अब यह अमन चैन और वतन रिलायंस के हवाले लोगों

मुक्त बाजार का युद्धक अर्थव्यवस्था में कायाकल्प ही मेकिंग इन अमेरिका कारपोरेट हित में भारत पाक युद्ध और सीमा आर पार जनविरोधी कट्टरपंथ का आयोजन यह पलाश विश्वास कारपोरेट हित में भारत पाक युद्ध और सीमा आर पार जनविरोधी कट्टरपंथ का आयोजन यह। अब यह अमन चैन और वतन रिलायंस के हवाले लोगों। मुक्त बाजार …
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मुक्त बाजार का युद्धक अर्थव्यवस्था में कायाकल्प ही मेकिंग इन अमेरिका
कारपोरेट हित में भारत पाक युद्ध और सीमा आर पार जनविरोधी कट्टरपंथ का आयोजन यह
पलाश विश्वास
कारपोरेट हित में भारत पाक युद्ध और सीमा आर पार जनविरोधी कट्टरपंथ का आयोजन यह।
अब यह अमन चैन और वतन रिलायंस के हवाले लोगों।
मुक्त बाजार का युद्धक अर्थव्यवस्था में कायाकल्प ही मेकिंग इन अमेरिका।
भारत सरकार ने लंबे समय से अटकी पड़ीं रक्षा क्षेत्र की 33 परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। जिन कंपनियों के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है, उसमें रिलायंस एयरोस्पेस टेक्नॉलजीज, भारत फोर्ज, महिंद्रा टेलिफोनिक इंटिग्रेटेड सिस्टम तथा टाटा ऐडवांस्ड मटीरियल्स शामिल हैं। इसी के साथ भारत पाक सीमा पर युद्ध की रणभेरी भी बज चुकी है।
गौर तलब है कि अमेरिका में हथियारों के अलावा कुछ भी नहीं बनता। पूंजी के वर्चस्व के कारण सस्ते श्रम की गरज से अमेरिका के अंदर और बाहर विदेशियों को हायर करती है कंपनियां, लेकिन अमेरिकी नागरिकों के लिए नौकरियां नहीं हैं।
गौर तलब है कि महाशक्ति बनकर दुनिया परराज करने का असली मकसद अमेरिकी युद्धक व्यवस्था में लगी पूंजी के हित साधना है।
गौर तलब है कि अमेरिकी उपभोक्ता बाजार पर चीनी, कोरियाई और जापान जैसे देशों का कब्जा है।
गौर तलब है कि बिना युद्ध के अमेरिकी सांस भी नहीं ले सकते। अमेरिका की पुलिसिया राजनय और विदेशनीति दरअसल युद्ध और गृहयुद्ध का कारोबार है।
गौर तलब है कि आतंक के खिलाफ अमेरिका का युद्ध भी दुनिया भर के संसाधनों पर कब्जे का खेल है जिसके तहत अमेरिका तीसरे तेलयुद्ध में फिर मरुआंधी में फंस चुका है।
रिलायंस जैसी कंपनियां ध्वस्त उत्पादन प्रणाली, चौपट कृषि और खत्म कारबार के बेरोजगार इस देश में हथियारों का निर्माण करती रहेंगी तो युद्धक अर्थव्यवस्था में निष्णात ही हो जाना है भारतीय मुक्त बाजार, जहां सरकार न्यूनतम है और पूंजी अबाध है। जनहित में कुछ भी नहीं है।
आपके प्रधान स्यंसेवक ने जाकर अमेरिका की सरजमीं पर भारतीय कायदे कानून को खराब कानून बताते हुए अंतररष्ट्रीय लंपट पूंजी के हित में सारे कानून बदलने का ऐलान कर चुके हैं।
इससे पहले बाजार को विनियमित विनियमित और सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण के तहत विकास का जो समावेशी पीपीपी गुजराती कामसूत्र के तहत उ्होंने मेड इन के समापन के साथ मेक इन का नारा दिया, वह पिछले सात दशकों से अमेरिका परस्त रूस परस्त सैन्य राष्ट्र की राम रचि राखा नियति ही है, जिसके मुताबिक मुक्त बाजार का अंततः युद्धक अर्थव्यवस्था में कायाकल्प होना है।
धीरु भाई अंबानी ने कपड़ा उद्योग का समापन करके जो कृत्रिम रेशां का साम्राज्य खड़ा किया श्रीमती इंदिरा गांधी के संरक्षण प्रोत्साहन में, उस साम्राज्य की प्रजा हैं हम और सारे संसाधन रिलायंस हवाले है।
लोकसभा चुनाव से पहले स्वर्ग राज्य में मोदी का राजतिलक जो मुकेश अनिल भाइयों ने किया, वह ग्लोबल हिंदुत्व के जरिये ग्लोबल कारोबार ही है, जिसके तहत रिलायंस ने कांग्रेस का दशकों का साथ छोड़ा है।
बात शुरु करने से पहले इस पोस्ट पर गौर करें, ऐसे अनंत सुभाषित सोशल मीडिया पर केदार जलप्रलय है, जिसमें कितने लोग मारे जायेंगे, कोई अंदाजा नहीं है –
 घुसकर मारो और ऐसा मारो कि उनके आकाओं की रूह काँप जाए – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
पाकिस्तान को करारा जवाब :-भारतीय सेना के हमले में 37 पाकिस्तानी ढेर 78 घायल पकिस्तान ने युद्ध विराम के लिए दिखाया सफ़ेद झंडा लेकिन भारतीय सेना ने नकारा |
ना हम शैतान से हारे, ना हम हैवान से हारे
कश्मीर में जो आया तूफान, ना हम उस तूफान से हारे
यही सोच कर ऐ पाकिस्तान, हमने तेरी जान बक्शी है
शिकारी तो हम हैं मगर, हमने कभी कुत्ते नहीं मारे
हमने अपने मित्रों से पूछा कि क्या उन्हें 62 और 65 के बीच बाजार भाव के बारे में कोई आइडिया है। बंगाल में जो मध्य साठ में तेभागा के साथ-साथ खाद्य आंदोलन चल रहा था और वसंत का वज्रनिर्घोष समांतर चल रहा था, जब कोलकाता महानगर के राजपथ और गांवों में खेंतों की मेढ़े रक्तनदियों में थे तब्दील, उस वक्त भी यूपी में चावल, दाल, आटा का भाव अठन्नी से कम था। घी एक रुपये किलो में मिलता था और गांवों में सब्जी, फल और दूध का कारोबर नहीं होता था। नमक एक पैसा भाव था।
जो हम दूध घी की नदियों की बात करते हैं, राष्ट्र के सैन्यीकरण से पहले यकीनन वे यहां बहती थीं और हम उसमें नहाते भी थे। तब न हरित क्रांति मुकम्मल थी और न श्वेत क्रांति हो चुकी थी।
मुक्त पूंजी ने हमें बाबरी विध्वंस, भोपाल गैस त्रासदी, सिखों के नरसंहार, पूर्वोत्तर में उग्रवाद, मध्य भारत और संपूर्ण आदिवासी भूगोल में सलवा जुड़ुम, कश्मीर और पूर्वोत्तर में मानवाधिकार हनन और प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला उपहार में दिया है।
हम जल जंगल जमीन से बेदखल हैं। नदियां सारी बिक गयीं। हिमालय पूरा का पूरा बिक गया। सारे अरण्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले हैं।
और यही बुलेट विकास है।
हीरक चतुर्भुज है।
62 से 65 के बीच मंहगाई के बारे में शिकायतें कम थीं, शिकायत थी कालाबजार और जमाखोरी के बारे में बहुत ज्यादा और पंडित जवाहर लाल नेहरु ने भी कह दिया था कि कालाबाजारियों और जमाखोरों को लैंप पोस्ट पर टांग दिया जायेगा। जो अब तक हुआ नहीं है।
मेरे पिता पुलिनबाबू सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थे और बारहों महीने कहीं न कहीं किसी जनांदोलन में जुटे होते थे। मेरे चाचा पचासों मील के इलाके में अकेले डाक्टर थे जो देहातियों का इलाज करते थे रात दिन। मेरे ताउजी खेती बाड़ी देखते थे। लेकिन वे भी संगीत मास्टर थे। मेरी तहेरी दीदी के बाद उस साझा परिवार में मैं सबसे बड़ा बच्चा था।
बसंतीपुर से दिनेशपुर 6 किमी दूर था और यातायात का साधन न था। निहायत शैसवावस्था में परिवार के लिए राशन पानी लाने का इंतजाम मेरी जिम्मेदारी थी। इसलिए मेरे मित्रों को भाव मलूम हो न हो, मुझे मालूम है। फिर भी मैं तब मिट्टी के तेल का क्या भाव था, नहीं याद कर पा रहा।
सोने का भारी भाव मुरादाबाद सर्राफा में इतना कम था कि गांव में किसी लड़की के गहने के बाबत हजार रुपये खर्च हुए हो उसकी व्याह में, ऐसा मुझे याद नहीं है।
पेट्रोल डीजल की दुनिया के बाहर थे हम, इसलिए उसके भाव के बारे में कुछ भी याद नहीं है।
मेरे घर में हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी के अखबार नियमित आते थे। पिताजी जब तब दूसरी तमाम भाषाओं के अखबार लाते थे जिन्हें मैं देवनागरी अक्षर ज्ञान के तहत तब भी बांच लिया करता था।
हमारे लिए तब सबसे बड़ी पहेली थी कि जो चावल यूपी में अठन्नी भाव है, वह बंगाल में तीन रुपये किलो कैसे है और भोजन के लिए क्या आंदोलन हो सकता है।
बंगाल में भारत के दूसरे हिस्सों की तरह अस्पृश्यता कभी नहीं थी जो सामाजिक भेदभाव रहा है, उससे हम तराई में मुक्त रहे हैं। वाम पृष्ठभूमि की निरंतरता की वजह से सामाजिक सरोकार और अस्मिता के आर पार उत्पादन संबंधों के सामाजिक यथार्थ से ही हमारी दृष्टि का विकास होता रहा है।
इस प्रस्तावना का मकसद यह है कि भारत चीन सीमित सीमा संघर्ष ने भारत का जैसा सैन्यीकरण करना शुरु किया, उसका कमाल सन 65 के युद्ध में देखने को मिला तो चरमोत्कर्ष सन् 71 में।
तनिक उस विजयोल्लास को याद करें जब संघ परिवार तक ने इंदिरा गांधी के महिषमर्दिनी दुर्गावतार का आवाहन किया था और कांग्रेस की राजनीति संघी राजनीति में समाहित हो गयी। ग्लोबल हिंदुत्व का नवनिर्माण हुआ तो पाप का घड़ा पूरा हो गया।
संसद में नेहरु ने घोषणा की थी कि हमने अपनी सेना को चीनियों को खदेड़ने का आदेश दे दिया है।
पूरे पांच दशक बाद महाराष्ट्र और हरियाणा जीतने के लिए धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी बनाते हुए वे भारतीय सेना से कह रहे हैं कि पाकिस्तानियों को घुसकर मारो।
यह युद्धघोषणा तो है ही। इसके साथ ही भारतीय मुक्ताबाजार के युद्धक अर्तव्यवस्था में रूपांतरण, कायाकल्प का उदात्त उद्घोष भी है।
जनाब नवाज शरीफ की गद्दी बेदखल होनी वाली है और अंदरुनी हालात उनके नियंत्रण में नहीं है। पाकिस्तान अमेरिकी वसंत की जद में है और सैन्य अभ्युत्थान की तैयारी में हैं। इन तत्वों के लिए भारत पाक युद्ध से बहतर कोई दूसरा अवसर नहीं बनता है। तो दूसरी ओर निजी क्षेत्र के लिए रक्षा उत्पादन और कारोबार के जो तमाम दरवाजे खोल दिये गये हैं, तो उन कंपनियों के निरंकुश मुनाफे का भी यह स्थाई बंदोबस्त है।
मारे तो जायेंगे सीमा के आर पार लोग और दशकों तक युद्ध गृहयुद्ध के इस राष्ट्रद्रोही कारोबार में मुकम्मल अमेरिका बनकर हम अमेरिकी नागरिकों की तरह नरकयंत्रणा को झेलते रहेंगे जैसे सन बासठ के बाद इन पांच दशकों तक हम झेलते रहे हैं।