जिस नमो की सुनामी है, वह सवालों से भागता क्यों है

पलाश विश्वास अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्रित्व के भाजपाई दावेदार नरेंद्र मोदी से जो सोलह सवाल पूछे हैं, वे दरअसल अरविंद के सवाल हैं नही, ये सावाल राष्ट्र की ओर से हैं, जो समय समय पर उठाये जाते रहे हैं। मोदी को विकासपुरुष बतौर पेश किया जा रहा है। शेयर बाजार में …
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मोदी से केजरीवाल के नहीं, राष्ट्र के सवाल हैं यह। जिन मतदाताओं के जनादेश पर वे राजकाज के अधिकारी बनने वाले हैं, उन्हें मोदी इन सवालों का जवाब क्यों नहीं देते।… केशरिया कयामत हर कीमत पर रोक दी जाये, यह लोक गणराज्य भारत के अस्तित्व का बुनियादी सवाल है।
पलाश विश्वास
अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्रित्व के भाजपाई दावेदार नरेंद्र मोदी से जो सोलह सवाल पूछे हैं, वे दरअसल अरविंद के सवाल हैं नही, ये सावाल राष्ट्र की ओर से हैं, जो समय समय पर उठाये जाते रहे हैं। मोदी को विकासपुरुष बतौर पेश किया जा रहा है। शेयर बाजार में अभूतपूर्व जोश है। निवेशकों की आस्था अटूट है। तो जिन मतदाताओं के जनादेश पर वे राजकाज के अधिकारी बनने वाले हैं, उन्हें मोदी इन सवालों का जवाब क्यों नहीं देते। अरविंद केजरवाल से मिलने न मिलने की उन्हें पूरी स्वतंत्रता है। उनसे संवाद न करना चाहे तो भी हर्ज नहीं। लेकिन लोकतंत्र में आस्था है और पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता है तो अत्यंत नैतिक मान्यताओं के झंडेवरदार मोदीमय संघपरिवार का मान रखते हुये उन्हें राष्ट्र को संबोधित करके इन सवालों का जबाव हर हाल में देने चाहिए। अगर अरविंद केजरीवाल झूठ का पुलिंदा पेश कर रहे हैं, तो  उस झूठ का भी पर्दाफाश होना जरूरी है। सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे तो जाहिर है कि भावी प्रधानमंत्री की साख कोई मजबूत होगी नहीं और बाकी देश को लगेगा, हो न हो, अरविंद कुछ न कुछ सच जरूर बोल ही रहे हैं।

गुजरात दौरे पर अरविन्द ने नरेन्द्र मोदी सरकार पर जमकर कटाक्ष किये हैं। अरविन्द ने कहा है कि, गुजरात में विकास के बारे में नरेंद्र मोदी जो दावे करते हैं, वे खोखले हैं। केजरीवाल ने कहा कि मोदी के तमाम दावे झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। उनके सरकार में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यदि गुजरात को नरेन्द्र मोदी कृषि प्रधान देश बता रहे हैं तो किसानों के सामने ऐसी स्थित क्यों आ जाती है जिसके लिए उन्हें आत्महत्या करना पड़ रहा है। आइये हम आपको बताते हैं उन सोलह सवालों के बारे में जिनके जवाब अरविंद केजरीवाल नरेन्द्र मोदी से जानना चाहते थे।
केजरीवाल के नरेन्द्र मोदी से  सवाल
1.  क्या आप प्रधानमंत्री बनने के बाद केजी बेसिन से निकली गैस के दाम बढ़ायेंगे?

2.  पढ़े-लिखे युवाओं को ठेके पर नौकरी क्‍यों दे रहे हैं और उन्‍हें मात्र 5300 रुपये प्रति महीना दे रहे हैं, इतने में कोई कैसे जिन्दगी चलायेगा?

3.  पिछले दस सालों में राज्‍य में लघु उद्योग क्‍यों बंन्द हुये हैं?

4.  किसानों की जमीनें बड़े उद्योगपतियों को कौड़ियों के भाव क्‍यों दिये जा रहे? आपने किसानों की जमीन छीनकर अडानी और अंबानी को दे दी है।

5.  आपके पास कितने निजी हेलिकॉप्‍टर या प्लेन हैं? आपने ये खरीदे हैं या बतौर तोहफा मिला है? आपकी हवाई यात्राओं पर कितना खर्च आता है और इसके लिये पैसे कहांँ से आते हैं?

6.  गुजरात के सरकारी अस्‍पतालों में इलाज की सुविधा क्‍यों नहीं है?

7.  आपने हाल में पंजाब में कहा था कि कच्छ के सिख किसानों की जमीन नहीं छीनी जायेगी, तो इस मामले में गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट क्यों गयी है?

8.  गुजरात में विकास के दावे झूठे हैं, मोदी जी आप बताइए कि गुजरात में कहांँ विकास हुआ है?

9.  आपके मंत्रिमंडल में दागी मंत्री क्यों शामिल है, बाबू भाई बुखेरिया और पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्री सरकार का हिस्सा कैसे बने हुये हैं?

10. मुकेश अंबानी से आपके क्या रिश्ते हैं, आपने अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को मंत्रिमंडल में क्यों जगह दी?

11. गुजरात में सरकारी स्कूलों के हालात बदहाल क्यों है?

12. सरकारी दफ्तरों में बहुत ज्यादा करप्शन है, विभागों में भारी भ्रष्टाचार क्यों है?

13. कच्छ के किसानों को पानी नर्मदा बांध के बावजूद आज तक क्यों नहीं मिला? सारा पानी उद्योगपतियों को दे दिया गया।

14. गुजरात के किसान बेहाल है। किसान खुदकुशी कर रहे हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में 800 किसानों ने खुदकुशी की, क्यों?

15. प्रदेश में रोजगार का बुरा हाल क्यों है और बेरोजगारी क्यों बढ़ी है?

16. चार लाख किसानों ने बिजली के लिये कई साल से आवेदन दिया है, उन्हें अब तक बिजली क्यों नहीं मिली है?

हम न आप के समर्थक हैं और न हम राजनीतिक दलों के दफ्तरों के घेराव का समर्थन करते हैं। लेकिन इन सवालों का जबाव नहीं मिला तो हमें पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए। क्या नमोमय भारत ही इस लोकगणराज्य का भविष्य है। जिस नमो की सुनामी है,वह सवालों से भागता है तो देस में लोकतंत्र की क्या हालत होगी। क्या हमें नमोमय भारत बनने देने की मुहिम में शामिल हो जाना चाहिए उनकी जबावदेही से मुकरने के बावजूद, बुनियादी सवाल अब यह है।
अरविंद केजरीवाल के सोलह सवालों का मुख्य स्वर दरअसल यही है। जिसे अनसुना करके संघ परिवार दरअसल अपने ही पांवों में कुठाराघात कर रहा है।
समझ लीजिये कि तीसरा मोर्चे से नरेद्र मोदी का कुछ बनने बिगड़ने वाला नहीं है। अन्ना ममता युगलबंदी की वजह से बनने से पहले ही बिखर गया है तीसरा मोर्चा। हम कहने को मजबूर हैं कि विचारधारा और जनप्रतिबद्धता के मोर्चे पर सिरे से नाकाम वामदलों की न सिर्फ साख खत्म हुयी है बल्कि उनका अपना वजूद भी संकट में है। बंगाल में हारकर वाम दल सिर्फ केरल के भरोसे भारत की राजनीति में कोई हस्तक्षेप कर ही नहीं सकते। इसीलिए ममता बनर्जी की जनविरोधी अगंभीर राजनीति के आगे वामदल इतने असहाय हो गये हैं। जिन क्षत्रपों के सहारे वाम पहल है, वे भागते चूहों की जमात है और पानियों की हलचल मुताबिक एक जहाज छोड़कर दूसरे जहाज की सवारी करने के वे जन्मजात अभ्यस्त हैं। वाम विचारधारा के मुताबिक अस्मिताओं की यह राजनीति राज्यतंत्र में कोई फेरबदल तो करेगा ही नहीं, बल्कि उनकी मौकापरस्त राजनीति में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के विरुद्ध लोकतंत्र और धर्मनिपेक्षता अप्रासंगिक हो गये हैं।
जाहिर है कि कोई धर्मनिरपेक्ष मोर्चा नमोमय भारत को रोकने की हालत में कतई नहीं है।
अगर नमो सुनामी कोई रोक सकता है तो फिलवक्त वह आप है। एनजीओ तत्व तो सभी दलों में हैं। भारत सरकार के सारे कामकाज या तो कारपोरेट कर रहे हैं या फिर एनजीओ। महज इस तर्क से आप को खारिज कर देना इस वक्त भारी राजनीतिक मूर्खता होगी।

अगर वामदल नमोमय भारत के निर्माण के खतरे के प्रति तनिक भी सावधान हैं, तो आप को राजनीतिक दल के बजाय बदलाव के लिए जनआकांक्षाओं के के महाविस्फोट और अस्मिता राजनीति से ऊपर आम भारतवासियों और सामाजिक शक्तियों का मोर्चा समझना होगा, जहां पिटे हुये भ्रष्ट, ढपोरशंख, परंपरागत मौकापरस्त और अस्मिताओं के चेहरों के लिए कोई जगह फिलहाल नहीं है।

वाम दल अगर आप को बिना शर्त समर्थन देते हैं बिना सीटों के तालमेल के तो गजब हो सकता है। यह विकल्प मौकापरस्त क्षत्रपों के महागठजोड़ से हजार गुणा बेहतर ही नहीं होगा, बल्कि दलबदलुओं के सहारे तेज होती जा रही मोदी सुनामी को रोकने का अंतिम और निर्णायक प्रयास होगा।

आप के नेता क्या राजी हैं या नहीं, यह सवाल बेमतलब हैं। अगर आर्थिक सुधारों और कारपोरेट राज के खिलाफ आपकी लड़ाई है तो आपको यह समझ ही लेना चाहिए केशरिया राष्ट्र में खुदरा कारोबार को पहले ही हरी झंडी दे चुके मोदी अमेरिकी जायनवादी समर्थन से अगर इस देश का प्रधानमंत्री बने तो भारतीय संविधान जो बदलेगा सो बदलेगा, समता और सामाजिक न्याय का जो होगा सो होगा, धर्मोन्माद से देश जो लहूलुहान होगा सो होगा, बल्कि देश की संघीय ढांचा तहस नहस हो जायेगा और पूरा देश तब गुजरात होगा।

कैसा गुजरात, उसकी छवि अरविंद के सवालों की पृष्ठभूमि में साफ तौर पर उभर ही आयी है।

इसके अलावा अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी हितों का असर इतना ज्यादा होगा कि गरीबों की क्या कहें, छोटी पूंजी और मंझोली पूंजी वाले काोबरियं का सत्यानाश भी तय है। पीएफ पेंशन तक बाजार में जो जायेगा, सो जायेगा, विनिवेश और निजीकरण का जो तूफान आयेगा, सो आयेगा, लेकिन करप्रणाली का सारा बोझ आम जनता के कंधे पर डालने का जो स्त्रीविरोधी वर्णवर्चस्वी संघी आर्थिक एजंडा है, उसके तहत जाति धर्म निर्विशेष गरीबों का सफाया हो ही जायेगा। फिर आप अस्मिताओं के ठेकेदारों के मुंह ताकते रह जायेंगे जो अंततः घनघर वंशवादी हैं और जिनकी दृष्टि में भारत नहीं है।

कामरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनाकर कामरेडों ने जो ऐतिहासिक भूल की है, वाम आंदोलन को बंगाल, केरल और त्रिपुरा तक सीमाबद्ध करने का जो महापाप कर दिया है, उसके प्रायश्चित्त का मौका यही है क्योंकि यह केशरिया कयामत हर कीमत पर रोक दी जाये, यह लोक गणराज्य भारत के अस्तित्व का बुनियादी सवाल है। जो तीसरा मोर्चा हरगिज नहीं रोक सकता क्योंकि उसके सारे क्षत्रप या तो केशरिया हो चुके हैं या फिर केशरिया होने को हैं।

हमें आप की सीमाओं का पूरा ख्याल है, उसके खतरों से भी हम वाकिफ हैं। लेकिन शायद हमारे सामने फिलवक्त आप के साथ मोर्चाबद्ध हो जाने या कम से कम उसके खिलाफ न होने के विकल्प के अलावा कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।