नेपाली माओवाद में ‘आप’ इफ़ेक्ट

पवन कुमार पटेल इन दिनों देश में जारी लोकसभा चुनाव की गर्मी से हमारा पड़ोसी देश नेपाल भी अप्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया है. जैसे ही दिल्ली के ‘आप’ करिश्मे के बीच देश में लोकसभा चुनाव का शंखनाद हुआ, वैसे ही इस ‘आप इफेक्ट’ से पड़ोसी देश नेपाल की पहले से ही संकटग्रस्त राजनीति …
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पवन कुमार पटेल
इन दिनों देश में जारी लोकसभा चुनाव की गर्मी से हमारा पड़ोसी देश नेपाल भी अप्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया है. जैसे ही दिल्ली के ‘आप’ करिश्मे के बीच देश में लोकसभा चुनाव का शंखनाद हुआ, वैसे ही इस ‘आप इफेक्ट’ से पड़ोसी देश नेपाल की पहले से ही संकटग्रस्त राजनीति भी अछूती न रह सकी. कई महीनों से जारी चुनाव प्रचार और कई चरणों के मतदान के बाद और अब प्राप्त परिणामों का भारत की तरह नेपाल में भी इंतज़ार हो रहा था कि किस दल के दिन बहुरेंगे. क्यूंकि नेपाली जन मानस में यह मुहावरा अनायास ही नहीं होता कि जब दिल्ली (दरबार) में बारिश होती है, तो नेपाली (राजनेता) काठमांडू में छाता ओढ़ते हैं. बहरहाल भारत में अब चुनाव नतीजे से ‘अच्छे दिन’ आ जाने के कारण हिंदुत्व ब्रिगेड जबरदस्त खुशी मना रही है, पर इस परिणाम से यदि सबसे ज्यादा निराशा हुई है तो वह आम आदमी पार्टी के एनजीओ पैरोकारों को हुआ है.

नेपाल में ‘आप’ का बैंड बाजा बजाने के श्रेय माओवादी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टराई को है. नेपाली और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में उनकी ‘दिल्ली में आप’ के प्रयोग को लेकर की गयी प्रशंसा नेपाल के बौद्धिक जगत के चटखारों का केंद्रबिंदु रही है. सन्दर्भ यह कि जब 2013 के चुनाव के चुनाव में कल तक की भट्टराई की सत्ताधारी नेपाली माओवादी पार्टी चुनाव में बुरी तरह पराजित हो कर तीसरे स्थान में सिमट गयी और एक दौर की संविधान सभा और संघीय-गणतंत्र विरोधी पार्टियाँ (नेपाली कांग्रेस और नेकपा (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) सत्ता में आ गयी. पर तब भी क्या इस परिस्थिति में भी, क्या बहुसंख्यक ग्रामीण आम जनता के सवालों को आज के सत्ताधारी राजनीतिक दल संबोधित कर सके हैं या कर पा रहे हैं अथवा नहीं?

ये सवाल निश्चित रूप में वही चिर परिचित सवाल हैं, नेपाली में कहें तो क्या गास-बॉस-कपास का बुनियादी सवाल (हिंदी मुहावरे में ‘रोटी-कपड़ा-मकान’) को नेपाल के परंपरागत राजनीतिक दल संबोधित कर पाए हैं? यही वह मूल कारण है कि मनमोहनमिक्स वादी कांग्रेस पार्टी की तथाकथित बढ़ी हुई ग्रोथ रेट के बावजूद भी नव उदारवादी वित्तीय पूंजीवाद के इस दौर में भारतीय जनता का एक बड़ा बहुमत 20 रुपए में जीवन निर्वाह करने को मजबूर है. इसलिए मोदी के सच्चे-झूठे अच्छे दिन के सपनों में उसने यकीन जाहिर किया है कि मोदी ही असल में उसे रोटी-कपड़ा-मकान की बुनियादी मांग पूरा कर सकते हैं. और इसलिए उसने एक निर्णायक कदम उठाते हुए इस चुनाव से कांग्रेस और उसके नॉनसेंस किस्म के रंग बिरंगे अस्मितावादी-सेक्युलर मुखौटों वाले थर्ड फ्रंट मित्रों को आज के इतिहास में दफ़न कर दिया है. नेपाल में भी कुछ इसी तरह का कारनामा नवम्बर चुनाव में हुआ है, जिससे कम ही लोग परिचित हैं.

नव उदारवादी बेलगाम पूंजीवाद के 21वीं सदी के इस दौर में नेपाली समाज राजतंत्र से गणतंत्र के संक्रमण के दौर में तो चला गया है, पर बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी के बीच और उद्योग धंधों के अभाव में लाखों की संख्या भारत और खाड़ी मुल्कों में पलायन जारी है. भले ही इन्हीं सवालों को नेपाल में समय-समय पर हुए सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन ने बराबर रेखांकित किया है. सामंती राजतंत्र के बिगत के साए और भारतीय एकाधिकारवादी दलाल पूंजीवाद के कुचक्र के तले पनपे इन आन्दोलनों के नेताओं ने 1950 से लेकर अभी हाल तक के माओवादी आन्दोलन के द्वारा दुनिया के सबसे गरीब देश में शुमार नेपाल को गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई से मुक्त करने के सब्जबाग दिखाए थे. इन आन्दोलनों के नेताओं ने हाल तक हिन्दू सामंती राजतंत्र को नेपाल की हर समस्या की जड़ बताया था. पर अब एक दशक तक चले माओवादी आन्दोलन के फलस्वरूप 2006 के जनांदोलन और संबिधान सभा के 2008 के निर्वाचन के फलस्वरूप आज जब राजतंत्र का पतन हो चुका है, तब भी ये सवाल ‘ज्यों के त्यों बने’ हुए हैं. राजतंत्र के पतन के फलस्वरूप नेपाली माओवादी पार्टी हिंसा का रास्ता छोड़कर संसदीय धारा में उभरी थी पर 5 से 6 साल के अल्पकालिक समय में ही उसने अपनी क्रन्तिकारी साख गुमाकर सत्ता के दलाल पूंजीवादी गलियारों में सिंह दरबार (परम्परगत रूप में नेपाली प्रधानमंत्री का ऑफिस)  में पतित हो गयी. यहाँ तक कि 2008 के चुनाव में मिले मैंडेट को भुलाकर कभी ‘जनविद्रोह’ और शांति के नाम पर जनता को मूर्ख समझते हुए न तो लोकतान्त्रिक संघीय गणतंत्र का नया संविधान ही बनाकर शांति समझौते को ही संपन्न किया. यानि मूल अर्थ शांति समझौते के मूल पहलुओं में न गास-बॉस-कपास के सवाल को संबोधित किया, यानि न व्यापक भूमि सुधार पर कोई कदम उठाया और न ही रोजगार के लिए बड़े पैमाने पर युवा समुदाय का पलायन (आजकल पड़ोसी भारत के अतिरिक्त खाड़ी देशों में बहुत बड़ी संख्या में पलायन जारी है) को रोकने के लिए कोई कदम उठाया. और तो और माओवादी प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टराई ने नेपाल को राजतंत्र से गणतंत्र में बदलने के जिम्मेदार माओवादी जनमुक्ति सेना के मुट्ठी भर (19,600 में से) 1450 जवानों को पूर्व शाही नेपाली सेना में मिलाकर बाकी का विघटन कर दिया. जबकि 2006 के नेपाल सरकार और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बीच हुए शांति समझौते का मुख्य प्रस्थान बिंदु राजतंत्र के लिए वफादार शाही नेपाली सेना और माओवादी सेना को मिलकर एक गणतांत्रिक नेपाल की नई राष्ट्रीय सेना का गठन.

इसलिए प्रचंड एंड भट्टराई के एकीकृत माओवादी 2013 के संविधान सभा में बुरी तरह पराजित हो गयी, क्यूंकि इन बीते सालो में वे एकीकृत माओवादी से कैश माओवादी में तब्दील हो गए. आम नेपाली मनोविज्ञान में आज वे इसीलिए कैश माओवादी के रूप में जाने जाते हैं. कैश माने पैसे वाले, आम जनता के अनुसार प्रचंड एंड भट्टराई के माओवादियों ने भारतीय नेताओं की तरह इतना कमाया है कि उनकी सात पुश्तें भी बैठ कर ऐय्याशी करती रहें. तब 2008 के बाद सत्ता में आने के बाद कैश माओवादी का आचार और नीति पर बड़े पैमाने का भ्रष्टाचार ही वही मुख्य सवाल था, जिसे केंद्र बनाकर आम आदमी पार्टी ने भारत में एक नई पहल कदमी द्वारा अपने को स्थापित किया है. इसी कारण कल तक की सत्ताधारी कैश माओवादी पार्टी पहले तो 2012 में बिभाजित हुई.

हालांकि इस नई शक्ति यानि नेपाल में ‘आप’ उभार की बहस का मुख्य प्रस्थान बिंदु का आधार कुछ और ही है जिसकी चर्चा तो जन मानस में आम है लेकिन जिस पर नेपाली मीडिया खतरनाक चुप्पी साधे बैठा है. वह यह कि 2013 के संबिधान सभा चुनाव में जनता के एक बड़े हिस्से ने नेपाल में इस संविधान सभा चुनाव का बहिष्कार कर गणतंत्र संस्थागत करने के मॉडल पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. आम जनमानस के अनुसार यदि इस चुनाव का उद्देश्य एक पार्टी की जगह एक दूसरी पार्टी को सत्ता में बैठाना है तो फिर चुनाव का क्या मतलब, क्यूंकि यह अभ्यास तो संसदीय राजतन्त्र के दौर से बहुदलीय लोकतंत्र के शब्दजाल 1990 से लेकर अभी हाल फिलहाल तक जारी ही था. नेपाल के चुनाव आयोग के स्रोतों के अनुसार 23 लाख मतदाताओ ने तो सक्रिय बहिष्कार किया. और तो और करीबन 55 लाख लोगों को नेपाली चुनाव आयोग ने दर्ज ही नहीं किया. 2011 के जनसख्या के अनुसार नेपाल की अभी की जनसख्या 2 करोड़ 66 लाख है, जबकि 2008 का चुनाव 2001 की जनसँख्या (2 करोड़ 30 लाख थी) के आधार पर हुआ था. इस बीच 2001 से 2011 के बीच बढ़े मतदाताओं  को नेपाल का चुनाव आयोग द्वारा दर्ज करने की बात तो छोड़ ही दीजिये, इस बार (2013 में) तो हद ही हो गयी जब नेपाल के चुनाव आयोग ने मात्र 1 करोड़ 8 लाख लोगों को मताधिकार के लायक पाया, जबकि 2008 में यही संख्या 1 करोड़ 76 लाख थी. जिसमे इस बार मात्र 80 लाख लोगों ने अपने मतदान का प्रयोग किया. बाकि सीधे तौर पर 23 लाख लोग कहाँ गुम हो गए और लुब्बोलुवाब यह कि नेपाल में बीते नवम्बर 2013 के चुनाव में ‘ऐतहासिक रिकॉर्ड 70%’ मतदान हुआ. जबकि यह कोई भारत की तरह का कोई आम चुनाव नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक गणतांत्रिक नेपाल का नया संविधान बनाने के लिए था और जो संसद का भी काम करेगा. उस पर एक छोटे से देश में इतने बड़े पैमाने पर लोगों का चुनाव बहिष्कार क्या सिद्ध करता है, कि कहीं कुछ गड़बड़ है?

जनता के एक हिस्से ने ऐसा असाधारण निर्णय क्यूँ लिया जबकि नेपाल में राजतंत्र का सफाया हो चुका है, और नेपाल एक संघीय गणतंत्र के रास्ते में अग्रसर है. कारण बहुत महत्वपूर्ण है, कि इस राजतंत्र से गणतंत्र में संक्रमण ने जनता की भौतिक सवालों यानि रोटी, कपड़ा और मकान को हल किया है कि नहीं! इन सालों में अमीर और ग़रीब के बीच की आर्थिक असमानता की खाई को भरा है कि नहीं? देश में ही रोजगार पैदा करने के कितने कदम उठाये गए हैं? नेपाल सरकार के साल 2011 के जनसँख्या के अनुसार, 2001 से 2011 के दस साल के बीच करीबन 19,21,494 युवाओं ने रोजगार के लिए विदेश का रुख किया. यह जबकि सरकारी आंकड़ा है, जिस पर आम तौर पर समाज बैज्ञानिक रूप से यह विश्वास किया जाता है कि वास्तविक आंकड़े इससे कहीं ज्यादा होंगे. यह अकारण ही नहीं है कि देश की राजधानी काठमांडू के पॉश त्रिभुवन विमान स्थल में लगभग प्रतिदिन ही खाड़ी देशों से एक नेपाली युवा मजदूर का शव आता है. इस पर पिछले साल सितम्बर में प्रसिद्ध गार्जियन अखबार ने खाड़ी देश क़तर में नेपाली राजनीतिज्ञों और अंतर्राष्ट्रीय मैन पॉवर कंपनियों द्वारा श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नेपाली मजदूरों के दास की मानिंद काम कराये जाने पर एक रिपोर्ट जारी की थी. यह है गणतंत्र नेपाल की आम जनता की आर्थिक स्थिति, जिसके लेकर आम जन मानस में पूरी ब्यवस्था और नेताओं को लेकर पैदा हो रही घृणा को ‘आम आदमी पार्टी’ के मैजिक इफेक्ट के झाड़ू से साफ़ करने की जुगत भिड़ाई जा रही है.

नेपाल में यह नई शक्ति का ‘आप इफेक्ट’ क्या रंग लाता है, यह तो समय ही बताएगा. लोकतान्त्रिक नेपाल में भी अब तक अनुत्तरित गास-बास-कपास के सवालो को कैसे भुनाया जाय. खासकर राजतंत्र की सफलतापूर्वक जड़ें खोदने वाली पार्टी और अब कई धड़ों में विभाजित माओवादी पार्टी में इन सवालों को लेकर खलबली मची हुई है. और खासकर इस ‘नई शक्ति आप इफेक्ट’ के लिए जिम्मेदार कैश माओवादी नेता भट्टराई गुट में, जो बेशब्री से भारत के चुनाव परिणामों में आम आदमी की बड़ी आहट का इन्तजार कर रहे हैं. जिसे वे नेपाल में भी दोहरा सके. हाल ही एक हफ्ता पहले उनके धडे ने प्रचंड के नेत्रव्त्व वाले एकीकृत माओवादी पार्टी की बिराटनगर कांफ्रेंस का बहिष्कार किया है. बकौल भट्टराई राजतंत्र के पतन और गणतंत्र की स्थापना के बाद नेपाल में परम्परगत कम्युनिस्ट राजनीति और माओवादी राजनीति का भविष्य ख़तम हो गया है. अब मात्र आम आदमी पार्टी के मुहावरे ही नेपाल को गरीबी, पिछड़ापन, बेरोजगारी, महंगाई, यानि भ्रष्टाचार से निजात दिला सकते है. हाँ यह और ही बात है जैसा कि अपनी कैश पार्टी के अनुरूप भट्टराई के बारे में एक कहावत आम है कि ‘प्रचंड (साथ ही में दूसरी पार्टी के नेतागण) तो सीधे पैसे कमाते हैं पर भट्टराई अपनी पत्नी (माओवादी नेता हिसिला यामी) के जरिये पैसा कमाते हैं.’

यह अकारण नहीं है, जबकि नेपाल में पूंजीवादी लोकतंत्र के संबिधान सभा मॉडल की बनी इस बुरी गत को अब बाबुराम जैसे बुद्धिमान अवसरवादी ‘आम आदमी’ के नाम पर साम्राज्यवादी-पूंजीवादी संस्थान के पीछे एकजुट होकर लोकतंत्र के प्रोजेक्ट में आस्था जता रहे हो, क्यूंकि उसे पता है, कि प्रचंड का राजनीतिक भविष्य खत्म हो गया है और साथ में वह यह भी बखूबी जानते हैं कि किरण के नेतृत्व वाला माओवादी दल का भविष्य भी केवल सशस्त्र आन्दोलन पर निर्भर है, पर जिसके प्रति उसका नेतृत्व भी प्रचंड के उपयोगितावादी माओवाद में आस्था रखने की वजह से देश की राजनीति में कुछ नया करने पर अस्पष्ट है, इसलिए नेपाल में ‘आप इफ़ेक्ट’ का बाज़ार ‘संभावना से भरा है’. बहरहाल अब भारत में गुजरात विकास मॉडल द्वारा ‘आप करिश्मे’ को हड़प लिए जाने के बाद बाबुराम जैसे आधारहीन और रीढ़विहीन राजनेताओं के लिए भारतीय बामपंथी मुखौटों की तरह ही ‘आम आदमी’ की बहती गंगा में हाथ धोना अब मुश्किल लग रहा है. बाबुराम और उनके तथाकथित आम आदमी पार्टी के नेपाली संस्करण का राजनीतिक भविष्य क्या होगा यह तो समय ही बताएगा पर इतना तो निश्चित ही है कि बाबुराम जैसे लोगों को अब मार्क्सवादी-माओवादी मुखौटों की भी जरुरत नहीं रह गयी है.

About the author

पवन के पटेल, लेखक समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में ‘नेपाली माओवाद का समाजशात्र’ विषय में शोध कर रहे हैं, पवन का शोध कार्य नेपाल में 1996 से 2006 तक चले माओवादी जनयुद्ध के उद्गम स्थल थबांग गाँव में माओवादी द्वारा संचालित गाउँ जनसत्ता तथा जनयुद्ध के अंतरसम्बन्ध पर आधारित है। लेखक नेपाल में भारतीय हस्तक्षेप के खिलाफ गठित भारत-नेपाल जनएकता मंच के पूर्व महासचिव भी रह चुके हैं।