‘न्यू लेफ्ट रिव्यू’ में अचिन वनायक का लंबा लेख : ‘प्रभुत्व’ पद की जड़ समझ से उत्पन्न एक ऊबाऊ सैद्धांतिक बकवास

‘न्यू लेफ्ट रिव्यू’ में अचिन वनायक का लंबा लेख : ‘प्रभुत्व’ पद की जड़ समझ से उत्पन्न एक ऊबाऊ सैद्धांतिक बकवास –अरुण माहेश्वरी अंतोनियो ग्राम्शी का दिया हुआ वामपंथी विचारधारात्मक विमर्श में एक सबसे अधिक दुरुपयुक्त पद है – ‘प्रभुत्व’ hegemony। यह किसी भी वक्त के पूरे सामाजिक जीवन पर किसी एक खास विश्व दृष्टि के …
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‘न्यू लेफ्ट रिव्यू’ में अचिन वनायक का लंबा लेख : ‘प्रभुत्व’ पद की जड़ समझ से उत्पन्न एक ऊबाऊ सैद्धांतिक बकवास

अरुण माहेश्वरी

अंतोनियो ग्राम्शी का दिया हुआ वामपंथी विचारधारात्मक विमर्श में एक सबसे अधिक दुरुपयुक्त पद है – ‘प्रभुत्व’ hegemony

यह किसी भी वक्त के पूरे सामाजिक जीवन पर किसी एक खास विश्व दृष्टि के पूर्ण वर्चस्व की स्थिति का द्योतक है। इसमें किसी भिन्न विश्व दृष्टि के वर्चस्व की परिस्थिति की द्वंद्वात्मकता में एक नयी विश्व दृष्टि के प्रभुत्व के उदय को समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। अर्थात एक ही काल में दो विरोधी विश्व दृष्टियों के बीच वर्चस्व का द्वंद्व जारी रहता है।

लेकिन गौर करने की बात यह है कि इस द्वंद्वमूलक प्रक्रिया में दो सर्वथा भिन्न और विरोधी विश्व दृष्टियों की भूमिका होती है न कि समान विश्वदृष्टियों के अलग-अलग समूहों की परस्पर अन्तरक्रियाओं की। प्रभुत्व के लिये संघर्षशील विश्व दृष्टियां अपने साथ जीवन के तमाम पक्षों को अपने प्रकार से ढालती जाती है।

यही वजह है कि एक ही विश्व दृष्टि के अपने दायरे में प्रतिद्वंद्वितामूलक शक्तियों की भूमिका को ऐसी प्रभुत्वशाली शक्ति या समूह के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है जो अपने साथ सभी सामाजिक मूल्यों को भी रूपांतरित करती है।

ऐसे में भारत के संसदीय जनतंत्र में प्रतिद्वंद्विता कर रही कांग्रेस और भाजपा को या तो आप एक ही विश्वदृष्टि के अलग-अलग प्रभुत्वकारी समूह नहीं बता सकते हैं या आपको दोनों के विश्वदृष्टिकोण में मूलभत अलगाव के तत्वों को पहचान कर उन्हें दो अलग-अलग विश्वदृष्टि वाले प्रभुत्वकारी समूहों के रूप में स्वीकारना होगा।

कांग्रेस और भाजपा में फर्क

कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं है लेकिन दोनों दो अलग-अलग वर्चस्वकारी समूह (hegemonic blocks) है – इस प्रकार की बात में तत्वत: दोष है। दोनों की विश्व दृष्टि अगर आप एक ही मानते हैं तो उनके अलग-अलग वर्चस्व का सामाजिक स्वरूप तो एक ही होगा। ऐसे में उन्हें अलग-अलग hegemonic block क्यों कहा जाएगा ! जब आप ऐसी किसी गलत समझ की चपेट में रहेंगे तो इस मूलभूत तात्विक दोष के कारण ही भारतीय राजनीति की आपकी पूरी समझ पटरी से उतर जायेगी है, जैसे कि अचिन विनायक की समझ उतर गई है। तब समसामयिक संसदीय राजनीति में सक्रिय प्रतिद्वंद्वितामूलक शक्तियों में कभी कोई विभेद मुमकिन नहीं होगा, जैसा कि संकीर्णतावादी ‘क्रांतिकारी’ अक्सर सभी दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यपंथी दलों को ‘संसदवादी दल’ की एक ही कूची से रंग कर पेश किया करते हैं। इससे सिवाय एक विभ्रम के और कुछ हासिल नहीं होता और हम समकालीन राजनीति के प्रत्यक्ष यथार्थ से ही इंकार करके उसके अंदर के द्वंद्वात्मक स्वरूप को पकड़ने के दरवाजे को ही बंद कर देते है।

यह विभ्रम तब और भी हास्यास्पद हो जाता है जब कोई इन्हीं ‘संसदीय दलों’ को तथाकथित अलग-अलग वर्चस्वकारी समूह ( hegemonic blocks) बताने लगता है।

हास्यास्पद सैद्धांतिक कसरत का एक उदाहरण अचिन वनायक का लेख

‘न्यू लेफ्ट रिव्यू’ के ‘जुलाई-अगस्त 2018’के ताजा अंक में अचिन वनायक का लंबा लेख ‘भारत की दो वर्चस्वशाली ताकतें’ (India’s two hegemonies) इसी हास्यास्पद सैद्धांतिक कसरत का एक उदाहरण है। उनका अंध कांग्रेस-विरोध उन्हें कांग्रेस दल को भाजपा से किसी मायने में अलग नहीं देखने देता है, लेकिन फिर भी वे कांग्रेस और भाजपा के उदय-अस्त की कहानी को दो अलग-अलग वर्चस्वकारी समूहों की टकराहट की कहानी किस आधार पर बताते हैं, इसे वे ही समझ सकते हैं। इसीलिये उन्हें भारतीय राजनीति के अपने इतने दीर्घ विश्लेषणात्मक आख्यान में न भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन से जुड़े मूल्य दिखाई देते हैं और न आरएसएस का सांप्रदायिक फासीवाद। ऐसे में गरीब और उत्पीड़ित जनों के संघर्ष का उनका परिप्रेक्ष्य भी राजनीति-शून्य हो जाता है।

इन्हीं दोषों के कारण कुल मिला कर पूरा लेख भाजपा की अपराजेयता की एक मनगढ़ंत कहानी रचता है जिसमें यदि 2019 में मोदी पराजित होता है तो वह भी उनकी नजर में एक अवसरवादी लेकिन फिर भी भिन्न ‘प्रभुत्वशाली’ समूह की ही जीत होगी।

वामपंथी खेमे के एक हिस्से की समझ में इस प्रकार के तात्विक दोष अक्सर नाना कार्यनीतिक सवालों पर वामपंथ को भ्रमित करते दिखाई देते हैं। अचिन वनायक के बोध में ही यह मूलभूत सत्य नहीं है कि आखिरकार भारत में यह वर्चस्व की पूरी लड़ाई भारत के संविधान पर आधारित संसदीय जनतंत्र के ढांचे के अन्तर्गत लड़ी जा रही है। इसे इस संसदीय जनतंत्र का शील, इस भुवन की अपनी संहिताएं भी संचालित करती है। ऐसे में भाजपा की तरह की सांप्रदायिक फासीवादी शक्ति की अपराजेयता या चुनौती-विहीन वर्चस्व का कोई आख्यान तब तक नहीं लिखा जा सकता है जब तक इस उदार जनतांत्रिक संविधान पर टिके संसदीय जनतांत्रिक भुवन को पूरी तरह से ढहा नहीं दिया जाता है। इसके लिये सचमुच हिटलर जैसे की विश्व विजय की वैश्विकता की तरह की परिस्थितियों की जरूरत होगी।

अचिन विनायक किसी भी विषय की गति के साथ जुड़ी उसकी वैश्विकता के पहलू से तो पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं और भारत में फासीवाद की अपराजेय स्थिति की कहानी कह रहे हैं !

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