जलवायु परिवर्तन की स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र पर पड़ेगी सबसे बड़ी मार, रहना होगा तैयार : विशेषज्ञ

जलवायु परिवर्तन और सेहत पर पड़ने वाले उसके प्रभावों के विषय पर विभिन्न विचार-विमर्शों के लिये स्वास्थ्यकर्मियों को तैयार करने के उद्देश्य से बनाया गया अपनी तरह का पहला दस्तावेज ‘No Vaccine for Climate Change’ नयी दिल्ली, 15 जून 2021 : हेल्दी एनर्जी इनीशिएटिव इंडिया (Healthy Energy Initiative India) ने स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अन्य …
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जलवायु परिवर्तन की स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र पर पड़ेगी सबसे बड़ी मार, रहना होगा तैयार : विशेषज्ञ

जलवायु परिवर्तन और सेहत पर पड़ने वाले उसके प्रभावों के विषय पर विभिन्‍न विचार-विमर्शों के लिये स्‍वास्‍थ्‍यकर्मियों को तैयार करने के उद्देश्‍य से बनाया गया अपनी तरह का पहला दस्‍तावेज

‘No Vaccine for Climate Change’

नयी दिल्‍ली, 15 जून 2021 : हेल्दी एनर्जी इनीशिएटिव इंडिया (Healthy Energy Initiative India) ने स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े अन्य संगठनों के सहयोग से अपनी तरह का पहला मार्गदर्शक दस्तावेज जारी किया है। ‘नो वैक्सीन फॉर क्लाइमेट चेंज- अ कम्युनिकेशन गाइड ऑन क्लाइमेट एंड हेल्थ फॉर द हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स इन इंडिया’ नामक इस दस्तावेज का उद्देश्य स्वास्थ्य कर्मियों को जलवायु परिवर्तन और मरीजों तथा समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले उसके असर के बारे में विभिन्न विचार-विमर्श करने और मीडिया, विधायिका तथा नीति निर्धारकों जैसे हितधारकों को प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करना और संचार संबंधी विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करना है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स ने आयोजित किया था वेबिनार

क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा मंगलवार को आयोजित वेबिनार में इस दस्तावेज पर व्यापक चर्चा की गई। इस वेबिनार में विश्व स्वास्थ्य संगठन के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट की निदेशक डॉक्‍टर मारिया नीरा, क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ट, लंग केयर फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी डॉक्टर अरविंद कुमार, डॉक्टर्स फॉर यू के संस्थापक डॉक्टर रवि कांत सिंह और मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की उपाध्यक्ष डॉक्टर मौली मेहता तथा छत्तीसगढ़ केरल और कर्नाटक के जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य से संबंधित नोडल अधिकारियों, क्रमशः डॉक्टर कमलेश जैन, डॉक्टर मनु एम एस और डॉक्टर वीना वी ने हिस्सा लिया।

Climate change and its effects on health

डॉक्टर्स फॉर यू के संस्थापक डॉक्टर रविकांत सिंह ने कहा

जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले उसके प्रभावों से निपटने के लिए जरूरी कदमों को बढ़ावा देने के लिहाज से एक स्वास्थ्य कर्मी की आवाज बेहद महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य कर्मी बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं। वे अपने मरीजों के साथ, अपनी प्रैक्टिस में, चिकित्सा संस्थानों में और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने समुदाय और नीति निर्धारक वर्ग में काम करके बहुत बड़ा फर्क पैदा कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन से निपटने की कार्यवाही करने से हमें अपने स्वास्थ्य से संबंधित सबसे बेहतरीन अवसर मिलते हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनेक समाधानों से समुदायों का माहौल और आम जनता का स्वास्थ्य बेहतर होता है। साथ ही साथ सेहत संबंधी असमानताओं में भी कमी आती है। अपनी तरह के इस पहले मार्गदर्शक दस्तावेज ‘नो वैक्सीन फॉर क्लाइमेट चेंज- अ कम्युनिकेशन गाइड ऑन क्लाइमेट एंड हेल्थ फॉर द हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स इन इंडिया’ को स्वास्थ्य कर्मियों को सूचना देने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया है। हमारे सामने एक अनोखा अवसर है जिससे हम लोगों को यह समझा सकेंगे कि वह प्रदूषण जिससे सांस संबंधी सेहत पर असर पड़ता है, उसी की वजह से जलवायु परिवर्तन भी होता है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि यह दस्तावेज स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्बन मुक्त पद्धतियों और मूलभूत ढांचे को आगे बढ़ाने की पैरवी करता है।”

Interrelationships between water, air pollution and health | मौतों का कारण बन रहा है जलवायु परिवर्तन

उन्‍होंने कहा कि जलवायु प्रदूषण और स्वास्थ्य के आपसी संबंधों को स्पष्ट करने की अब कोई जरूरत नहीं है। दरअसल हम प्रदूषण के कारण पैदा हुए नरक में जी रहे हैं। फ्रंटलाइन डॉक्टर के रूप में हम देख रहे हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों में जलवायु परिवर्तन कितना जानलेवा बनता जा रहा है। इसकी वजह से बहुत सारी विषमताएं पैदा हो रही हैं। जलवायु परिवर्तन मौतों का कारण बन रहा है। ज्यादातर इमरजेंसी मामले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण से जुड़े रहते हैं। एक लिहाज से देखें तो कोविड-19 का सकारात्मक असर रहा है कि लोग स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने की बात करने लगे हैं।

डॉक्‍टर रविकांत ने सुझाव देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों को चिकित्सा विज्ञान पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। इस वक्त ऐसा कोई भी विषय मेडिकल पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है। दूसरा सुझाव यह है कि हमें अपने प्राथमिक और सेकेंडरी स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों को मजबूत करना होगा। अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में हमें बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं को बहुत बेहतर करना होगा। हालात को देखते हुए हमें जिला स्तर तथा प्राइमरी और सेकेंडरी लेवल पर बड़ा स्वास्थ्य ढांचा तैयार करना होगा। इसके अलावा खतरे के क्षेत्रों में स्थित स्वास्थ्य सुविधाओं की क्षमता और समय के साथ उनमें पैदा हुई आवश्‍यकताओं का फिर से आकलन करना होगा। हमारे देश के निचले क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की योजना बहुत खराब तरीके से तैयार की गई है। दुनिया के सामने तरह तरह की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां आ रही हैं। खासकर भारत के सामने हालात विकट होते जा रहे हैं। इस वजह से हमें नए हालात को देखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं का फिर से आकलन करना होगा। अब महज बातें करने का वक्त नहीं बल्कि काम करने का समय है। अब हमें खुद के बजाय समाज और देश के बारे में सोचना होगा।

यह दस्तावेज भारत में जलवायु परिवर्तन को लेकर स्वास्थ्य संबंधी पेशेवर लोगों की जानकारी के स्तर, रवैये तथा प्रैक्टिस को लेकर किए गए अब तक के सबसे बड़े अध्ययन का नतीजा है। फरवरी 2021 में जारी इस अध्ययन के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि जहां 93% स्वास्थ्य कर्मी और पेशेवर लोग जलवायु परिवर्तन की मूलभूत बातों से वाकिफ हैं, वहीं उनमें से सिर्फ 55% लोग ही जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता बढ़ाने या जलवायु परिवर्तन संबंधी गतिविधियों और कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। इन स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा दी गई प्रतिक्रिया के आधार पर इस अध्ययन में कुछ सिफारिशें की गई हैं, जिनमें स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवर लोगों तथा वकीलों की क्षमता का प्रभावी निर्माण करना शामिल है। साथ ही इस दस्तावेज में उन विभिन्न रास्तों के बारे में बारीक जानकारियां उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है जिनके जरिए जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। दस्तावेज में यह भी सिफारिश की गई है कि जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले उसके प्रभावों को चिकित्सा पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। स्वास्थ्य पेशेवर लोगों को जलवायु संबंधी संधियों को लेकर हुए अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदानों, खास तौर पर पेरिस समझौते के बारे में आसानी से समझ में आने वाले तरीके से सूचना और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। साथ ही जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य पर राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की कार्य योजनाओं के बारे में भी विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के पब्लिक हेल्थ विभाग की निदेशक डॉक्टर मारिया नीरा ने कहा

“जहां तक आम लोगों की सेहत की सुरक्षा का मामला है तो स्वास्थ्य संबंधी पेशेवर लोग भरोसेमंद संचार वाहक होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण कर्ता-धर्ता भी होते हैं, लेकिन इस खासियत का पूरा इस्तेमाल सिर्फ तभी किया जा सकता है जब उन्हें 21वीं सदी की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संबंधी चुनौती यानी जलवायु परिवर्तन और उससे निपटने के तरीकों के बारे में जरूरी जानकारी मुहैया कराई जाए।’’

उन्‍होंने कहा

‘‘इस बात से कौन इनकार करेगा कि आज जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक खतरे पर बात करने की सबसे ज्यादा जरूरत है। स्वास्थ्य पेशेवरों को आगे आकर उदाहरण पेश करना होगा आज हमारी लड़ाई सांस लेने लायक हवा की मौजूदगी सुनिश्चित करने को लेकर है। हमें इससे पहले कभी ऐसे संघर्ष की जरूरत नहीं पड़ी थी लेकिन दुर्भाग्य से आज हालात कुछ ऐसे ही आन पड़े हैं। मेरा मानना है कि इस दिशा में अगर स्वास्थ्य पेशेवर लोग आवाज उठाएं और जागरूकता फैलाएं तो उसकी विश्वसनीयता कहीं ज्यादा होगी। यह एक महत्वपूर्ण योगदान भी होगा। साथ ही यह हमारे समाज और नीति निर्धारकों के लिए कहीं ज्यादा प्रेरणाप्रद होगा। इससे ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को अपनाने की जरूरत का समर्थन करने वाली आवाजें मजबूत होंगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम कुदरत, पारिस्थितिकी और जैव विविधता को बर्बाद करने की मूर्खतापूर्ण हरकतों के खिलाफ एक बड़ी आवाज बनें। मुझे लगता है कि अगर स्वास्थ्य पेशेवर एक साथ मिलकर आवाज उठाएं तो यह एक बहुत ही प्रभावशाली उपकरण बनेगा जिसे हम सीओपी26 में इस्तेमाल कर सकते हैं। कल जी-7 की बैठक हुई। इसके बाद और भी कई महत्वपूर्ण बैठकें होनी हैं, ऐसे में तमाम स्वास्थ्य पेशेवरों को बहुत मजबूत आवाज बनना होगा। किसी भी स्वास्थ पेशेवर को अपनी जिम्मेदारी और क्षमता को कम करके नहीं आंकना चाहिए। हमें दुनिया को यह दिखाना चाहिए कि हमारा नेटवर्क सबसे ज्यादा मजबूत है। हमारी कामयाबी भी इसी पर निर्भर करेगी।’’

डॉक्‍टर मारिया ने कहा कि नो वैक्सीन फॉर क्लाइमेट चेंज नामक इस मार्गदर्शक दस्तावेज का मकसद स्वास्थ्य कर्मियों को जलवायु परिवर्तन के संबंध में होने वाले विभिन्न विचार-विमर्शों और जलवायु परिवर्तन की वजह से उनके मरीजों तथा समुदायों की सेहत पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी देकर उन्हें तैयार करना है।”

इस मार्गदर्शक दस्तावेज में अध्ययन में उल्लिखित विभिन्न सिफारिशों को शामिल किया गया है और यह दस्तावेज स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का एक विस्तृत जायजा उपलब्ध कराता है जो जलवायु संबंधी घटनाओं जैसे कि भीषण तपिश, बाढ़, सूखा, चक्रवाती तूफान और वायु प्रदूषण के रूप में सामने आ सकते हैं। साथ ही इस दस्तावेज में इन प्रभावों को लेकर स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए जरूरी तैयारी पर भी विस्तार से रोशनी डाली गई है। इस दस्तावेज में जलवायु परिवर्तन के कारण शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों से संबंधित मूलभूत मुद्दों को शामिल किया गया है। साथ ही साथ यह दस्तावेज इस मुद्दे को लेकर स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रभावशाली नेतृत्वकर्ता और संचारकर्ता की भूमिका निभाने के लिए जरूरी हिदायतें भी देता है।

यह मार्गदर्शक दस्तावेज जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली आपदाओं की वजह से स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों से निपटने के लिए जरूरी उपाय भी सुझाता है। यह वे उपाय हैं जो स्वास्थ्य पेशेवर लोग अपने मरीजों, समुदायों और नीति निर्धारकों को सलाह के तौर पर बता सकते हैं। इस दस्तावेज में स्वास्थ्य प्रणालियों को लेकर भी सुझाव दिए गए हैं।

मानव सभ्यता के लिए इस सदी का सबसे बड़ा खतरा बन गया है जलवायु परिवर्तन : डॉक्टर अरविंद कुमार

लंग केयर फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी डॉक्टर अरविंद कुमार ने कहा

“जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के लिए इस सदी का सबसे बड़ा खतरा बन गया है। दुनिया जहां कोविड-19 महामारी से उबर रही है, हमें एक बार फिर याद आता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसे धरती के घाव भरने और भविष्य को सुरक्षित करने के अभियान में नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभानी होगी। स्वास्थ्य क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई और पैरोकारी में अग्रिम और केंद्रीय भूमिका में रखना ही होगा। भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र विभिन्न ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने और अक्षय ऊर्जा अपनाकर ग्रिड बिजली के उपभोग में कमी लाने संबंधी प्रदूषण मुक्त प्रौद्योगिकियों को अपनाते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में उल्लेखनीय योगदान कर सकता है। स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले लोगों के पास जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों और उसके खतरों से जुड़े विज्ञान के बारे में प्रभावशाली संचारकर्ता की भूमिका निभाने का भी अवसर है।”

उन्‍होंने कहा कि बड़े शहरों में प्रदूषण अपनी जगह बना चुका है। प्रदूषण का आलम यह है कि इन शहरों में रहने वाला हर व्यक्ति प्रदूषण के रूप में धूम्रपान करता है। यहां तक कि गर्भ में पल रहा बच्चा भी इससे अछूता नहीं है। इस बात के स्‍पष्‍ट प्रमाण हैं कि मां द्वारा सांस के तौर पर प्रदूषित हवा को शरीर में लिये जाने का असर गर्भ में पल रहे बच्‍चे पर भी पड़ता है। आमतौर पर हम सभी यही सोचते हैं कि वायु प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों पर पड़ता है, लेकिन दरअसल इसका असर हमारे दिल, दिमाग, गुर्दों, लिवर, अग्न्याशय, आंतों, मूत्राशय और हड्डियों समेत अनेक अंगों पर पड़ता है। बड़े शहरों में रहने वाले लोगों पर वायु प्रदूषण का असर कहीं ज्यादा होता है।

साफ हवा को मौलिक अधिकार बनाया जाए

डॉक्‍टर कुमार ने कहा

‘‘साफ हवा को मौलिक अधिकार बनाए जाने की जरूरत है। हालांकि यह काम बहुत साल पहले ही हो जाना चाहिये था। लापरवाही की वजह से ही हम आज सबसे बुरे हालात से घिर चुके हैं। हमारे बच्‍चों को इसके सबसे बुरे परिणामों का सामना करना पड़ेगा। अगर इसे रोकना है तो हमें अभी से काम करना होगा। प्रदूषण का एकमात्र कारण जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल है। हम सभी किसी न किसी रूप में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कर रहे हैं इसलिए हमें अगर भविष्य को बचाना है तो अक्षय ऊर्जा को अपनाना ही होगा।’’

Climate related health risks

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ट ने वेबिनार में कहा

‘‘स्‍वास्‍थ्‍य पेशेवर लोग बहुत महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दुनिया के 59 प्रतिशत देशों ने जलवायु अनुकूलन सम्‍बन्‍धी अपनी राष्‍ट्रीय संकल्‍पबद्धताओं में मानव स्‍वास्‍थ्‍य एक प्राथमिकता के तौर पर शामिल किया है। मगर वे स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ने वाले जलवायु संबंधी जोखिमों को समझ नहीं पा रहे हैं। वे यह नहीं जान पा रहे हैं कि आखिर इनसे कैसे निपटा जाए। साथ ही वे स्‍वास्‍थ्‍य अनुकूलन सम्‍बन्‍धी व्‍यापक कदमों की पहचान करने और उनके वित्‍तपोषण के लिये भी संघर्ष कर रहे हैं। यही वजह है कि सिर्फ 0.5 प्रतिशत बहुपक्षीय जलवायु वित्‍त में ही स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी परियोजनाओं को शामिल किया जाता है।’’

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