अर्जुन सिंह भदौरिया : समाजवादी आंदोलन के क्रांतिकारी कमांडर

अर्जुन सिंह भदौरिया : समाजवादी आंदोलन के क्रांतिकारी कमांडर स्वतंत्रता संग्रामी और समाजवादी नेता अर्जुन सिंह भदौरिया 22 मई को संसार से चले गए। उन्हें डॉ. लोहिया ने कमांडर कहना आरम्भ किया था और तब से सभी लोग श्रद्धा और प्रेम से कमांडर कहकर ही पुकारते थे। कमांडर साहब ने आजादी की जंग पूरी ताकत, …
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अर्जुन सिंह भदौरिया : समाजवादी आंदोलन के क्रांतिकारी कमांडर

अर्जुन सिंह भदौरिया : समाजवादी आंदोलन के क्रांतिकारी कमांडर

स्वतंत्रता संग्रामी और समाजवादी नेता अर्जुन सिंह भदौरिया 22 मई को संसार से चले गए। उन्हें डॉ. लोहिया ने कमांडर कहना आरम्भ किया था और तब से सभी लोग श्रद्धा और प्रेम से कमांडर कहकर ही पुकारते थे।

कमांडर साहब ने आजादी की जंग पूरी ताकत, जोश, कुर्बानी के जज़्बे से सराबोर होकर लड़ी।

उन्होंने बराबर क्रांतिकारी भूमिका अपनायी और लाल सेना में सशस्त्र सैनिकों को भर्ती किया और ब्रिटिश ठिकानों पर सुनियोजित हमला करके आजादी हासिल करने का प्रयास किया। इस कार्य में 1928-30 से संलग्न रहे, किंतु बाद में उन पर गांधीजी, आचार्य नरेन्द्रदेव, डॉ. लोहिया के विचारों का प्रभाव पड़ा। वे समाजवादी आंदोलन का संगठन करने लगे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में तो पूरी संगठन शक्ति और बलिदान भावना से पिल पड़े।

उन्होंने अंग्रेजी सेना की यातायात व्यवस्था ठप्प करने और अंग्रेजी प्रशासन को उखाड़ फेंकने में पूरी शक्ति झोंक दी थी। इसके चलते बहुत से पुलिस थानों पर कब्जा किया, रेलवे स्टेशनों को जलाया और इटावा जिले के बहुत बड़े भाग को साम्राज्यवादी प्रशासन से मुक्त करा लिया था।

अपने प्राणों को न्यौछावर करने में भी उन्हें कोई हिचक न थी। इस आंदोलन में उनके परिवार के लोगों ने उनका पूरा साथ दिया। ब्रिटिश हुकूमत पर उनके आतंक का इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें अंग्रेजों ने 44 साल का सश्रम कारावास दिया था और एक जेल से दूसरी जेल को निरन्तर स्थानान्तरित किए जाने वाले इस इंकलाबी महापुरुष को ढाई साल तक लगातार हाथ-पैरों में बेड़ियां डालकर रखा गया था। उन्हें 52 बार गिरफ्तार किया गया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे उत्तर प्रदेश में समाजवादी आंदोलन के अग्रण्य नेताओं में थे।

उन्होंने किसान पंचायत के संगठन में विशेष रुचि ली और स्वामी भगवान, गेंदा सिंह, मुलखी राज, सूरजदेव, रामधारी शास्त्री और बलवान सिंह के साथ मिलकर सशक्त किसान आंदोलन खड़ा किया।

1949 में 25 नवंबर को लखनऊ में किसान मोर्चा, नई दिल्ली में 3 जून 1951 को जनवाणी दिवस, 1954 के खुशहैसियती टैक्स के खिलाफ आंदोलन में अग्रणी भागीदारी के कारण उनका नाम दूर-दूर तक फैला।

1956 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विघटन के बाद वे डॉ. लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी में रहे। यूं तो जब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 1953 में संयुक्त मोर्चा बनाकर उत्तर प्रदेश में नगरपालिकाओं के चुनाव लड़े थे, तब ही इटावा जिले में पार्टी का सुदृढ़ जनाधार प्रमाणित हो गया था।

ये 1957 के संसदीय चुनाव में लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए और संसदीय कार्य में निरंतर रुचि लेते रहे। परंतु उन पर संगठन का भार था। वे सभी आंदोलनों में भाग लेने और उनका नेतृत्व करने को सदा तत्पर रहे और बार-बार जेल गए।

श्रीमती सरला भदौरिया जी विवाह से पहले गांधी के आश्रम में भी रही थीं। विवाह के बाद सभी आंदोलनों में कंधे से कंधा मिलाकर इनका साथ देती रहीं। परन्तु 1956 के विभाजन में सरलाजी को आचार्य नरेन्द्रदेव का पक्ष उचित लगा और वे प्रसोपा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुड़-गन्ना व अन्य आंदोलनों में बेनी प्रसाद माधव, सरला माधव और सोहनवीर सिंह तोमर के साथ सक्रिय रहीं। किन्तु जब प्रसोपा ने फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में डॉ. लोहिया के विरोध में भरत सिंह राठौर को उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने इस फैसले को अनुचित माना और पार्टी से त्यागपत्र देकर डॉ. लोहिया का समर्थन किया।

1967 के संसदीय आम चुनाव में कमांडर साहब लोकसभा के सदस्य निर्वाचित न हो सके। उन दिनों वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राज्य अध्यक्ष भी थे। संसोपा अन्य गैर-कांग्रेसी दलों के साथ चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में गठित सरकार में भागीदार थी। तब कमांडर साहब के नेतृत्व में सरकार पर दबाव दिया गया कि वह अलाभकर जोत पर भूमि कर को खत्म करे और उसे न मानने पर संसोपा ने सरकार से त्यागपत्र दे दिया। 1971 में संसदीय चुनाव में कमांडर साहब चुनाव तो लड़े किंतु हार गए।

1971 में संसोपा व प्रसोपा का एक बार फिर मिलन हुआ। उस एका के बाद समाजवादियों की शक्ति बढ़ी। किंतु 1972 में फिर टूट हुई और कमांडर साहब ने राजनारायण के साथ संसोपा को दुबारा जिलाया।

1974 में जब जे.पी. ने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का बिगुल बजाया तो कमांडर साहब व सरला जी पूरी तरह से उसमें कूद गए और जे.पी. का पूर्ण साथ देते रहे। आपातकाल उन्होंने जेल में काटा और 1977 में वे फिर सांसद बने।

1978 में उन्होंने किशन पटनायक के साथ मिलकर तीसरी शक्ति बनाने के लिए बुलंदशहर में सम्मेलन आयोजित किया। परंतु जब 1979 में जनता पार्टी में विभाजन हुआ तब वे चरण सिंह, राजनारायण व मधु लिमये के साथ नहीं गए। 1981 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे और उनके नेतृत्व में पार्टी ने शांतिपूर्ण संघर्ष मार्ग अपनाया। चंद्रशेखर जी की भारत यात्रा और 1989 में आचार्य नरन्द्रदेव की जन्मशती के कामों में उनकी सक्रिय भागेदारी रही।

1990 के बाद वे सक्रिय राजनीति के स्थान पर लेखन कार्य में लगे। ‘नींव के पत्थर’ शीर्षक से उन्होंने आत्मकथा लिखी, जिसके दो भाग प्रकाशित हुए। उन्होंने तीसरा भाग भी लिखा, किन्तु वह अप्रकाशित रहा।

बहरहाल, नब्बे-बानवे वर्ष की अवस्था में भी उनका जोश ऐसा था कि इटावा जिला कचहरी में पुलिस द्वारा वकीलों पर आकस्मिक लाठीचार्ज के विरोधस्वरूप अपने पुराने स्वतंत्रता सेनानी साथी श्री किशनलाल के साथ अनिश्चितकालीन अनशन आरम्भ कर दिया और तब तक खत्म न किया जब तक संबंधित लोगों को निलम्बित नहीं किया गया। यह घटना दो-तीन वर्ष पहले की है।

इस संघर्षशील निःस्वार्थ जीवन में सरला जी स्नेह और त्याग की प्रतिमूर्ति के तौर पर बराबर उनके साथ रहीं। वे घर और खेती भी संभालती रहीं और समाज सेवा भी करती रहीं।

सुरेन्द्र मोहन

(समाजवादी चिंतक सुरेन्द्र मोहन का यह लेख सामयिक वार्ता के जून 2004 के अंक में प्रकाशित हुआ था। साभार)