मध्यवर्ग का चरित्र उजागर करते हैं प्रेमचंद

प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाया प्रेमचंद का जन्मदिवस शोषण पर आधारित व्यवस्था कायम है उसका चरित्र कार्पोरेट और सांप्रदायिक हो चुका है इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई ने कथा सम्राट और उपन्यासकार प्रेमचंद को उनके 135 वें जन्मदिवस पर याद किया। अहिल्या लायब्रेरी में 31 जुलाई को आयोजित कार्यक्रम में प्रेमचंद की कहानियों …
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प्रगतिशील लेखक संघ ने मनाया प्रेमचंद का जन्मदिवस
शोषण पर आधारित व्यवस्था कायम है उसका चरित्र कार्पोरेट और सांप्रदायिक हो चुका है
इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई ने कथा सम्राट और उपन्यासकार प्रेमचंद को उनके 135 वें जन्मदिवस पर याद किया। अहिल्या लायब्रेरी में 31 जुलाई को आयोजित कार्यक्रम में प्रेमचंद की कहानियों और आलेखों के पाठ के साथ परिचर्चा हुई।
जयपुर से आए शैलेंद्र चौहान ने प्रेमचंद की रचनाओं में मध्यमवर्ग के चरित्र-चित्रण को रेखांकित किया।
विनीत तिवारी ने देश में खेती की स्थिति के बारे में आंकड़ों के साथ अपनी बात रखी। कार्यक्रम में प्रोफेसर, विद्यार्थी, लेखक, पत्रकार मौजूद थे।
प्रेमचंद की कहानी सभ्यता का हुनर का पाठ सारिका श्रीवास्तव ने किया। विनीत तिवारी ने प्रेमचंद की कहानी समस्या का पाठ किया। प्रेमचंद के किसान संबंधी आलेख का वाचन भी कार्यक्रम में किया गया।
लेखक और कवि शैलेंद्र चौहान ने कहा कि प्रेमचंद 1935 के पहले ही अपनी रचनाओं में यह बता चुके थे कि मध्यवर्ग का चरित्र बिचौलिया किस्म का है। वह शासन का पैरोकार है। उसकी किसानों और मजदूरों से कोई सहानुभूति नहीं है। वहीं मध्यम वर्ग का एक हिस्सा समस्याओं के हल के लिए आंदोलनों की आवश्यकता का हिमायती है, वह आंदोलनों की वैचारिक स्थितियां बनाने में आगे तो रहता है लेकिन आंदोलन शुरू नहीं कर पाता। वहीं प्रेमचंद अपनी रचनाओं में न केवल किसानों और मजदूरों की समस्याओं को उभारते थे बल्कि उनके हल का खाका भी खीचते थे। प्रेमचंद लोगों से संगठित होकर आंदोलन कर अपना हक हासिल करने के हामी थे जिसका कि जिक्र उनकी रचनाओं और आलेखों में मिलता है। आजादी के बाद भी किसानों की हालत में बहुत बदलाव नहीं आया है। वे आत्महत्याएं कर रहे हैं। शोषण पर आधारित व्यवस्था कायम है उसका चरित्र कार्पोरेट और सांप्रदायिक हो चुका है।
प्रेमचंद के लेखों में किसान संकट पर आधारित आलेख के वाचन में बताया गया कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में किसान के संकट की व्यथा को रेखांकित करने के साथ ही किसानों के संगठित प्रतिरोध की जरूरत भी बताई थी। प्रेमचंद ने औपनिवेशिक समय में किसान-जीवन के जिस भीषण यथार्थ को अपनी चिंता का विषय बनाया था वह आज और विकट बनकर हमारे सामने खड़ा है।
हतभागे किसान नामक आलेख में प्रेमचंद कहते हैं कि भारत के अस्सी फीसदी आदमी खेती करते हैं। कई फीसदी वे हैं जो अपनी जीविका के लिए किसानों के मुहताज हैं, जैसे बढ़ई लोहार आदि। हमारे स्कूल, कालेज, पुलिस, कचहरियां सब किसानों की कमाई की बदौलत ही चलती हैं। लेकिन जो राष्ट्र के अन्न और वस्त्र दाता हैं वही भरपेट अन्न को तरसते हैं।
कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश महासचिव विनीत तिवारी ने भारतीय कृषि के वर्तमान परिदृश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देश में प्रति व्यक्ति खेती की जोत का औसत 0.36 हेक्टेयर प्रतिशत है। दो दशक में खेती की जमीन 33 मिलियन हेक्टेयर कम हुई है। देश में किसी किसान को खेती पर आश्रित रहने के लिए कम से कम दो हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। आजादी के बाद से खेती के प्रश्न को हल करने की दिशा में किसी भी सरकार ने कोई पहलकदमी नहीं की है। जो भूमि सुधार कार्यक्रम आए थे वे पूंजीपति वर्ग के दबाव में शासक वर्ग लागू नहीं कर सका। यह सवाल वर्गीय सवाल है, जिसे भूमि सुधार समेत संपूर्ण आर्थिक ढांचे की पुनर्संचरनचा करके हल किया जा सकता है। प्रेमचंद ने अपने वक्त में इन सवालों को उठाया था जिसके लिए उन्हें साधुवाद। देश की 60 फीसदी आबादी गांवों में रह रही है और 45 प्रतिशत आबादी शहरों में। यह 60 फीसदी खेती पर ही निर्भर है लेकिन इनमें भी 40 फीसदी लोग भूमिहीन हैं। शेष 60 फीसदी में 90 प्रतिशत के पास कुल 9.5 प्रतिशत जमीन है। 10 प्रतिशत लोगों के पास ज्यादातर जमीन समेत अन्य संसाधन हैं। इस तरह सारे संसाधन छोटे तबके तक ही सीमित हैं।
कार्यक्रम में प्रोफेसर शोभना जोशी, इंजीनियर संजय वर्मा, कामरेड चुन्नीलाल वाधवानी, ब्रजेश कानूनगो, केसरीसिंह चिढार, मुकेश पाटीदार, नवेंदु महोदय, दीपाली चौरसिया, नेहा दुबे, किरण सोलंकी, कृतिका वाजपेयी आदि मौजूद थे। अध्यक्षता की प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष एसके दुबे ने। अभार माना केसरी सिंह चिढार ने।
-अभय नेमा

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