शक्ति के स्रोतों में लैंगिक विविधता की जरूरत

एच एल दुसाध लोकसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर है। तमाम दल ही लोगों के विभिन्न तबकों के मतदाताओं को आकृष्ट करने के लिए वादों की झड़ी लगाने में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। जब सबको लुभाने का प्रयास चल रहा है तो आधी आबादी ही कैसे अछूती रहती। इस दिशा में …
 | 

एच एल दुसाध
    लोकसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर है। तमाम दल ही लोगों के विभिन्न तबकों के मतदाताओं को आकृष्ट करने के लिए वादों की झड़ी लगाने में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। जब सबको लुभाने का प्रयास चल रहा है तो आधी आबादी ही कैसे अछूती रहती। इस दिशा में अभी तक सबसे मत्वपूर्ण पहल कांग्रेस के राहुल गाँधी की ओर से हुई है। उन्होंने हाल ही में कहा है-‘जब तक हम महिलाओं को सशक्त नहीं करेंगे ,भारत महाशक्ति नहीं बन सकता।’ उन्होंने महिला सशक्तिकरण की पुरजोर वकालत करते हुए आगे कहा- ‘हम महिलाओं को सियासत में बराबरी देना चाहते हैं… पंचायतों, विधानसभाओं, संसद में ज्यादा महिलाएं दिखनी चाहिए। हम इस देश की प्रगति में महिला शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं। हम महिलाओं के लिए स्कूलों, अस्पतालों और संसद का दरवाजा खोलना चाहते हैं क्योंकि इनके बगैर कोई प्रगति नहीं है।’ उन्होंने यह भी कहा कि उनकी तमन्ना है कि ऐसे दिन आएं जब महिलाएं बिना किसी डर-भय के शाम में, रात में निकल सकें, बसों में सफ़र कर सकें। मैं चाहता हूँ कि सुरक्षा आज़ादी और बिना किसी भय के उनका प्रतिनिधित्व  सभी क्षेत्रों में हो।’
    महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर राहुल गांघी के इस विचारोत्तेजक घोषणा का मुकाबला करने के लिए शीघ्र ही राजनीतिक पार्टियां प्रतियोगिता में उतर सकती हैं। पर सवाल पैदा होता है क्या इससे समय-समय पर ‘विश्व आर्थिक मंच’ द्वारा ‘ग्लोबल जेंडर गैप’ को लेकर किये जाने वाले अध्ययन में भारत की जो स्थिति उभरती है उसमें संतोषजनक सुधार आ सकता है?
   स्मरण रहे पिछले कई सालों से जेंडर गैप पर जो रिपोर्ट प्रकाशित हो रही है, उसमें  भारत की स्थिति सवा सौ देशों में अक्सर निचले पायदान पर दिखती है। इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान प्रकाशित ‘इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन’ की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के औसतन 21.8 प्रतिशत के मुकाबले भारत में महिला सांसदों की हिस्सेदारी मात्र 11 प्रतिशत है एवं इस मामले में भारत 111 वें स्थान पर है। राजनीति की तरह ही यदि आर्थिक, सांस्कृतिक इत्यादि तमाम क्षेत्रों में भारतीय महिलाओं की स्थिति का जायजा लिया जाय तो लगभग वही स्थिति सामने आयेगी जो इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन के आकड़े में उभरी है। यही कारण है कि ग्लोबल जेंडर गैप की रिपोर्टों में अकसर भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और यहाँ तक कि नेपाल जैसे पिछड़े राष्ट्र से भी निचले पायदान पर पर नज़र आता है। ऐसे में सोलहवीं लोकसभा चुनाव बाद देश की बागडोर सँभालने जा रहे राहुल गाँधी हों या मोदी या अन्य कोई, यदि उन्हें भारतीय महिलाओं की करुणतर स्थिति को लेकर जरा भी विवेकदंश हो रहा है तो अपने दल के हाईकमांड को सुझाव दें कि महिला अशक्तिकरण के कारणों की ठीक से पहचान करते हुए उसके निवारण की सही कार्ययोजना पार्टी के घोषणा पत्र में प्रस्तुत करें। महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर हमारी शर्मनाक स्थिति का खास कारण यह है कि हमारे राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों ने इनके अशक्तिकरण के कारणों की पहचान की दिशा में गंभीर प्रयास ही नहीं किया।
जहाँ तक भारतीय महिलाओं के अशक्तिकरण का सवाल है उसकी उत्पत्ति का कारण सारी दुनिया की महिलाओं, वंचित नस्लीय व जातीय समूहों, अल्पसंख्यकों तथा गुलाम कौमों से जरा भी अलग नहीं है। मानव जाति के इतिहास का अनुधावन करने पर यह साफ नज़र आता है इन सभी की दुर्दशा का एकमेव सार्वदेशिक कारण यही रहा है कि जिनके हाथों में सत्ता की बागडोर रही उन्होंने शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक- में इन्हें वाजिब हिस्सेदारी नहीं दिया। मसलन सारी दुनिया में अश्वेतों की दुर्दशा इसलिए हुई क्योंकि गोरे प्रभुवर्ग ने इन्हें नरपशु मानते हुए शक्ति के स्रोतों से दूर रखकर अशक्त व लाचार बनाया। अंग्रेजों के शासन में पराधीन हिन्दुस्तानियों और दक्षिण अफ्रीका में मूलनिवासी कालों का अशक्तिकरण इसलिए हुआ क्योंकि गोरे शासकों ने इन्हें शक्ति स्रोतों, विशेषकर आर्थिक और राजनीतिक में स्वतंत्र हिस्सेदारी नहीं दिया। इसलिए हम पाते हैं कि सारी दुनिया के पराधीन कौमों का संघर्ष मुख्यतः शक्ति के स्रोतों में अपने वाजिब शेयर के लिए हुआ। सारी दुनिया में महिलाओं की दुर्दशा इसीलिए हुई कि पुरुष शासित समाज ने उन्हें शक्ति के स्रोतों से वंचित रखा। हजारों साल से दलित-पिछड़ों के अशक्तिकरण का यही कारण रहा कि इन्हें हिन्दू शासन व्यवस्था में कई हज़ार सालों से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर चिरस्थाई तौर पर अशक्त बना दिया गया।
 अब जहाँ तक भारतीय महिलाओं के अशक्तिकरण का सवाल है दलित–पिछड़ों की भाँति उन्हें भी हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रहना पड़ा। दलित पिछड़ों की भांति उन्हें भी जीवन के कथित चरम लक्ष्य  मोक्ष के अध्यात्मानुशीलन निषेध रहा। जिस तरह दलित-पिछड़ों को मोक्ष मार्ग तीन उच्चतर वर्णों की निष्काम अर्थात पारिश्रमिकरहित सेवा में प्रशस्त करना पड़ता था, उसी तरह महिलायें भी आध्यात्मानुशीलन की जगत पति चरणों में, चाहे पति लम्पट व कुष्ठ रोगी ही क्यों न हो, मोक्ष संधान के लिए अभिशप्त रही। दलित-पिछड़ों की तरह इन्हें भी स्वाधीन रूप से राजनीतिक व विभिन्न आर्थिक गतिविधियों से जुड़ना कठोरता पूर्वक निषिद्ध रहा। आज़ाद भारत में दलित –पिछड़ों को संविधान के सौजन्य से आर्थिक और राजनीति जैसे शक्ति के स्रोतों में कुछ हद तक स्वाधीन रूप से अवसर मिला, पर आजाद भारत में हमारी महिलाएं प्रायः गुलाम ही रहीं। कारण पुरुष प्रधान सत्ता ने उन्हें शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी देने सोच नहीं विकसित की। किन्तु बीसवीं सदी के शेषांश में जिस तरह पश्चिम ने अपनी महिलाओं को शक्ति के सभी स्रोतों में शेयर देकर सशक्त बनाने का अभियान शुरू किया उसका अनुसरण करने के लिए भारत के हुक्मरान भी बाध्य हुए। पर उनकी अशक्ति के कारणों की ठीक पहचान न कर पाने के कारण टुकड़ों-टुकड़ों में शक्ति के कुछ स्रोतों में हिस्सेदारी की हिमायत की,वह भी मुख्यतः जुबानी। परिणामस्वरूप समय-समय पर लैंगिक समानता के जो आकड़े पेश होते रहे, उससे हमें शर्मसार होने के लिए विवश रहे।अब इस स्थिति से देश के भावी कर्णधार अगर जरा भी चिंतित हैं तो महिला सशक्तिकरण की ठोस योजना अपने घोषणापत्र में जारी करने की पहलकदमी करें। योजना शक्ति के स्रोतों में लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन पर आधारित होनी चाहिए। इसके लिए विभिन्न दल यदि पिछली बातें भूलकर यह घोषणा करने में एक दूसरे से होड़ लगाते हैं कि सत्ता में आने पर हम शक्ति के तीन प्रमुख स्रोतों-(1)आर्थिक (न्यायपालिका,मिलिट्री सहित सभी प्रकार की सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों-पार्किंग-परिवहन, फिल्म-मीडिया) इत्यादि; (2)राजनीतिक (ग्राम पंचायतों-शहरी निकाय-संसद– विधान सभा की सीटों और मंत्रिमंडलों इत्यादि ) और (3) धार्मिक (देवालयों की संचालन समिति व पौरोहित्य)-में भारत के चार प्रमुख समाजों की महिलाओं को 50 प्रतिशत हिस्सेदारी देंगे। अगर ऐसी घोषणा करने वाले दल सत्ता में आते हैं तो महिला सशक्तिकरण के लिए कार्यरत संगठनों को सत्ताधारी दल पर शक्ति के स्रोतों में लैंगिक विविधता (जेंडर डाइवर्सिटी) लागू करवाने का अवसर मिल जायेगा। और जब स्वतः स्फूर्त भाव से या दबाव में आकर हमारे शासक जेंडर डाइवर्सिटी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे तो उसके साथ महिला सशक्तिकरण के मामले भारत के विश्व चैम्पियन बनाने का मार्ग भी प्रशस्त हो जायेगा। क्या राहुल-मोदी और एनजीओ गैंग का सरगना महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर भारत को विश्व श्रेष्ठ के रूप में देखने के लिए इच्छुक हैं?
 

About the author

एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।