी राज का कठिन इम्तहान

पांच विधानसभाओं के चुनाव का मोदी राज के लिए महत्व

मार्च-अप्रैल में होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनाव (Election of five assemblies) में मोदी सरकार की दूसरी पारी की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। जिन चार राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र के चुनाव के नतीजे तो 2 मई को आएंगे, उनमें लोकसभा की कुल सीटों का पांचवें से अधिक हिस्सा आता है। लेकिन, मोदी राज की इस परीक्षा का महत्व सिर्फ इसके आकार में ही नहीं है। इस परीक्षा का महत्व इससे भी बढ़ जाता है कि 2019 के अप्रैल-मई के आम चुनाव के बाद से हुए सभी विधानसभाई चुनावों में, भाजपा के प्रदर्शन में न सिर्फ उसके आम चुनाव के प्रदर्शन के मुकाबले खासी गिरावट देखने को मिली थी, कुल मिलाकर भी उसका प्रदर्शन कोई अच्छा नहीं रहा है।

पहले आम चुनाव के छ: महीने के अंदर-अंदर हुए हरियाणा, झारखंड तथा महाराष्ट के चुनाव में, भाजपा के हाथ से दो सरकारें तो निकल ही गयीं, जबकि हरियाणा में सरकार बनाने के लिए उसे जजपा के साथ गठजोड़ का सहारा लेना पड़ा। इसके चंद महीने बाद ही दिल्ली में हुए चुनाव में भाजपा एक बार फिर सत्ता के आस-पास पहुंचने में भी नाकाम रही, जबकि 2020 के उत्तरार्द्ध में हुए बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) में जदयू के नेतृत्व वाले गठजोड़ पर संतोष करने पर मजबूर होने बावजूद, सरकार भाजपा के गठजोड़ के हाथ से निकलते-निकलते बची।

अगर लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के मुकाबले उल्लेखनीय गिरावट का यही रुझान जारी रहता है, तो मोदी राज के लिए यह इम्तहान काफी कठिन होना चाहिए। इसके ऊपर से, किसानों के आंदोलन से लेकर बढ़ती बेकारी तथा महंगाई व खासतौर पर तेल के दाम में बढ़ोतरी तक और कोविड महामारी के सामने आयी मोदी सरकार की नाकामियों के भी चलते, मौजूदा केंद्र सरकार से लोगों के बढ़ते मोहभंग को और जोड़ लिया जाए तो, मोदी की अजेयता के आख्यान का इस इम्तहान से सुरक्षित निकलना मुश्किल है।

भाजपा के प्रतिकूल नतीजों से मोदीराज पर क्या असर होगा

भाजपा के प्रतिकूल नतीजों से न सिर्फ मोदी राज की सारी सत्ता का सीधे अपने हाथों में केंद्रीयकरण करने की मुहिम को धक्का लगेगा बल्कि इस धारणा को भी बल मिलेगा कि मोदी-शाह की भाजपा की अजेयता एक मिथक ही है बल्कि पिछले आम चुनाव में उसकी जीत जबर्दस्त जीत भी, पुलवामा-बालाकोट प्रकरण का ही चमत्कार थी।

नरेंद्र मोदी के लिए हार हजम करना आसान नहीं होगा

बेशक, यह कहा जा सकता है कि इन चुनावों में तो वैसे भी, भाजपा का बहुत ज्यादा दांव पर नहीं है। वास्तव में दक्षिण तथा पूर्व के इन राज्यों में, भाजपा की पहले भी कोई खास चुनावी उपस्थिति नहीं रही है। पांच विधानसभाओं में से सिर्फ असम में ही भाजपा के नेतृत्व में सरकार चल रही थी। बाकी सभी विधानसभाओं में भाजपा की मौजूदगी नाममात्र की ही थी। ऐसे में भाजपा के लिए इन चुनावों में तो ‘नथिंग टु लूज’ वाली स्थिति ही होगी। पर यह तथ्यात्मक रूप से भले ही सच हो, पर राजनीतिक रूप से कमोबेश ऐसी ही स्थिति के आस-पास का चुनावी नतीजा, नरेंद्र मोदी के लिए हजम करना आसान नहीं होगा। जाहिर है कि देश भर में सारा का सारा राजनीतिक मैदान खुद ही घेरने की मोदी की अति-महत्वाकांक्षा उन्हें आसानी से इस सचाई को हजम करने नहीं देगी कि उनके राज के करीब सात साल बाद भी, देश का ठीक-ठाक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो उनके और उनकी विभाजनकारी राजनीति की पकड़ से, व्यावहारिक मानों में बाहर है।

असम विधानसभा चुनाव 2021 | Assam Assembly Election 2021

         इसीलिए, यह महज संयोग नहीं है कि भाजपा ने न सिर्फ असम की अपनी सरकार बचाने के लिए अपने अकूत वैध-अवैध संसाधनों समेत अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, उसने बंगाल में पिछले आम चुनाव के अपने प्रदर्शन को विधानसभाई जीत में तब्दील करने की उम्मीद में, पूरा जोर लगा दिया है। इस अभियान में सीधे प्रधानमंत्री के सेनापतित्व में भाजपा-संघ ने अपनी हर तरह की सेनाएं झोंक दी हैं, जिसमें धनपतियों व आइटी सैल से लेकर केंद्र की जांच एजेंसियों तक की सेनाएं शामिल हैं।

खबरों के अनुसार, इस बंगाल विजय अभियान में प्रधानमंत्री मोदी ही कम से कम बीस सभाएं करने जा रहे हैं। राज्य के विधानसभाई चुनावों का सवा महीने में आठ चरणों में फैलाया जाना, बेशक इस योजना में मददगार होगा। इसके अलावा भाजपा तमिलनाडु तथा पुदुच्चेरी में भी अपनी जायज-नाजायज ताकत के सहारे और अन्नाद्रमुक व अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के कंधों पर सवार होकर, किसी तरह सत्ता में साझीदारी हासिल करने का दांव लगा रही है।

हां! केरल जरूर अपवाद है, जहां भाजपा अपनी महत्वाकांक्षाओं को विधानसभा में एक का आंकड़ा पार करने तक सीमित रखने पर मजबूर है। इस राज्य में अपनी बाद-बाकी की ऊर्जा वह वामपंथी एलडीएफ का रास्ता रोकने की कोशिश में, कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूडीएफ को पीछे से सहारा देने में लगाएगी।

वामपंथ ही भाजपा का दुश्मन नंबर वन है

आखिरकार, उसकी सरकार हिंदुत्ववाद और कार्पोरेट ताकतों के जिस गठबंधन का प्रतिनिधित्व करती है, वह यह कभी नहीं भूल सकता कि वामपंथ ही उसका दुश्मन नंबर वन है। उसके खिलाफ उससे कमतर दुश्मन की मदद करना भी तो, असली दुश्मनी निभाने का ही हिस्सा है!

मैट्रोमैन के नाम से प्रख्यात, श्रीधरन को रातों-रात भाजपा में शामिल कर, मुख्यमंत्री पद का भाजपा का उम्मीदवार घोषित करने के बाद, भाजपा का इस ऐलान से पांव पीछे खींचना, इस राज्य की सचाइयों को स्वीकार कर के अपने चुनावी लक्ष्यों में विनम्रता लाने से बढ़कर, पर्दे के पीछे से खेल जाने वाले खेल के तकाजों से ज्यादा संचालित लगता है। मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के बाद, चोरी-छिपे वोट हस्तांतरण के किसी सौदे के सहारे, अपनी सीटों की संख्या एक अंक में आगे ले जाना भी भाजपा के लिए मुश्किल हो जाता।

इसलिए, इन विधानसभाई चुनावों में न सिर्फ भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है बल्कि उसकी विभाजनकारी तथा ज्यादा से ज्यादा तानाशाहीपूर्ण होती, जनविरोधी राजनीति का विरोध, उसके विरोध में खड़ी राजनीतिक ताकतों को बहुत हद तक एकजुट भी कर रहा है।

मोदीशाही के विरोध की इस केंद्रीयता का ही सबूत है कि इसके बावजूद कि केरल में वामपंथ के नेतृत्व में एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व में यूडीएफ के बीच मुख्य मुकाबला है और दोनों ही पक्षों के लिए इस नतीजे का बहुत भारी महत्व है; अगर कांग्रेस, केंद्र शासित क्षेत्र पुदुच्चेरी को छोड़ दिया जाए तो, दक्षिण भारत में अपने नेतृत्व में इकलौती राज्य सरकार की संभावना के लिए लड़ रही है, तो सीपीआइ (एम) के नेतृत्व में वामपंथ फिलहाल अपनी इकलौती सरकार को बचाने के लिए लड़ रहा है। फिर भी केरल को छोड़कर, जहां भाजपा की कोई वास्तविक चुनौती है ही नहीं, शेष चारों विधानसभाओं के चुनाव में, न सिर्फ कांग्रेस और वामपंथ, भाजपा तथा उसके सहयोगियों के खिलाफ एक साथ हैं बल्कि उन्होंने भाजपा के मंसूबों को शिकस्त देने के लिए अन्य सभी विपक्षी क्षेत्रीय ताकतों को भी एकजुट करने का प्रयास किया है, ताकि भाजपाविरोधी वोट को ज्यादा से ज्यादा एकजुट किया जा सके।

         इसीलिए, अगर असम में भाजपा तथा उसके संगियों को चुनौती देने के लिए, कांग्रेस के नेतृत्व में एक प्रकार का महागठबंधन मैदान में उतरता नजर आ रहा है, तो तमिलनाडु में एआइडीएमके-भाजपा गठजोड़ को चुनौती देने के लिए लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर डीएमके के नेतृत्व में ऐसा ही महागठबंधन, मैदान में उतरने जा रहा है।

याद रहे कि लोकसभा चुनाव में डीएमके के नेतृत्व में जनतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष गठबंधन ने, 39 में से 38 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह भी गौरतलब है कि एक महत्वपूर्ण घटनाविकास में दिवंगत जयललिता की निकट सहयोगी शशिकला ने, जिनकी अनुपात से अधिक संपत्ति के मामले में जेल से रिहाई के बाद, राजनीति में वापसी से भाजपा को काफी उम्मीदें थीं, आखिरकार राजनीति से दूर ही रहने का एलान कर दिया है। इससे गठबंधन में अन्नाद्रमुक पर दबाव बनाने की भाजपा की ताकत घटेगी।

उधर पुदुच्चेरी में भी, जहां कांग्रेस की दक्षिण भारत की इकलौती सरकार को भाजपा ने उपराज्यपाल से लेकर दलबदल तक के हथकंडों से चुनाव से ऐन पहले गिराया है, कांग्रेस के नेतृत्व में ऐसी ही विपक्षी गोलबंदी होने की पूरी संभावना है।

. बंगाल में मुख्य मुकाबला मोदीशाही और उसके विरोध के बीच

. बंगाल में ध्रुवीकरण (Polarization in west bengal) पहली नजर में भिन्न नजर आने के बावजूद, वहां भी मुख्य संघर्ष मोदीशाही और उसके विरोध के बीच ही है। लेकिन, बंगाल की खासियत यह है कि वहां चल रही दीदीशाही से जनता इतनी त्रस्त है कि, बहुतों को मोदीशाही में निजात नजर आने लगी है। 2019 के आम चुनाव में भाजपा की असाधारण कामयाबी का यही मुख्य कारण था। उस चुनाव में भाजपा 40 फीसद से कुछ ज्यादा वोट लेकर, राज्य की 42 में से 18 सीटें जीतने में कामयाब हो गयी थी, जबकि वामपंथ और कांग्रेस, हाशिए पर खिसक गए थे।

बेशक, विधानसभा चुनावों में स्थिति अगर 2016 के विधानसभाई चुनाव जैसी नहीं होगी तो 2019 के लोकसभा चुनाव जैसी भी नहीं होगी। इस चुनाव में, वामपंथ के नेतृत्व में कांग्रेस समेत अनेक विपक्षी ताकतों का गठबंधन, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस, दोनों से ही लड़कर, बंगाल की जनता के सामने एक धर्मनिरपेक्ष-जनतांत्रिक विकल्प पेश कर रहा है। यह विकल्प सरकार बनाने तक पहुंच पाता है या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन पिछले विधानसभाई चुनाव के बाद के दौर में इस राज्य में भाजपा ने जिस तरह से सबसे बढ़कर प्रचार, पैसे तथा केंद्रीय शासन की ताकत के बल पर, इकलौते विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने की एक हद तक कामयाब कोशिश की थी, उसे जरूर गंभीर चुनौती मिलने जा रही है।

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की बड़े पैमाने पर खरीद के बावजूद भाजपा का, तिकोने मुकाबले में लोकसभा चुनाव का अपना प्रदर्शन दोहरा पाना भी बहुत मुश्किल होने जा रहा है। यह दूसरी बात है कि यह भाजपा नेताओं को राज्य की 292 में से 200 से ज्यादा सीटें जीतने के ढपोरशंखी दावे करने से रोकने नहीं जा रहा है।

इस तरह, विधानसभाई चुनाव का यह चक्र मोदीशाही के खिलाफ कायम होती जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, क्षेत्रीय ताकतों की उस बढ़ती एकता को ही रेखांकित करने जा रहा है, जो भारतीय राजनीति की सारी विविधताओं के बावजूद, मोदीशाही का रथ रोक सकती है और अंतत: रोकने जा रही है।                                                  

राजेंद्र शर्मा

विधानसभाई चुनाव : रुकेगा मोदीशाही का रथ !
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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