दिल्ली में कुत्तों का सम्मेलन

भारतीय वांग्मय में कुत्तों की महिमा का बखान भरा पड़ा है। कुत्तों पर कहावतों, मुहावरों और नीतिकथाओं की तो भरमार है ही, गालियाँ और वक्त्रोक्तियाँ भी कम नहीं हैं। प्राचीन काल से आज तक, भारतीय सहित्य और समाज में, कुत्तों को दुत्कार और प्रतिष्ठा दोनों ही इतनी भरपूर मिली है कि कई बार आदमी नामक …
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   ‘‘मनुष्य को शेर से एक, बगुले से एक,  मुर्गे से चार, कौऐ से पांच, कुत्ते से छह और गधे से तीन गुण ग्रहण करना चाहिए।”

          ‘‘बहुत खाने की शक्ति रखना, न मिलने पर भी संतुष्ट हो जाना, खूब सोना पर तनिक आहट होने पर भी जाग जाना, स्वामीभक्ति और शूरता, ये छह गुण कुत्ते से सीखना चाहिए।”
— चाणक्य
“कुत्ते! मैं तेरा खून पी जाऊँगा।”
–धर्मेन्द्र, फिल्म शोले

भारतीय वांग्मय में कुत्तों की महिमा का बखान भरा पड़ा है। कुत्तों पर कहावतों, मुहावरों और नीतिकथाओं की तो भरमार है ही, गालियाँ और वक्त्रोक्तियाँ भी कम नहीं हैं। प्राचीन काल से आज तक, भारतीय सहित्य और समाज में, कुत्तों को दुत्कार और प्रतिष्ठा दोनों ही इतनी भरपूर मिली है कि कई बार आदमी नामक प्राणी उनसे इर्ष्या करने लगता है।
ऐसी ही एक घटना देश की राजधानी में हुई।
दिल्ली से प्रकाशित एक नामचीन अंग्रेजी अख़बार के दूसरे पन्ने पर सबसे ऊपर सैट कॉलम का एक समाचार था, जिसमें तीन रंगीन चित्र और बैनर हेडलाइन था। खबर में बताया गया था कि पिछले एक नवम्बर को दिल्ली हट में कुत्तों का एक सम्मलेन आयोजित किया गया। इसमें 5000 इन्सान, 250 कुत्ते और कुछ बिल्लियाँ शामिल हुईं।
      दिल्ली में आये दिन दलितों-शोषितों के सम्मलेन होते रहते हैं, लेकिन अख़बार के किसी कोने-अंतरे में भी उनको जगह नहीं मिलती। कुत्तों, जोंकों, सियारों और ठगों-बटमारों की बैठकी खबरों की सुर्खियों में रहती हैं। बहरहाल……
सम्मलेन में कुत्तों के लिए डिजाइनर पोशाक, खिलौने और नाना प्रकार के व्यंजनों की नुमाइश हुई। कुत्तों के लिए खास तौर से बेकरी चलाने वाले भी उस सम्मलेन में शामिल हुए। उनका कहना था कि अब कुत्तों के लिए ब्रेड-बिस्कुट ही नहीं, बल्कि जन्म दिन-स्पेशल केक की मांग भी बढ़ रही है।
इस सम्मलेन में कई विदेशी नस्लों के कुत्ते शामिल हुए जिनमें चिहुआहुआ और लेब्राडोर सबसे ज्यादा आकर्षण के केंद्र में रहे।
सच पूछें तो यह सम्मेलन कुत्ता मालिकों और कुत्ता प्रेमियों का था। कुत्ते तो हमारे घर में भी पलते थे, बची-खुची खा कर पहरेदारी करते थे। उनसे लगाव भी हो जाता था, खास कर बच्चों को। लेकिन नवउदारवादी दौर के प्रदर्शन-प्रेमी नवधनाढ्यों की तो बात ही कुछ और है। उनका क्या है, वे तो अपने तोता-मैना पाले हैं।
O-   दिगंबर

About the author

दिगंबर, लेखक जाने-माने वामपंथी विचारक हैं।