आप यूनिवर्सिटी की कई डिग्रियाँ लेकर भी गधे हो सकते हैं

राजीव नयन बहुगुणा प्रश्न डिग्री का नहीं, वंचना का है। आप यूनिवर्सिटी की कई डिग्रियाँ लेकर भी गधे हो सकते हैं। क़ानून, अर्थशास्त्र, दर्शन आदि का प्रोफेसर रह चुका एक शख़्स वर्षों से भारतीय राजनीति के रंग मंच पर कभी विदूषक, कभी भांड, कभी गधा तो कभी कटखने कुत्ते की भूमिका निभाता चला आ रहा …
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राजीव नयन बहुगुणा

प्रश्न डिग्री का नहीं, वंचना का है। आप यूनिवर्सिटी की कई डिग्रियाँ लेकर भी गधे हो सकते हैं। क़ानून, अर्थशास्त्र, दर्शन आदि का प्रोफेसर रह चुका एक शख़्स वर्षों से भारतीय राजनीति के रंग मंच पर कभी विदूषक, कभी भांड, कभी गधा तो कभी कटखने कुत्ते की भूमिका निभाता चला आ रहा है।

दूसरी ओर भारतीय मनीषा के विलक्षण उद्गाता विनायक नरहरि भावे उर्फ़ विनोबा 12वीं पास नहीं किये थे। वह 12वीं की परीक्षा देने घर से मुम्बई को निकले और रस्ते से ही भाग कर कासी पहुँच गए, संस्कृत सीखने की ललक में। वहाँ उन्होंने एक आचार्य से पृच्छा व्यक्त की – संस्कृत कितने साल में सिखा देंगे ? आचार्य का उत्तर था – 12 वर्ष में।

नामंज़ूर, विनोबा ने कहा, मैं छह महीने में ही सीख लूँगा। और सचमुच छह महीने में संस्कृत सीख कर वह गांधी के साकार जंगम विद्या पीठ में पँहुच गए। गीता समेत सभी उपनिषदों का विलक्षण भाष्य किया। कुरआन शरीफ की हिंदी टीका की। जितने साल सुब्रह्मण्यम स्वामी ने डिग्रियाँ बटोरने में खर्च किये, उतने साल में आद्य शंकराचार्य ब्रह्म ज्ञान आत्मसात कर, और उसे बाँट कर मर भी गए थे।

दक्षिण के अप्रतिहत नेता के कामराज निरक्षर थे। उन्हें न अंग्रेजी आती थी, न हिंदी। फिर भी न केवल मद्रास सूबे के सफल मुख्य मंत्री, अपितु अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के दबंग अध्यक्ष भी रहे। अपनी दृढ संकल्प शक्ति से विश्व के धुरंधरों की बोलती बन्द कर देने वाली इंदिरा गांधी के पास भी कोई औपचारिक डिग्री नहीं थी। विधिवत रूप से वह सिर्फ कुछ दिन शान्ति निकेतन विश्वविद्यालय में रहीं। अन्यथा ठीक से कभी, कॉलेज तो क्या, स्कूल भी नहीं जा पायीं। इसका उनके पास तात्कालिक परिस्थितियों में अवकाश भी नहीं था।

डिग्री नहीं है, तो कोई बात नहीं। सीखने की कोशिश करो। और सबसे पहले तो यह सीखो कि बात बात पर, बेवजह झूठ बोलने से जग हँसाई होती है। ज़्यादा फेंकने पर नाक जड़ से कटती है।

फेस बुक पर इनबॉक्स और आउट बॉक्स भी मुझे निरन्तर उपालम्ब मिल रहे हैं, कि उत्तराखण्ड के जंगलों में भीषण आग लगी है, और मैं उस पर न कुछ लिख रहा हूँ, न कर रहा हूँ। अपनी स्थिति स्पष्ट कर दूँ, इसके उपरान्त किसी के इनबॉक्स प्रश्न का उत्तर नहीं दूँगा।

1:- मैं फायर ब्रिगेड या वन विभाग का कर्मचारी नहीं हूँ।

2:- फेस बुक पर मेरे अश्रुपात करने अथवा हुँकारने से आग नहीं बुझेगी।

3:- पिछले दिनों टिहरी गया था। रस्ते में दावानल दिखा। भरसक बुझाने का यत्न किया, और सम्बंधित विभाग को फोन किया।

4:- दावानल के लिए सरकारों की चीड़ पोषक वन नीति ज़िम्मेदार है। नॉर्थ ईस्ट के मिश्रित वनों में आग नहीं लगती।

5:- आग बुझाने के लिए कल जो विमान पहुँचे हैं, मैं 20 साल से इस तकनीक को अपनाने के लिए दसियों लेख लिख चुका।

6:- मुझे भी आराम करना होता है, जैसे कि आपको। मेरी स्थिति आपसे कोई अलग नहीं है, न मैं अतिरिक्त राष्ट्र भक्त हूँ।

अस्तु।