नेहरू विरासत नहीं अब एक ठोस विचार है

पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयन्ती पर विशेष – जगदीश्वर चतुर्वेदी पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में जितनी ऊल-जुलूल बातें लिखी गयी हैं संभवतः इतनी बातें किसी नेता के बारे में नहीं कही गयी हैं। संघ और दूसरे नेहरू विरोधियों की विगत60-65 सालों में सारी शक्ति नेहरू के चरित्र को कलंकित पर खर्च हुई है। यह …
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पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयन्ती पर विशेष

जगदीश्वर चतुर्वेदी

पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में जितनी ऊल-जुलूल बातें लिखी गयी हैं संभवतः इतनी बातें किसी नेता के बारे में नहीं कही गयी हैं।

संघ और दूसरे नेहरू विरोधियों की विगत60-65 सालों में सारी शक्ति नेहरू के चरित्र को कलंकित पर खर्च हुई है। यह गपोढ़ी लेखन है, पीत पत्रकारिता का हिस्सा है। अफवाहें इसकी धुरी है। इस तरह के लेखन ने नेहरू के वास्तव लेखन और वास्तव जीवनानुभवों को एक सिरे से आम जनता की स्मृति से गायब कर दिया है।

इस तरह के गपोढ़िया लेखन के खिलाफ आम जनता और कांग्रेसजनों को शिक्षित करने का काम सही ढँग से कांग्रेस के नेताओं ने भी नहीं किया। उन्होंने नेहरू के बारे में लिखी जा रही गप्पों की उपेक्षा की या फिर उसे नेहरू परिवार का निजी मसला बना दिया।  

यह सच है नेहरू में भी अनेक किस्म की इंसानी कमजोरियाँ थीं, लेकिन किसी भी व्यक्तित्व का आकलन कमजोरियों पर नहीं उसके गुणों और एक्शन के आधार पर होता है। खासकर नेहरू जैसी राष्ट्रीय शख्सियत के बारे में बातें करते समय हमें तथ्य और सत्य के बारे में बहुत संयम और विवेक से काम लेने की जरुरत है।

संघियों ने विगत 60सालों में बहुत बड़ा काम यह किया है कि उन्होंने नेहरू की इमेज को तरह-तरह से कालिमायुक्त बनाया है, उनके बारे में असत्य का जमकर प्रचार किया है। आज यदि वे नेहरू को माला पहनाते नजर आते हैं तो यह उनका नाटक है और मजबूरी भी है।

नेहरू के आचार, विचार, व्यवहार आदि के बारे में संघ अपने लोगों में घृणा की हद तक प्रचार करता रहा है। संयोग की बात है इन दिनों वे केन्द्र की सत्ता पर काबिज हैं। उनके नेहरू के प्रति नजरिए की साफ झलक आज इससे मिल रही है कि प्रधानमंत्री मोदी, नेहरू जयन्ती पर देश से गायब हैं, जबकि वे आराम से म्यांमार से लौटकर दिल्ली आकर नेहरू जयन्ती मनाकर फिर विदेश दौर पर जा सकते थे, लेकिन उनकी अनुपस्थिति ने साफ संदेश दिया है कि वे नेहरू का सम्मान नहीं करते। ऐसा करके मोदी सरकार और स्वयं मोदी राजनीतिक गैर-जिम्मेदारी निभा रहे हैं और उसे विभिन्न किस्म के बहानों की आड़ में छिपा रहे हैं।  

 हमें याद रखना चाहिए कि मोदी सरकार सभी किस्म के पुराने लोकतांत्रिक कन्वेंशनों और मर्यादाओं को क्रमशः तोड़ रही है, उससे भी दुखद बात यह कि इस गलत काम में मीडिया और भक्तगण, बुद्धिजीवियों का समुदाय चुप रहकर समर्थन कर रहा है।

नेहरू का हमारे देश में सामान्य प्रधानमंत्री का स्थान नहीं है। उन्होंने स्वतंत्र भारत का निर्माण किया, ऐसे भारत का निर्माण किया है जिसके पास आधुनिक युग में साहस और शक्ति के साथ खड़े होने की क्षमता है, उसके पास बेशुमार औद्योगिक और बौद्धिक संपदा है। नेहरू की भूमिका को हमें संस्थान निर्माता और देश निर्माता के रूप में देखना चाहिए।  

 यह सवाल भी उठा है कि कांग्रेस ने 125वीं जयन्ती के जलसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को न बुलाकर अनुदार रुख का परिचय दिया है। हम नहीं जानते कि कांग्रेस ने मोदी को क्यों नहीं बुलाया, लेकिन हमारा मानना है नेहरू जयन्ती में ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं बुलाना चाहिए जिसकी धर्मनिरपेक्षता में आस्था न हो या जो बार बार धर्मनिपेक्षता को कलंकित करता रहा हो। जिसका हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव को बिगाड़ने और बिगाड़ने वालों को संरक्षण देने का रिकॉर्ड हो। नेहरू लुच्चे, लफंगे, अपराधी, माफिया और साम्प्रदायिक ताकतों की विरासत का हिस्सा कभी नहीं बन सकते। नेहरू के बारे में जिन्होंने अहर्निश निंदा और घृणा का प्रचार किया है उनको तो नेहरू जयन्ती पर चिह्नित किया ही जाना चाहिए।

यह संयोग है कि मोदी प्रीएम हैं और संविधान के नाते वे धर्मनिरपेक्षता की बातें करते हैं लेकिन उनके समूचे आचरण में धर्मनिरपेक्षता के लक्षण एक सिरे से नदारत हैं। सिर्फ पीएम होने मात्र से नेहरू की विरासत और विचारों से जुड़ने का मोदी को हक नहीं मिल जाता। नेहरू विरासत नहीं अब एक ठोस विचार है। वह संस्थानों की शक्ल ले चुका है। कांग्रेस को भी नेहरू से सीखने की जरुरत है उसे अपराधियों-हिंसकों और लुटेरों का दल बनने से बचना चाहिए। नेहरू की विरासत को इन तत्वों को साथ रखकर बचाया नहीं जा सकता।

 कांग्रेसजन ध्यान दें नेहरू से सीखने लायक मूल्यवान चीज कौन सी है ? नेहरू कहते थे सबसे मूल्यवान है मौजूदा वक्त से हमारा लगाव। कांग्रेसजनों का मौजूदा समाज से लगाव कम हुआ है। वे मौजूदा दौर की वास्तविकताओं को विभिन्न धंधों में ले जाकर डुबो चुके हैं। वे जनता की आंखें नहीं पढ़ पाते। वे आम जनता के हितों के बारे में कम से कम सोचते हैं। जबकि जरुरत है ज्यादा से ज्यादा सोचने की। नेहरू इसके खिलाफ थे कि वारिस बनें। भारत में वारिस बनने का रिवाज है और यह पुरानी संक्रामक बीमारी है। नेहरू वारिस होना खतरनाक मानते थे। फलश्रुति यह कि कांग्रेस वारिस बनने की बीमारी से बचे। नेहरू को आचरण का अंग बनाए, जनता के जीवन संघर्षों में उतरे, बयानबाजी की संस्कृति को विदाई दे, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी आदि सभी आम जनता के संघर्षों की सड़कों पर अगुवाई करें।

नेहरू के विचारों की रक्षा के लिए जनता में जाना बेहद जरूरी है, उन नीतियों को बदलना जरूरी है जो नेहरू के नजरिए का विरोध करती हैं, कांग्रेस ने यह पाप तो किया है उसने नेहरू के सपने के सार्वजनिक क्षेत्र को प्लेट में सजाकर कारपोरेट घरानों को सौंपा है। इस तरह उसने नेहरू के सपनों को क्षतिग्रस्त किया है। नेहरू के विचारों की रक्षा का काम बहुआयामी है, इसके लिए बहुआयामी रणनीति अपनाने की जरुरत है।

November 14,2014 06:17