आकाशगंगा में दुर्लभ गर्म पराबैंगनी (यूवी) तारों की पहचान

Identification of rare hot ultraviolet (UV) stars in the galaxy आकाशगंगा : पृथ्वी की अपनी एक अलग मन्दाकिनी है नई दिल्ली, 22 जनवरी, 2021 : हमारा ब्रह्माण्ड तारों के करोड़ों समूहों से मिलकर बना है। इन समूहों को मन्दाकिनी (गैलेक्सी – Galaxy) कहा जाता है। पृथ्वी की भी अपनी एक अलग मन्दाकिनी है, जिसे ‘दुग्धमेखला’ …
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आकाशगंगा में दुर्लभ गर्म पराबैंगनी (यूवी) तारों की पहचान

Identification of rare hot ultraviolet (UV) stars in the galaxy

आकाशगंगा : पृथ्वी की अपनी एक अलग मन्दाकिनी है

नई दिल्ली, 22 जनवरी, 2021 : हमारा ब्रह्माण्ड तारों के करोड़ों समूहों से मिलकर बना है। इन समूहों को मन्दाकिनी (गैलेक्सीGalaxy) कहा जाता है। पृथ्वी की भी अपनी एक अलग मन्दाकिनी है, जिसे ‘दुग्धमेखला’ या ‘आकाशगंगा’ कहते हैं। एक नये अध्ययन में, भारतीय खगोलविदों (Astronomers) ने आकाशगंगा के आकर्षक दिखने वाले विशाल गोलाकार कलस्टर NGC2808 में दुर्लभ गर्म पराबैंगनी (यूवी) तारों को चिह्नित किया है। इस क्लस्टर के बारे में कहा जाता है कि इसमें सितारों की पाँच पीढ़ियां होती हैं।

दीप्ति एस प्रभु, अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम और स्नेहलता साहू सहित भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (आईआईए), बेंगलुरु (Indian Institute of Astrophysics) के वैज्ञानिकों की टीम ने इन सितारों को, भारत के पहले मल्टी-वेवलेंग्थ स्पेस उपग्रह एस्ट्रोसैट पर सवार अल्ट्रा-वॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (UVIT) का उपयोग करते हुए कैप्चर किया है। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2020 में, एस्ट्रोसैट ने अपनी कक्षा में पाँच साल पूरे किए हैं।

अल्ट्रा-वॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप से प्राप्त विशाल गोलाकार कलस्टर NGC2808 की तस्वीर

शोधकर्ताओं का कहना है कि “ये तारे जिनके आंतरिक कोर लगभग दृश्यमान हैं, उन्हें बहुत गर्म बनाते हैं। ये तारे, सूर्य  जैसा एक तारा बन जाने के अंतिम चरण में हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इन तारों के जीवन का अंत कैसे होता है, क्योंकि तेजी से घटित होने वाले इन चरणों में इनमें से बहुत-से तारे मौजूद नहीं पाए गए हैं, जो इस अध्ययन को महत्वपूर्ण बनाते हैं।”

आईआईए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत कार्यरत एक स्वायत्त संस्थान है।

डीएसटी द्वारा इस संबंध में जारी एक वक्तव्य में कहा गया है कि पुराने गोलाकार क्लस्टर, जिन्हें ब्रह्मांड के डायनासोर के रूप में संदर्भित किया जाता है, ऐसी उत्कृष्ट प्रयोगशालाएं हैं, जहां खगोलविद यह समझ सकते हैं कि कैसे तारे अपने जन्म और मृत्यु के बीच विभिन्न चरणों में विकसित होते हैं। आकाशगंगा के गोलाकार कलस्टर NGC2808 को केंद्र रखकर किए जा रहे अध्ययन में वैज्ञानिकों की कोशिश कुछ इसी तरह की है।

“क्लस्टर की शानदार अल्ट्रावॉयलेट (यूवी) छवियों के उपयोग से वैज्ञानिक अपेक्षाकृत ठंडे रेड जाइंट एवं अन्य तारों और गर्म पराबैंगनी-चमकीले तारों में अंतर करते हैं। इस अध्ययन के निष्कर्षों को ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल’ शोध पत्रिका में प्रकाशन के लिए स्वीकृत किया गया है। वैज्ञानिकों ने यूवीआईटी डेटा को दुनिया की अन्य प्रमुख दूरबीनों से प्राप्त डेटा से जोड़कर समायोजित रूप से पेश किया है। इस दौरान हबल स्पेस टेलीस्कोप और गाया टेलीस्कोप जैसे अन्य अंतरिक्ष मिशनों के साथ-साथ जमीन पर आधारित ऑप्टिकल अवलोकनों से प्राप्त तथ्यों का इस शोध में उपयोग किया गया है।

इनमें से एक पराबैंगनी प्रकाश से चमकने वाला तारे को सूर्य से तीन हजार गुना अधिक चमकीला पाया गया है, जिसकी सतह का तापमान लगभग एक लाख केल्विन है। इन तारों के गुणों को केंद्र में रखकर वैज्ञानिक इनके जन्म एवं विकासक्रम को समझने का प्रयास कर रहे हैं।

जानिए भारतीय ताराभौतिकी संस्थान के बारे में

भारतीय ताराभौतिकी संस्थान देश का एक प्रमुख संस्थान है, जो खगोल ताराभौतिकी एवं संबंधित भौतिकी में शोधकार्य को समर्पित है। इसका उद्गम मद्रास (चेन्नै) में 1786 में स्थापित की गई एक निजी वेधशाला से जुड़ा है, जो वर्ष 1792 में नुंगम्बाकम में मद्रास वेधशाला के रूप में कार्यशील हुई।

वर्ष 1899 में इस वेधशाला को कोडैकनाल में स्थानांतरित किया गया। 1971 में कोडैकनाल वेधशाला ने एक स्वायत्त संस्था भारतीय ताराभौतिकी संस्थान का रूप ले लिया।

संस्थान का मुख्यालय कोरमंगला, बेंगलूर में अपने नए परिसर में वर्ष 1975 में स्थानांतरित हो गया।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अवलंब से संचालित यह संस्थान आज देश में खगोल एवं भौतिकी में शोध एवं शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र बन गया है। संस्थान की प्रमुख प्रेक्षण सुविधायें कोडैकनाल, कावलूर, गौरीबिदनूर एवं हान्ले में स्थापित हैं।

(इंडिया साइंस वायर)