बस्तर : यहाँ रमन सिंह नरेंद्र मोदी से बड़े नेता के रूप में जाने जाते हैं

Bastar: Nobody knows Modi or Rahul here जगदलपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों (Chhattisgarh Assembly Elections) के बाद रायपुर में बनने वाली सरकार के गठन में बस्तर संभाग की 12 सीटों का महत्व सबसे ज़्यादा है। बाकी इलाके में तो कांग्रेस और भाजपा की स्थिति लगभग बराबर ही रहती है। पिछली विधान सभा में बस्तर संभाग …
 | 
बस्तर : यहाँ रमन सिंह नरेंद्र मोदी से बड़े नेता के रूप में जाने जाते हैं

Bastar: Nobody knows Modi or Rahul here

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों (Chhattisgarh Assembly Elections) के बाद रायपुर में बनने वाली सरकार के गठन में बस्तर संभाग की 12 सीटों का महत्व सबसे ज़्यादा है। बाकी इलाके में तो कांग्रेस और भाजपा की स्थिति लगभग बराबर ही रहती है।

पिछली विधान सभा में बस्तर संभाग की भाजपा की 11 सीटों के कारण ही रमन सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बन सके थे, लेकिन  बस्तर क्षेत्र में रहने वाला हर इंसान जानता है कि इस बार भाजपा की 11 सीटें नहीं आ रही है। यहाँ तक कि भाजपा के कार्यकर्ता भी जानते हैं कि उनकी पार्टी की हालत इस बार उतनी अच्छी नहीं है जितनी पिछली बार थी।

पिछली बार बस्तर में लखमा कवासी इकलौते कांग्रेसी उम्मीदवार थे, जो कोंटा से विजयी रहे थे। कांग्रेसी उम्मीद कर रहे थे कि जीरम घाटी में मारे गये महेंद्र कर्मा के परिवार के किसी उम्मीदवार को टिकट दे देने से उसे सहानुभूति का लाभ मिलेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है।

उसी तरह दिल्ली में बैठे भाजपा के नेता समझ रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की आक्रामक हिंदू नेता की छवि का लाभ पार्टी को मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। कई इलाकों में तो लोगों ने नरेंद्र मोदी का नाम भी नहीं सुन रखा है। इस इलाके में भाजपा का एक ही नेता है और उसका नाम है रमन सिंह।

बस्तर संभाग में 2008 के चुनाव में 11 सीटें जीतकर रमन सिंह ने सरकार बना ली थी।

यहाँ के हर जानकार ने बताया कि इस इलाके में आदिवासियों और सतनामियों के बीच कांग्रेस नेता अजीत जोगी की पहचान है और भाजपा की 11 सीटों  की जीत में अजीत जोगी की खासी भूमिका थी क्योंकि उन्होंने अपने आपको बड़ा नेता साबित करने के लिए अपने विरोधी गुट के कांग्रेसी उम्मीदवारों के खिलाफ काम किया था। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। इस बार अजीत जोगी कांग्रेस के उम्मीदवारों के खिलाफ काम नहीं कर रहे हैं।

बस्तर संभाग की 11 सीटें रिज़र्व हैं जबकि जगदलपुर की सीट सामान्य है। यहाँ से कांग्रेस ने शामू कश्यप को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस के एक बहुत ही ज़िम्मेदार नेता ने बताया कि यह कांग्रेस आलाकमान की चूक है।

शामू कश्यप, महरा जाति के हैं। उनकी जाति के लोगों की बहुत वर्षों से माँग है कि उनको अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाये लेकिन अनुसूचित जनजाति के लोग इस माँग का विरोध कर रहे हैं। उनको डर है कि अगर महरा जाति को अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा मिल गया तो वे सारे लाभ हथिया लेंगे, क्योंकि महरा जाति के लोग अपेक्षाकृत चालाक बताये जाते हैं। गाँवों में जो भी छोटे- मोटे कारोबार हैं सब इनके पास ही हैं।

कांग्रेस को उम्मीद है कि महरा जाति के करीब दो लाख वोट उनको एकतरफा मिल जायेंगे लेकिन इस गणित से बीस लाख के करीब मुरिया, गोंड, राउत और घसिया आदिवासी नाराज़ भी हो सकते हैं।

बताते हैं कि कांग्रेस की इस राजनीतिक अनुभवहीनता का लाभ उठाने के लिये भाजपा ने अपने वनवासी कल्याण परिषद वालों के ज़रिये बहुसंख्यक आदिवासियों को सचेत करना शुरू कर दिया है। ऐसी हालत में जगदलपुर के मौजूदा विधायक संतोष बाफना को लाभ मिलने की स्थति पैदा हो गयी है।

यहाँ कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही बागियों का सामना करना पड़  रहा है।

भाजपा के राजाराम तोडेम, स्वाभिमान मंच से लड़ रहे हैं तो सेठिया समाज के राम केसरी कांग्रेस से नाराज़ होकर बागी हो गये हैं। इस इलाके में सेठिया समाज के वोटों की खासी संख्या है। ज़ाहिर है कि यह भाजपा को फायदा पहुँचा सकते हैं।

इस बार बस्तर सम्भाग की दो सीटों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार मजबूती से लड़ रहे हैं। कोंटा में अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के अध्यक्ष, मनीष कुंजाम मज़बूत हैं जबकि उनकी पुरानी सीट दंतेवाड़ा में उनकी पार्टी के उम्मीदवार बोमड़ा राम कवासी की हालत बहुत अच्छी है।

दंतेवाड़ा सीट इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि यहाँ से कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को टिकट दिया है।

कांग्रेस ने उम्मीद की थी कि महेंद्र कर्मा की जिस तरह से माओवादियों ने जीरम घाटी में ह्त्या की थी उससे सहानुभूति  मिलेगी लेकिन दंतेवाड़ा में ऐसा कुछ नहीं दिखता। देवती कर्मा से किसी को सहानुभूति नहीं है। उनके दो बेटे इलाके में ऐसी ख्याति अर्जित कर चुके हैं जिसके बाद किसी को भी सहानुभूति नहीं मिलती। उनका एक बेटा अभी भी नगर पंचायत का अध्यक्ष है जबकि दूसरा जिला पंचायत का भूतपूर्व अध्यक्ष है। दोनों ने ही इलाके के लोगों को बहुत परेशान कर रखा है।

सलवा जुडूम के हीरो के रूप में भी महेंद्र कर्मा की पहचान थी जिसके कारण आदिवासी इलाकों में उन्हें भाजपा के एजेंट के रूप में पहचाना जाता है। आम आदिवासी महेंद्र कर्मा को नापसंद करता है हालांकि केन्द्र सरकार और उनेक सहयोगी उन्हें बस्तर का शेर बनाकर पेश करने की कोशिश करते हैं।

दंतेवाड़ा से महेंद्र कर्मा 2008 में खुद कांग्रेस उम्मीदवार थे और तीसरे नंबर पर रहे थे। यहाँ कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर थी। उस बार यहाँ के उम्मीदवार मनीष कुंजाम थे।

कम्युनिट पार्टी के प्रचार में दिन रात एक कर रहे पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य सी आर बख्शी ने बताया कि उनका उम्मीदवार गैर आरएसएस समुदाय में बहुत लोकप्रिय है। यहाँ की लड़ाई अभी शुद्ध रूप से सीपीआई और भाजपा के बीच है।

दिल्ली में कांग्रेस के एक बड़े नेता ने भी बताया कि दंतेवाड़ा में सीपीआई का उम्मीदवार बहुत मजबूत है।

कोंटा सीट पर सी पी आई के मनीष कुंजाम खुद उम्मीदवार हैं। उनकी इज्ज़त सभी वर्गों में है।

जब माओवादियों ने सुकमा के कलेक्टर अलेक्स पाल मेनन का अपहरण कर लिया था तो उनकी रिहाई के लिए जो कोशिशें हुयी थीं उनमें मनीष कुंजाम ने जो भूमिका निभाई थी, उसकी सभी सराहना करते हैं। माओवादियों के बीच भी उनकी इज्ज़त है। आदिवासी समुदाय उनके साथ है, लेकिन एक शंका यह जतायी जा रही है कि रमन सिंह की सरकार कम्युनिस्ट उम्मीदवारों को नहीं जीतने देगी चाहे उसे कांग्रेस के पक्ष में ही भाजपा के अपने वोट ट्रांसफर करना पड़े।

बस्तर सम्भाग से इकलौते कांग्रेसी एमएलए, कवासी लखमा भी कोंटा में उम्मीदवार हैं। लेकिन उनकी हालत खस्ता बतायी जा रही है। यह सीट सीपीआई को मिल सकती है।

भाजपा के बस्तर क्षेत्र के विधायकों के खिलाफ जनरल माहौल है। चित्रकोट के भाजपा उम्मीदवार बैदूराम कश्यप हैं, जो विधायक भी हैं। यह कभी भी अपने क्षेत्र में नहीं गये। इनके क्षेत्र की सबसे बड़ी पंचायत कूकानार है, इसमें करीब आठ हज़ार वोट हैं। बस्तर के हिसाब से यह बहुत बड़ा वोट बैंक है। भाजपा की जीत में इस इलाके का भारी योगदान रहता है लेकिन चुनाव जीतने के बार बैदूराम यहाँ एक बार भी नहीं गये। कूकानार में उनके खिलाफ सभी लोग हैं और उनको हराने के लिए वोट करने वाले हैं। उनका विरोध उनकी ही पार्टी के लच्छूराम कश्यप कर रहे हैं।

लच्छूराम अभी जिला पंचायत के अध्यक्ष हैं और भाजपा के टिकट के मज़बूत दावेद्दार थे। उन्होंने बताया कि अगर इस बार भी बैदूराम जीत गये तो वह जड़ पकड़ लेंगे और जिले में उनकी जो राजनीतिक हैसियत है वह खत्म हो जायेगी। हालाँकि कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ भी बागी उम्मीदवार हैं लेकिन कांग्रेस का उम्मीदवार दीपक बैज नया खिलाड़ी है और बैदूराम पर भारी पड़ रहा है।

कांकेर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने अपनी विधायक सुमित्रा मारकोले की जगह पर संजय कोडोपी को टिकट दिया है। भाजपा कार्यकर्ताओं में नाराज़गी है। संजय कोडोपी बहुत ही अलोकप्रिय है और पार्टी में  बगावत के कारण उनके पाँव नहीं जम पा रहे हैं। कांग्रेस के शंकर धुर्वा उम्मीदवार हैं और उनके परिवार की इज़ज़त है। भाजपा के कार्यकर्ता भी कहते देखे गये कि श्यामा धुर्वा की जो गुडविल है शंकर को उसका लाभ मिल सकता है।

अंतागढ़ में भाजपा के उम्मीदवार विक्रम उसेंडी हैं। इंकमबेंसी की असली मार झेल रहे हैं। पिछले पाँच साल के उनके काम से नाराज़ लोगों की बड़ी संख्या है। उनसे नाराज़ होकर उनकी पार्टी के ही प्रभावशाली नेता, भोजराज नाग निर्दलीय लड़ रहे हैं। लेकिन विक्रम उसेंडी के पास भी साधनों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने भोजराज नाग नाम के एक और उम्मीदवार को खड़ा कर दिया है। पिछले बार विक्रम उसेंडी 109 वोट से जीते थे। ज़ाहिर है कि उनका मुक़ाबला मुश्किल है।

कांग्रेस के उम्मीदवार मंतूराम पवार इलाक़े में सम्मानित व्यक्ति हैं और उनको मंत्री जी की दुर्दशा का लाभ मिल रहा है। इसी क्षेत्र में ढाका से 1950 के दशक में आये हुये शरणार्थियों की बस्ती भी है। नामशूद्र जाति के यह लोग अविभाजित बंगाल में दलित वर्ग के माने जाते थे। लेकिन यहाँ उनको दलित नहीं माना जा रहा है। उनकी बहुत दिनों से माँग है कि उन्हें अनुसूचित वर्ग में रखा जाये,  लेकिन केंद्र की सरकार इस बात को हमेशा से टाल रही है। इस बार विक्रम उसेंडी ने उनको भरोसा दिला दिया है कि उनको अनुसूचित जाति की श्रेणी में वे करवा देंगे। उनकी बात पर पंखाजोर के इस इलाक़े में सही माना जा रहा है। इस बात की सम्भावना है कि विक्रम उसेंडी को यह सारे वोट मिल जायेंगे। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस उम्मीदवार की सारी अच्छाई का बावजूद भी यह सीट भाजपा के हाथ लगेगी क्योंकि नामशूद्रों के यहाँ क़रीब आठ हज़ार वोट हैं। और जहाँ 109 वोट से हारजीत का फैसला हो रहा हो वहाँ आठ हज़ार वोटों का बहुत अधिक महत्व है।

केशकाल बस्तर सम्भाग की एक अन्य महत्वपूर्ण सीट है, जहाँ भाजपा के विधायक सेवक राम नेताम फिर मैदान में हैं। पाँच साल का उनका कार्यकाल आलोचना का विषय है। उनके खिलाफ अजीत जोगी का बन्दा संतराम नेताम कांग्रेस की तरफ से उमीदवार है।  संतराम को बाहरी माना जा रहा है लेकिन सेवकराम निष्क्रिय रहे हैं इसलिए संतराम की स्थिति मज़बूत है। यहाँ कांग्रेस की अगर हार हुयी तो उसमें स्वाभिमान मंच के उम्मीदवार  का भारी योगदान होगा क्योंकि वह यहाँ भाजपा की मदद कर रहा है और कांग्रेस के वोट काट रहा है।

बीजापुर में कांग्रेस ने विक्रम मंडावी को उतारा है लेकिन उनको टिकट मिलने से बहुत सारे कांग्रेसी नाराज़ हैं। ज़िला पंचायत की अध्यक्ष और कांग्रेस की नेता, नीना रावतिया भी टिकटार्थी थीं और अब कांग्रेसी उम्मीदवार का विरोध कर रही हैं। इस टिकट से नाराज़ कुछ लोगों ने भाजपा भी ज्वाइन कर लिया है। यहाँ भाजपा के उमीदवार महेश गागड़ा हैं। राजाराम तोड़ेम भी यहाँ से भाजपा का टिकट माँग रहे थे। लेकिन अब नाराज़ हैं और स्वाभिमान मंच में शामिल हो गये हैं। वे जगदलपुर से पर्चा भर चुके हैं और वहाँ भाजपा के संतोष बाफना की लड़ाई को कठिन बना रहे हैं।

भानु प्रतापपुर में भाजपा विधायक ब्रह्मानंद नेताम को टिकट काट दिया गया है। उनकी जगह पर नौजवान सतीश लाठिया लड़ रहे हैं।  भाजपा के कई नेता उनके खिलाफ हैं। ब्रह्मानंद भी विरोध में काम कर रहे हैं लेकिन भाजपा के रायपुर के नेताओं को उम्मीद है कि बात बन जायेगी। भाजपा नेता रुक्मिणी ठाकुर तो लाठिया को हराने का मन बना चुकी हैं। कांग्रेस के उम्मीदवार मनोज मंडावी हैं। यहाँ कांग्रेस बहुत मज़बूत नहीं है इसलिए उनके खिलाफ भितरघात का ख़तरा नहीं है। बस्तर सम्भाग के जितने भाजपा नेताओं से बात हुयी सभी इस सीट पर कांग्रेस की जीत की बात करते पाये गये।

कोंडागांव भाजपा की मज़बूत सीट है। वहाँ से पूर्व सांसद मनकूराम सोढ़ी के बेटे शंकर सोढ़ी निर्दलीय उम्मीदवार हैं और कांग्रेसी उम्मीदवार मोहन मरकाम की लड़ाई को बहुत कठिन बना रहे हैं।  पिछली बार भी मोहन मरकाम अच्छा लड़े थे और बहुत मामूली अंतर से हारे थे। लेकिन इस बार शंकर सोढ़ी के कारण वर्त्तमान विधायक लता उसेंडी की स्थिति मज़बूत है। आज की हालत अगर चुनाव के दिन तक बनी रही तो यह सीट भाजपा की हो जायेगी लेकिन अगर शंकर सोढ़ी मान गये तो कांग्रेस के खाते में जा सकती है। केंद्रीय कांग्रेस नेताओं ने बताया कि शंकर सोढ़ी को लोकसभा लड़ने के लिये कहा जा रहा है। अगर यह सम्भव हुआ तो यहाँ से कांग्रेस की जीत की सम्भावना बहुत अधिक हो जायेगी।

Here Raman Singh is a bigger leader than Narendra Modi

नारायणपुर में मंत्री केदार कश्यप बहुत मज़बूत हैं। रमन सिंह सरकार में मंत्री हैं। आदिवासी विभाग के मंत्री हैं, बहुत संपन्न हैं और कांग्रेसी उम्मीदवार, चन्दन कश्यप पर बहुत भारी पड़ रहे हैं। जबकि बस्तर विधानसभा क्षेत्र (Bastar Assembly Constituency) में दोनों पार्टियों में भितरघात है। भाजपा विधायक सुभाऊ कश्यप के खिलाफ कांग्रेस ने डॉ. लखेश्वर बघेल को टिकट दिया है जो मज़बूत माने जा रहे हैं।

बस्तर सम्भाग में राहुल गांधी या नरेन्द्र मोदी का कहीं भी कोई ज़िक्र नहीं है। सारा चुनाव आदिवासियों के मुक़ामी मुद्दों पर लड़ा जा रहा है।  पूरे क्षेत्र में नरेद्र मोदी का कोई पोस्टर नहीं दिखा जबकि कांग्रेसियों ने जगह-जगह राहुल गांधी, सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह के पोस्टर लगा ऱखे हैं। यहाँ रमन सिंह नरेंद्र मोदी से बड़े नेता के रूप में जाने जाते हैं।

शेष नारायण सिंह