बी. एच. यू. को न्याय चाहिए तो लेने होंगे बड़े फ़ैसले

संजीव ‘मजदूर’ झा. न्याय के लिए धरने पर बैठे लोगों को छोड़ कोई सुध न लेना सत्ता की आदत हो गई है और बार-बार असफ़ल नीतिओं को अपनाना हमारी मानसिकता बन गई है. छात्राओं को यह मान लेने में अब कोई हर्ज नहीं होनी चाहिए कि उनकी लड़ाई में मजबूती के साथ उनकी बिरादरी के …
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संजीव ‘मजदूर’ झा.

न्याय के लिए धरने पर बैठे लोगों को छोड़ कोई सुध न लेना सत्ता की आदत हो गई है और बार-बार असफ़ल नीतिओं को अपनाना हमारी मानसिकता बन गई है. छात्राओं को यह मान लेने में अब कोई हर्ज नहीं होनी चाहिए कि उनकी लड़ाई में मजबूती के साथ उनकी बिरादरी के लोग ही खड़े रह सकते हैं. और वह विरादरी स्त्री-विमर्श की पैरोकार संगठनें नहीं बल्कि सिर्फ़ छात्र और छात्राएं हैं. सरकारी पदों पर नियुक्त महिलाएं भी नहीं सिर्फ़ छात्र और छात्राएं हैं.

कंगना राणावत के हालिया उत्पीड़न सम्बन्धी इंटरव्यू पर कई गोष्ठियां हो गई, बंद ए. सी. कमरों में बिसलेरी का पानी पी-पी कर विद्वान् सरकारी महिलाओं ने असंख्य तालियाँ बटोर लिए लेकिन कंगना के उस वाक्य पर चिंता जाहिर नहीं किया गया जिसमें वो कहती है कि महिलावादी संगठनों ने पैसा खाकर मदद करने से मुंह मोड़ लिया. अभी भी कितनी लेखिकाएं-लेखक इस विषय पर शानदार पुस्तक, कहानी या कविता का प्लाट तैयार कर चुके होंगे और संभव हुआ तो उसका विमोचन वे उसी बी. एच. यू. में उन्हीं लोगों के हाथ मंच पर करवाएंगी जिन हाथों ने वहां की लड़कियों के कपड़े ही नहीं फाड़े बल्कि उन्हें उनके कमरों में कैद कर पीटा भी. यह सब खुले-आम हो रहा है और खुले आम इस संघर्ष से मुंह मोड़ा जा रहा है.

दिल्ली के महिलावादी संगठनों और इससे सम्बंधित पुरुष-महिलाओं की उपेक्षा ने तो संगठित होने के जैसे सारे मार्ग बंद कर दिए हैं. स्त्री-विरोधी एक शब्द लिखने पर इनका मोर्चा निकल आता है. जीरो टॉलरेंस से लेकर विशाखा पर संगोष्ठियाँ तय हो जाती हैं, दिल्ली की चमचमाती सड़कों पर, कैमरों से लैश इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जल जाती हैं लेकिन जहाँ प्रत्यक्ष गुंडा-गर्दी हो रही है वहां इसे रोकने की कोई योजना तक इनके पास नहीं है. और ये सब तब हो रहा है जबकि बिहार-यू.पी. की ये छात्राएं दिल्ली की रैलियों में भाग लेने से कभी नहीं कतराती.

जे. एन. यू. के एस.एफ़.आई और आइसा के साथियों को भी समझना चाहिए कि यह एक बड़ा हादसा है इसमें सिर्फ विडियो के मार्फ़त सपोर्ट से काम नहीं चलने वाला. अगर आपके यहाँ  प्रदर्शन और रैलियों में सबकी सहभागिता जरुरी है तो बी.एच.यू की लड़कियों में क्या कमी है कि वहां दिल्ली की सहभागिता रिक्त है.

अब जहाँ तक बी. एच. यू. में प्रदर्शन कर रही छात्राओं की बात है तो वहां से जिस तरह शहला राशिद या अन्य छात्र संगठन खासकर वामपंथी संगठनों को आने से मना किया जा रहा है यह भी ठीक नहीं है. हाँ, इस बात की पुख्ता जानकारी भी जरुरी है कि क्या ऐसा वहां की आन्दोलनकारी छात्राएं कह रही हैं या हमेशा की तरह आन्दोलनों में धूर्तता के साथ शामिल abvp के लोग?

अगर ये दोनों बातें सही भी हैं तब भी वहां प्रत्यक्ष सहभागिता ही एक मात्र नीतिगत फैसला होना चाहिए. लोहिया ने कहा था कि- जिंदा कौमें पांच साल तक का इंतजार नहीं करती है. और जो लोग 5 वर्ष वाले हैं ख़ासकर देश के बूढ़े-बुजुर्ग, हमारे पिता-भाई वो भी आँख खोलकर देख लें कि आपने अपने होनहार बच्चियों के लिए कैसी सरकार चुन कर दी है जो आपके ही सामने आपकी संतानों के जिस्म को खरोच-खरोच कर लोकतंत्र का मजाक उड़ा रही है.

अगर बी.एच.यू में न्याय चाहिए तो दिल्ली के सभी महिलावादी संगठनें, लेखिकाएं बनारस में प्रतिरोध करने की घोषणा करे. और यदि उनसे यह नहीं होने वाला तो वहां आंदोलन कर रही छात्राएं देश भर के छात्र-छात्राओं से अपील करे कि वो वहां आए. अगर झंडे या पार्टी बैनर से दिक्कत है तो उसके बगैर आने को अपील कीजिए, लोग तब भी आएंगे. सत्ता युवाओं के केंद्रीकरण से हिलाया जा सकता है. कुछ लोगों की टीम बनाकर इस कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए.

हम सभी आपके उस अपील को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाते हुए बनारस तक की दूरी तय करेंगे. इसलिए इस लड़ाई को फैलाइए तभी न्याय मिल पाएगा और तभी हम आज के इस वहशी सत्ता को चुनौती दे पाएंगे.