मुमजो ने जो बनारस में बोया है मोदी को वही काटना है

अब अयोध्या नहीं काशी मुमजो ने जो बनारस में बोया है मोदी को वही काटना है, यह भाजपा के साथ मोदी को भी समझना चाहिए अंबरीश कुमार नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार काशी से चुनाव लड़ेंगे। यह चैनल की खबर है। इसी खबर के आधार पर टिपण्णी की जा रही …
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अब अयोध्या नहीं काशी
मुमजो ने जो बनारस में बोया है मोदी को वही काटना है, यह भाजपा के साथ मोदी को भी समझना चाहिए
अंबरीश कुमार 
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार काशी से चुनाव लड़ेंगे। यह चैनल की खबर है। इसी खबर के आधार पर टिपण्णी की जा रही है। नब्बे के दशक से भाजपा जो राजनीति करती रही है अयोध्या उसके केंद्र में रहती थी। सारे वादे और कसमें अयोध्या के नाम की ही होती थी। राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। बच्चा बच्चा राम का,राम लला के काम का। बाद में जब मीडिया जुटने लगा तो राम भक्त भी कारसेवक पत्रकारों की सेवा में जुटे और राम लला वाले बदल कर हो गया,बच्चा बचा राम का क्या इंतजाम है शाम का।
खैर आज देर रात जैसे ही भाजपा कार्यालय से मीडिया को खबर मिली वाराणसी में “आज तक” का संवाददाता भाव विभोर नजर आया। अभी अधिकारिक घोषणा नहीं हुयी थी पर वह उत्साह से लबरेज भाजपा दफ्तर पर मोदी समर्थकों से पूछ रहा था- अब तो घोषणा हो गयी है, मोदी के बनारस से लड़ने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है। समर्थक जो होली के रंग में पूरी तरह डूबे हुये थे बोले, अब सब उड़ जायेंगे। मोदी के यहाँ से लड़ने का असर उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर ओडिशा तक होगा।
…हालाँकि इस प्रकार का असर चक्रवात में तो होता है कि आसपास के राज्य के साथ तटीय राज्य तक असर पड़े पर राजनीति और चुनाव में यह असर नहीं दीखता। खैर पहले उस अयोध्या को देखे जिसे भाजपा ने इस्तेमाल किया और कूड़े के ढेर पर फेंक दिया। कुछ साल पहले जो मैंने लिखा था उसे फिर दोहराना और पढ़ाना चाहता हूँ।

‘ख्वाजा हैदर अली आतिश, मीर अनीस, चकबस्त और बेगम अख्तर का फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी तैयारी में जुटा है। फैजाबाद से अयोध्या में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुये यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है। आज दूसरे दिन फिर हुये फ्लैग मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी। हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान, सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिये काफी है। जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनबी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते हैं। फूल-माला, चूड़ी, सिंदूर टिकुली, खड़ाऊ और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है। सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है। और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए। पिछले एक दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद-अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है। कांचीपुरम से लेकर तिरुपति और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ पूरी तरह बदल चुके हैं वही अयोध्या वहीं खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था। यही अयोध्या जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नहीं उठाई। न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया केंद्र बनाया गया। गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नहीं है जो इसका इतिहास बता सके। राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है। अंग्रेजों से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुये थे। बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा तो क़तर-ए- खून न निकला, जैसे नायब शेरों का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश, पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया। हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया। पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नहीं बची है। फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा- अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है। न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का। एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है। जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है। प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नहीं शुरू हुयी पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंस की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है। जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है, लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है। एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुयी है वहीं मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ।
राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है। इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है। आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया। यही वजह है क्योंकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नहीं होता जो पहले होता था। कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथों-हाथ लिये जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते हैं बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण। विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नहीं बचाया। नुक्सान किसका हुआ, हिन्दुओं का। क्या वहां नमाज पढ़ी जाती थी, वहां तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुड़वा दिया गया। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा- कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते हैं और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है।’

बस इतना ही अयोध्या की बानगी दिखाने के लिये काफी है। अब बारी बनारस की। यह भाजपा का वह गढ़ है जो सबसे ज्यादा बदहाल है। इसकी जिम्मेदारी विकास पुरुष की पार्टी और नेताओं की है। जिन्होंने अयोध्या का इस्तेमाल कर उसे कूड़े का ढेर बना रखा है वे उस बनारस को जो उन्हीं के पास था कितना विकसित करेंगे यह सवाल तो उठता ही है। पहले राम लला का नारा चला फिर अब ‘हर हर मोदी – घर घर मोदी’ का नारा है। इसके बाद अगले चुनाव के लिये मथुरा बचा हुआ है जहाँ कोई राधे-राधे कहता अवतरित हो जाये तो हैरान नहीं होना चाहिए। जोशी जी ने जो बनारस में बोया है मोदी को वही काटना है यह भाजपा के साथ मोदी को भी समझना चाहिए।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

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