भारतीय राजनीति में “श्वान भावबोध”

राजनीति में मनुष्य बनना दुर्लभ है, पशुवत आचरण करना आसान है! कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब संसद में घृणा भाषण शिरोमणि साध्वी मंत्री की हिमायत में बोल रहे थे तो विलक्षण आयरनी व्यक्त कर रहे थे, इस आयरनी को ‘श्वान’ भावबोध कहते हैं। इस भावबोध की खूबी है कि जो कुत्ता जिस गली-मुहल्ले या इलाक़े …
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राजनीति में मनुष्य बनना दुर्लभ है, पशुवत आचरण करना आसान है! कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब संसद में घृणा भाषण शिरोमणि साध्वी मंत्री की हिमायत में बोल रहे थे तो विलक्षण आयरनी व्यक्त कर रहे थे, इस आयरनी को ‘श्वान’ भावबोध कहते हैं। इस भावबोध की खूबी है कि जो कुत्ता जिस गली-मुहल्ले या इलाक़े में रहता है वह वहीं रहे, अन्य के इलाक़े में आए न जाए! यदि कोई कुत्ता इलाक़ा अतिक्रमण करता है तो दूसरे इलाक़े के कुत्ते हल्ला करने लगते हैं। तब तक भोंकते हैं जब तक वह वापस अपने इलाक़े में न चला जाय। संघ-मोदी और भारतीय राजनेताओं की कमोबेश दशा ‘श्वान भावबोध’ वाली है। जो हिन्दुत्ववादी है वह अपनी सीमा में रहे। जो धर्मनिरपेक्ष है वह अपने दायरे में रहे। जो समाजवादी और साम्यवादी है वह अपने इलाक़े में रहे! यदि अपने इलाक़े से निकलकर जाने की कोशिश की तो बस ख़ैर नहीं।
श्वान भावबोध की दूसरी विशेषता है ग़ुलामी ! कुत्ते एक-दूसरे पर भोंकते हैं और गरमाते रहते हैं। लेकिन ग़ुलाम भाव बरक़रार रखते हैं। भारतीय राजनेताओं की भी यही दशा है, वे बड़ी पूँजी की पशुवत ग़ुलामी कर रहे हैं और आपस में भोंक रहे हैं। बड़ी पूँजी की ग़ुलामी से मुक्ति का नेताओं और दलों के पास कोई विकल्प नहीं है। आयरनी यह है कि प्रत्येक दल श्वान भावबोध में आकंठ डूबा है और अपने को भोंक-भोंककर बेहतरीन कुत्ता होने का दावा कर रहा है।
श्वान भावबोध ही है जो संघ- मोदी को हिन्दुत्व के फ्रेम से बाहर नहीं निकलने दे रहा ! इन दिनों संघ-मोदी ख़ूब कोशिश में हैं कि वे अपने दफ़्तरों और जलसों में धर्मनिरपेक्ष नेताओं की इमेजों का इस्तेमाल करें, संसद चलने दें। मोदी, संसद में हेकड़ी में नहीं, भेड़ जैसी आवाज़ में मिमियाते बोल रहे हैं। आयरनी देखिए जिस घृणाभाषा ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाया उसी घृणा भाषा के लिए मोदी साध्वी को डाँट रहे हैं। साध्वी माफ़ी माँग रही हैं। मोदी अनुरोध कर रहे हैं सांसदो छोड़ दो। वे माफ़ी माँग चुकी हैं। नई मंत्री हैं। ग़रीब हैं।
मोदी-नायडू के कहने का अर्थ है ग़रीब को घृणा का प्रचार करने का जन्मसिद्ध अधिकार है। देखो मुझे मैं आज यहाँ तक जो पहुँचा हूँ वह घृणाभाषा के प्रयोग के कारण ही पहुँचा हूँ। तुम लोग भी यदि प्रधानमंत्री बनना चाहते हो तो मेरे फ़ार्मूलों पर चलो मौज ही मौज करोगे। घृणा और राजनीतिक मौज का यह संगम सिर्फ़ श्वान भावबोध में ही संभव है।
श्वान भावबोध ने समाज, संसद से लेकर टीवी टॉक शो तक अपने पैर पसार लिए हैं। यह संभव है कि श्वान भावबोध पढ़कर किसी भी नेता की भावनाएँ आहत हों लेकिन हमारा मक़सद किसी को आहत करना नहीं है। मोदी पीएम हैं, साध्वीजी मंत्री हैं, अन्य लोग भी सम्माननीय पदों पर हैं हम उनका सम्मान करते हैं, लेकिन श्वान भावबोध से मुक्त होकर ये लोग राजनीति करें तो शायद राजनीति को पशुता से मनुष्यता की ओर ठेलने में मदद मिले।
O- जगदीश्वर चतुर्वेदी