दो बूँद पानी : संक्रमण काल में तकनीक और मनुष्य के सम्बन्ध की कहानी

ख्वाजा अहमद अब्बास की फ़िल्में भारत की परिस्थतियों को बखूबी बयान करती हैं साथ ही उनकी फिल्मों के जरिये हम युवाओं को अपने समाज के इतिहास को जानने और समझने का मौका भी मिलता है।
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Syeda Saiyidain Hameed
 सारिका श्रीवास्तव

"ख्वाजा अहमद अब्बास को लाल बहादुर शास्त्री ने राजस्थान में पानी की समस्या पर केंद्रित फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया और इस तरह "दो बूँद पानी" फिल्म का निर्माण हुआ। यह जिक्र अब्बास ने खुद अपनी बायोग्राफी "आय एम नॉट एन आयलैंड" में किया है जिसका हिंदी और उर्दू अनुवाद "मैं जजीरा नहीं हूँ" बहुत ही जल्दी उपलब्ध होने वाला है जिसे शहला नकवी ने अनुदित किया है। पहले इस फिल्म में अब्बास साहब ने अमिताभ बच्चन के लिए "लम्बू इंजीनियर" का किरदार रचा गया था लेकिन तब तक अमिताभ व्यस्त अभिनेता बन चुके थे इसलिए उनकी जगह फिर किरण कुमार को फिल्म में लिया गया।  किरण कुमार की वह पहली फिल्म बनी।"  

फिल्म "दो बूँद पानी" पर चर्चा शुरू करते हुए डॉ सईदा हमीद ने यह बताया।

दरअसल 15 जुलाई 2021 को यूट्यूब और फेसबुक पर भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) द्वारा महान लेखक, पत्रकार, फिल्मकार ख़्वाजा अहमद अब्बास की रचनात्मकता पर केंद्रित कार्यक्रम श्रृंखला के दूसरे कार्यक्रम का प्रीमियर था जिसे देश और दुनिया में क़रीब 2000 लोगों ने देखा।

फिल्म पर चर्चा करते हुए सूफ़ीवाद की विद्वान, योजना आयोग की पूर्व सदस्य और ख्वाजा अहमद अब्बास की भतीजी डॉ. सईदा हमीद ने अब्बास चाचा के बारे में भी बताया।

उन्होंने कहा, "वे हमारे घर के "ह्यूमन डायनमो" थे। हम घर-भर के बच्चों के लिए वे सबसे डायनॉमिक शख्सियत थे। उनकी फिल्मों के प्रीमियर में हमारा पूरा परिवार आमंत्रित रहता था और हम सारे बच्चे फिल्म हिट होने की दुआएँ माँगते थे खासकर भारत और सोवियत संघ के रिश्तों पर बनी फिल्म "परदेशी (1957)" के प्रीमियर के बाद हमें दिल्ली के होटल मोती महल में दावत दी गई थी।"

इस ऑनलाइन आयोजन में अब्बास साहब पर केंद्रित 10 मिनिट की लघु फिल्म भी दिखाई गई जिसमें अली सरदार जाफरी, कृश्न चन्दर, राज कपूर, अमिताभ बच्चन आदि बहुत इज़्ज़त से अब्बास साहब को याद करते दिखाए दिए। गौरतलब है कि  राज कपूर की अधिकांश कामयाब फ़िल्में "आवारा", "श्री 420", "बॉबी", "हिना" आदि अब्बास साहब की ही लिखी हुई फ़िल्में थीं और बलराज साहनी से लेकर अमिताभ बच्चन, शबाना आज़मी, किरण कुमार जैसे अनेक कलाकारों को पहली बार फ़िल्मी परदे पर उन्होंने ही अवसर दिया था।  

इस फिल्म में मुख्य पात्र हैं गंगा और गौरी (जलाल आगा एवं सिमी ग्रेवाल अभिनीत)। फिल्म का मुख्य उद्देश्य है पानी समस्या। "पानी है तो जीवन है, पानी है तो जान है...दो बूँद पानी से इस मुर्दा जमीन में जान आ जावेगी।"

पानी के गंभीर मसले के साथ ही औरतों द्वारा किये जाने वाले श्रम को इस फिल्म के जरिये बताया है। यह फिल्म अभिनेता किरण कुमार की डेब्यू फिल्म थी। इस लम्बू इंजीनियर के जरिये अब्बास लोगों को संदेश देते हैं कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हमारा मुल्क, मुल्क के रहवासी चाहे वे किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या जाति के ही क्यों न हों; सब एक हैं, सबकी तकलीफें और सबकी मुक्ति का मार्ग एक हैं। हमें मिलकर इनका सामना करना होगा। पलायन और उसका दर्द सबके लिए समान होता है। इस फिल्म के गाने और डायलॉग लिखे प्रेम धवन और सरदार जाफरी ने।

कार्यक्रम में "दो बूँद पानी" फिल्म की व्याख्या के साथ अब्बास साहब से जुड़े अनजाने एवं रोचक प्रसंग साझा किये डॉ. सईदा हमीद (दिल्ली) ने। उनके साथ इस प्रस्तुति में तकनीक सहायक थीं ख्वाजा अहमद अब्बास मेमोरियल ट्रस्ट की कार्यक्रम समन्वयक और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की शोधार्थी सौम्या लाम्बा (दिल्ली) ने।

सौम्या ने कहा कि अब्बास साहब की फ़िल्में भारत की परिस्थतियों को बखूबी बयान करती हैं साथ ही उनकी फिल्मों के जरिये हम युवाओं को अपने समाज के इतिहास को जानने और समझने का मौका भी मिलता है।

कार्यक्रम के दूसरे प्रमुख चर्चाकार कवि व प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने ख्वाजा अहमद अब्बास के बारे में बताया कि वे न केवल फिल्मकार, उपन्यासकार, कहानीकार, पत्रकार थे बल्कि बड़े संगठनकर्ता भी थे तभी वे प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जननाट्य संघ के संस्थापकों में से एक रहे। उन्होंने अपने कला माध्यमों से समाजवाद के उच्चतम इंसानियत के मूल्यों को स्थापित करने की लगातार कोशिश की। सिमी ग्रेवाल और जलाल आग़ा अभिनीत  फिल्म "दो बूँद पानी"  1971 में बनी थी और इसे उस वर्ष राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला था। पानी की कमी, बाँध और इस सबसे प्रभावित होने वाला जीवन इस फिल्म के केन्द्र में है।

विनीत तिवारी ने सिनेमा जगत के मशहूर अदाकार दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि दिलीप कुमार बेहतरीन अभिनेता होने के साथ ही हिंदुस्तान की हिन्दुस्तानियत के लिए भी याद किये जायेंगे। उन्होंने अब्बास साहब दिलीप कुमार के एक साझा दिलचस्प प्रसंग का भी ज़िक्र किया और बताया कि अब्बास साहब ने खुद अपने बारे में लिखा है कि अपनी फिल्मों के टिकट मैं ही सबसे ज्यादा खरीदता हूँ। अब्बास साहब की बनाई हुई फ़िल्में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा सराही गईं लेकिन अपने देश में बॉक्स ऑफिस की कामयाबी उन्हें नहीं मिली। वे एक कर्ज से मुक्त होकर नई फिल्म बनाने के जूनून में आगे के क़र्ज़ में डूब जाते रहे।

डॉ. सईदा हमीद ने ख्वाजा अहमद अब्बास के शुरुआती दिनों और पारिवारिक जानकारियों को साझा करते हुए बताया कि अब्बास साहब ने अपनी 73 बरस की जिंदगी में 75 किताबें  लिखीं लेकिन उनकी मृत्यु के बाद हमारे पास उनकी केवल 8-10 किताबें ही थीं। हमारे पास न ही उनकी फिल्मों का प्रिंट था न ही कोई तस्वीरें उन्होंने सहेज कर रखी थीं। हमने कबाड़ियों, रद्दीवालों, परिचितों, दोस्तों की सहायता से उनका सारा रचनाकर्म एकत्रित किया।

सईदा जी ने विशेष रूप से उल्लेखित करते हुए बताया कि अब्बास साहब द्वारा गाँधी जी पर लिखी किताब "बैरिस्टर एट लॉ" भी हमने कबाड़ी से खरीदी। इस तरह ख्वाजा अहमद अब्बास ट्रस्ट बना। इसी ट्रस्ट के सहयोग से कश्मीर की इफत फातमा द्वारा ख्वाजा अहमद अब्बास पर केंद्रित 10 मिनिट की फिल्म जिसमें अब्बास के साथ ही सरदार जाफरी, कृश्न चन्दर की आवाज में कमेंट्री थी साथ ही लघु फिल्म के अंत में अमिताभ बच्चन बताते हैं कि जब वे फिल्म में काम पाने के लिए परेशान हो रहे थे और उनके लम्बे कद के कारण फिल्म में उन्हें काम नहीं मिल रहा था तब अब्बास साहब ने अपनी फिल्म "सात हिन्दुस्तानी" में उन्हें ब्रेक दिया था। सन 1980 में के. एन. नायर द्वारा लिए इंटरव्यूह के कुछ अंश भी इस फिल्म में थे। इस 10 मिनिट की फिल्म से ऐसा लगा कि फिल्म जगत में के. ए. अब्बास के नाम से पहचाने जाने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास हमारे आस-पास ही हैं। इस लघु फिल्म से अब्बास साहब द्वारा निर्देशित फिल्मों धरती के लाल, अनहोनी, आवारा, परदेशी, शहर और सपना के राजनीतिक, सामाजिक पहलुओं को जाना।

इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और वरिष्ठ रंगकर्मी तनवीर अख्तर ने कहा कि जिन बड़े लोगों का नाम हम बचपन में सुना करते थे, बड़े होने पर इप्टा से जुड़ने के बाद उन लोगों को करीब से मिलने, जानने, समझने का मौका मिला। यह हमें ऊर्जावान बनाता है। इप्टा ने हमेशा लोगों के हक और अधिकार, समस्याओं के सवाल को अपने नाटकों के जरिये उठाया है और आगे भी यह कायम रहेगा। जल-जंगल-जमीन हमारी मुख्य जरूरतों में से एक हैं और यह फिल्म भी इस तरह की समस्याओं पर ही केंद्रित है।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री, फिल्मकार, नाटककार और इस कार्यक्रम श्रृंखला की संकल्पनाकर डॉ जया मेहता ने कहा कि यह फिल्म साठ-सत्तर के दशक में बनी। वह राष्ट्र निर्माण का समय था। नेहरू जी और उनके सहयोगी देश निर्माण के जरिये लोगों के जीवन स्तर को सुधारने वाली योजनाएँ बनाने और उन्हें शीघ्र लागू करने में लगे थे, बड़े-बड़े बाँध बनाए जा रहे थे, उद्योगीकरण हो रहा था। यह वह दौर था जब डॉक्टर्स, इंजीनियर इत्यादि देश के लिए कुछ भी कर गुजरने के भाव से काम करते थे। उस समय जो राष्ट्र निर्माण के कार्य किये गए वे सबको ध्यान में रखकर ही किये गए थे लेकिन आज हम पाते हैं कि तब भी देश का असली निर्माण नहीं हुआ था। राजस्थान में उस समय बनी यह 600 किलोमीटर लम्बी नहर देश की सबसे लम्बी नहर थी जिसके जरिये पंद्रह लाख हेक्टेयर का रकबा सिंचित होता लेकिन आज हम पाते हैं कि उस समय जैसा और जो सोचा गया वह हकीकत में नहीं हुआ। जिस क्षेत्र से नहर निकली वहाँ बसाहट ही नहीं थी, जिन क्षेत्रों से नहर निकली वहाँ जल स्तर इतना बढ़ गया की आस-पास के  क्षेत्र डूब  में आ गए। क्योंकि तब यह पता ही नहीं था कि बड़े बांध से डूब क्षेत्र बढ़ जाता है। यह सवाल बाद में उठे लेकिन अब्बास साहब की दूरदर्शिता ये थी कि उन्होंने फिल्म की कहानी में मनुष्य और मनुष्यता को रखा, न कि तकनीक को। राष्ट्र का निर्माण मतलब राष्ट्र में रहने वाली समूची आबादी का विकास हो, सबको समान सुविधाएँ हासिल हों और अब्बास साहब अपनी फिल्मों के जरिये यही कहते नजर आते हैं। और आज मनुष्य-केंद्रित उस अधूरे राष्ट्र-निर्माण के अभियान को आगे बढ़ाना अब्बास साहब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश (लखनऊ) ने सबका धन्यवाद देते हुए कहा अब्बास साहब की फिल्मों के जरिये हम अपना नवीनीकरण कर रहे हैं। मुझे फ़िराक़ गोरखपुरी की नज्म यह याद आती है : "आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम असरों, जब उनको मालूम ये होगा कि तुमने फ़िराक़ को देखा है।"

राकेश ने कहा कि अब्बास साहब ने इस फिल्म के जरिये महिला सशक्तिकरण के सवाल को बहुत ही मुखर तरीके से रखा है। वे चाहते तो इस फिल्म के अंत में नायक को जीवित दिखा सकते थे लेकिन उन्होंने सामूहिक ख़ुशी के साथ यथार्थ में साथ चलने वाले दुःख को उपेक्षित नहीं किया। फिल्म अब्बास साहब की दूरदर्शिता की गवाह तो है ही साथ ही बहुत मार्मिक और मनुष्यता से भरी हुई है। उनकी इन फिल्मों के पुनरावलोकन से हम अपने आप को और साथ ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को समृद्ध करेंगे।

मुरादाबाद के लेखक मुशर्रफ अली ने कहा कि जिस तरह अब्बास साहब ने अपनी फिल्मों के जरिये आम जनता की परेशानियों को सामने रखा है आज इस तरह की फ़िल्में बनना बंद हो गई हैं। नोट बंदी के दौरान जिस तरह लोग अपनी छोटी-छोटी बचत के रुपयों को बदलवाने के लिए परेशान हुए इस तरह की अन्य समस्याओं को भी इसी तरह किसी फिल्म के जरिये सामने लाना जरूरी है।

इस ऑनलाइन कार्यक्रम में इप्टा की राष्ट्रीय सचिव उषा आठले (मुंबई), उर्दू के शायर अहमद बद्र (जमशेदपुर), दिल्ली से लेखिका-सम्पादिका अंतरा देवसेन, सहेली संगठन की कार्यकर्ता आशिमा, महिला फेडरेशन से जुड़ीं वरिष्ठ नारीवादी नेत्री साथी रंजना सेन, कोनीनिका, अरुणा सिन्हा, तिहाड़ जेल सुपरिटेंडेंट अजय भाटिया, वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय, इंटरनेशनल कार्टून मैगजीन के संपादक शरद शर्मा, अर्पिता (जमशेदपुर), इंदौर से विजय दलाल, अरविन्द पोरवाल, प्रमोद बागड़ी, सारिका श्रीवास्तव, प्रज्ञा सहाय आदि के साथ ही इप्टा और प्रलेस के देशभर के पदाधिकारी और फिल्मों में रूचि रखने वाले दर्शक और श्रोता शामिल हुए।

इस श्रृंखला का पहला कार्यक्रम 3 जुलाई 2021 को उनकी फ़िल्म "राही" पर केन्द्रित था जो चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूरों की ज़िंदगी पर केंद्रित थी। आगे इस श्रृंखला में फिल्म समीक्षक और शोधार्थी सुखप्रीत कहलों (दिल्ली) फिल्म "हिना" पर, जया मेहता और विनीत तिवारी (इंदौर) फिल्म "धरती के लाल" पर और अंजुम रजब अली (मुंबई) "आवारा" व् अन्य फिल्मों पर अपने वक्तव्य देंगे।

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