भाजपा की साजिश के अगले शिकार ‘मंजर’

वसीम अकरम त्यागी सियासत कैसे-कैसे खेल खेलती है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उर्दू के मशहूर शायर मंजर भोपाली के नाम से एक पैम्फलेट जारी किया गया जिसमें नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने, उसे कबूल करने पर जोर दिया गया, पैम्फलेट सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता बल्कि उसके आखिर में लिखी …
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वसीम अकरम त्यागी
सियासत कैसे-कैसे खेल खेलती है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उर्दू के मशहूर शायर मंजर भोपाली के नाम से एक पैम्फलेट जारी किया गया जिसमें नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने, उसे कबूल करने पर जोर दिया गया, पैम्फलेट सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता बल्कि उसके आखिर में लिखी पंक्तियां कुछ इस तरह हो जाती हैं – अजान में मोदी/ कुरआन में मोदी/ आगाज में मोदी/ नमाज़ में मोदी/ अब तो मान लो रसूल हैं मोदी/ दिल से कह दो कबूल हैं मोदी।

जिस शायर के फोटो के साथ इस असामाजिक नज्म को प्रकाशित किया गया, दुनिया उसे मंजर भोपाली के नाम से जानती हैं। भोपाल के समाचार पत्रों में बीते दो अप्रैल को इस नज्म को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। मुस्लिम समुदाय में इस नज्म को लेकर गुस्से की लहर है। जब इस बारे में मंजर भोपाली से बात की गई तो उन्होंने कहा कि यह माहौल को खराब करने की साजिश है, उन्होंने काफी तफ्तीश करने के बाद उस शख्स को ढूंढ निकाला जिसने यह नज्म मंजर भोपाली के नाम से प्रकाशित कराई थी। उन्होंने कहा कि यह नज्म गुजरात के रहने वाले मोदी सेना के कार्यकर्ता ने प्रकाशित कराई है, जिसकी शिकायत आईटी सेल में कर दी गई है। लेकिन सोशल नेटर्किंग साईट फेसबुक और वाट्सअप पर यह नज्म आग की तरह फैल चुकी है।

मंजर भोपाली ने कहा कि सैक्यूलर दलों की तरफ से इसकी निंदा सबसे पहले होनी चाहिये थी जो अभी तक नहीं हो पाई है, जबकि उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। बीते 12 फरवरी को इसे टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित किया गया था जिसमें मंजर भोपाली की तरफ इस तरह की हरकतों करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की गई थी। उन्होंने बताया कि था जब हमने आईटी सेल में इसकी शिकायत दर्ज कराई और कार्रावाई करने की मांग की तो उन्होंने दो टूक कहा कि सोशल साईटें यूएसए से संचालित होती हैं इसलिये ऐसी सामग्री पर प्रतिबंध लगाना उनके बस में नहीं है। बहरहाल सुनते आये थे कि जमीर फरोश लोग ही सियासत को अपना पेशा बनाते हैं। इस कारनामे के बाद देख भी लिया कि सियासी लोग किस तरह समाज को वर्गों में, हिस्सों में, तक्सीम कर देते हैं। मंजर भोपाली का एक शेर यहां दौरान ऐ गुफ्तगू है- जिसको भी आग लगाने का हुनर आता है/ वही ऐवान सियासत में नजर आता है । जाहिर सी बात है उनका ये शेर इस हादसे के बाद किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा। भाजपा जानती है कि उसके इस कुकर्म से समाज में टकराव होगा और जिसका परिणाम सांप्रदायिक दंगा भी हो सकता है जिससे उसको सीधे – सीधे बगैर जमीनी मेहनत के वोटों की फसल काटने का मौका मिल जायेगा। इस तरह की गैर समाजिक घटनाऐं होती रहती हैं और अपने आपको सेक्यूलर कहने वालों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया, किसी तरह का निंदनीय बयान तक नहीं आता जिससे सांप्रदायिक ताकतों के हौसले और बुलंद हो जाते है, वे समाज में जैसा जहर फैला रहे हैं उसके नतीजे बहुत ही बुरे होंगे, क्या यही राष्ट्रवाद होता है कि एक दूसरे के पूर्वजों को गाली दी जाये उनको बुरा भला कहा जाये ? जिससे लोगों के जहनों में अघोषित शीत युद्ध चलता रहे, उनका ध्यान रोजमर्रा के मुद्दों से भटका रहे। पार्टी विशेष एक व्यक्ति विशेष को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिये और कितना गिरेगी ? क्या क्या षडयंत्र करेगी ? कभी मंदिर से शिवलिंग की जगह व्यक्ति विशेष की फोटो लगाई जाती है, तो कभी उसी व्यक्ति को समाज पर संप्रदायिक विशेष का पैगंबर बनाकर थोपा जा रहा है वह भी झूठे प्रचार के साथ। एक तीर कई निशाने यानी कि मंजर भोपाली को पूरी तरह नेस्ते नाबूद कर दिया जाये उर्दू अदब में जो काम उसने किया है उसे दरकिनार कर उसके खिलाफ दुष्प्रचार किया जाये कि उसने मोदी की तुलना रसूल से की है, और जब वह अपनी सफाई में कुछ कहे तो उसकी आवाज को दबा दिया जाये, क्या यही है तथाकथित राष्ट्रवादियों का राष्ट्रवाद ? जिसमें नागरिकों की धार्मिक आथाओं उनके पूर्वजों को हिटलर और मुसेलिनो को आदर्श मानने वालों के साथ जोड़ा जाये ? जबकि होना तो यह चाहिये था कि किसी की धार्मिक भावना को कोई ठेस न पहुंचे, सब शान्ति से रहे उन्हें आपस में न लड़ाया जाये कि इससे देश की छवी खराब होती है, असली राष्ट्रवाद तो वही होता है जिसमें राष्ट्र के साथ – साथ नागरिकों से भी उतनी ही मौहब्बत की जाये जितनी राष्ट्र से की जाती है क्योंकि कोई भी राष्ट्र व्यक्तियों से बनता है। आरती और अजान में हिटलर को आदर्श मानने वालों को शामिल करके देश के नागरिकों की आस्था को ठेस पहुंचती है क्या इतना भी नहीं जानते तथाकथित राष्ट्रवादी ?

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वसीम अकरम त्यागी, लेखक साहसी युवा पत्रकार हैं।