माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा, भाजपा का असली चेहरा उजागर

माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा भाजपा का असली चेहरा उजागर रायपुर, 02 दिसंबर 2019. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2012 के जून में हुए सारकेगुड़ा जनसंहार (Sarkeguda massacre) में प्रत्यक्ष रूप से शामिल सैनिक बलों और पुलिस के जवानों तथा इसके लिए जिम्मेदार उच्च अधिकारियों को …
 | 
माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा, भाजपा का असली चेहरा उजागर

माकपा ने की मांग : सारकेगुड़ा कांड के दोषियों पर चलाओ हत्या का मुकदमा

भाजपा का असली चेहरा उजागर

रायपुर, 02 दिसंबर 2019. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ष 2012 के जून में हुए सारकेगुड़ा जनसंहार (Sarkeguda massacre) में प्रत्यक्ष रूप से शामिल सैनिक बलों और पुलिस के जवानों तथा इसके लिए जिम्मेदार उच्च  अधिकारियों को बर्खास्त कर उन पर हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की (Sought to prosecute murder) है।

पार्टी ने यह भी मांग की है कि इस हत्याकांड का नक्सली मुठभेड़ (Naxalite encounter) के रूप में फ़र्ज़ीकरण करने के लिए जिम्मेदार केंद्र और राज्य की सरकार छत्तीसगढ़ की जनता विशेषकर बस्तर के आदिवासी समुदाय से माफी मांगे।

आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि इस हत्याकांड की न्यायिक जांच की रिपोर्ट सामने आने के बाद भाजपा और उसकी तत्कालीन राज्य सरकार का आदिवासीविरोधी चेहरा खुलकर सामने आ गया है। यह हत्याकांड आदिवासियों के खिलाफ राज्य प्रायोजित दमन और ‘सलवा जुड़ूम’ अभियान की सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने पीड़ित आदिवासी परिवारों को 50-50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग करते हुए टिप्पणी की है कि 2012 की घटना की 7 साल बाद रिपोर्ट आना और दोषियों के लिए अब भी सजा का इंतज़ार करना प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ संघर्ष कर रहे आदिवासी समुदायों के लिए ‘न्याय पाने के लिए अंतहीन इंतजार करना’ है। इस स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

माकपा नेता ने कहा कि राज्य में सत्ताबदल के बाद भी प्रशासन के आदिवासीविरोधी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि कांग्रेस सरकार भी भाजपा की कॉरपोरेटपरस्त नीतियों को ही आगे बढ़ा रही है।

उन्होंने कहा है कि यदि कांग्रेस आदिवासियों की समस्याओं के प्रति वास्तव में संवेदनशील हैं, तो वनाधिकार कानून, पेसा एक्ट और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को सही तरीके से लागू करें, ताकि उनके साथ सदियों से जारी ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को दूर किया जा सके।

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription