2020 तक विश्व में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण होगा सीओपीडी

वास्तव में सीओपीडी हमारे फेफडों और श्वसन-तंत्र से संबंधित समस्या है, जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस भी कहा जाता है। हमारे शरीर में फेफडे फिल्टर की तरह काम करते हैं।
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2020 तक विश्व में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण होगा सीओपीडी

2020 तक विश्व में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण होगा सीओपीडी

कौशाम्बी (गाजियाबाद) 20 नवंबर 2019 सर्दी के मौसम में थोड़ी-बहुत खांसी होना आम बात है, लेकिन दवा लेने के बावजूद लंबे समय तक खांसी का ठीक न होना चिंता का विषय है। बढ़ते प्रदूषण की वजह से ऐसी स्थिति में व्यक्ति को सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि यह श्वसन-तंत्र से संबंधित बीमारी Respiratory related illness सीओपीडी – COPD (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) का भी लक्षण हो सकता है।

पूरे विश्व में 21 नवंबर को मनाये जाने वाले विश्व सीओपीडी दिवस (World COPD Dayदीर्घकालीन दमा या काला दमा) के अवसर पर यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल,कौशाम्बी, गाज़ियाबाद में आज आयोजित एक प्रेस वार्ता में वरिष्ठ श्वांस एवं फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. के. के. पांडेय, डॉ. अर्जुन खन्ना, डॉ अंकित सिन्हा ने सीओपीडी के विषय में बताया।

2020 तक विश्व में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण होगा सीओपीडी

By 2020 COPD will be the third largest cause of death in the world

आंकड़ों की चर्चा करते हुए डॉ. के. के. पांडेय ने कहा कि 2020 तक सीओपीडी विश्व में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण होगा।

उन्होंने बत्ताया कि आपको जानकर हैरानी होगी कि सन् 2000 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सीओपीडी मौत का छठवां सबसे बड़ा कारण था, जबकि 2020 तक ये दुनिया भर में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण होगा।

ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की अपील की

Appealed to plant more trees

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक डॉ. पी. एन. अरोड़ा ने ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की अपील की। उन्होंने बताया कि पेड़ पौधे हवा में मौजूद कार्बन एवं विषैले पदार्थों को खींच कर हवा को शुद्ध करते हैं, इसलिए हमें इसे एक जन आंदोलन के रूप में ले लेना चाहिए।

प्रेस वार्ता में बताया गया कि डॉ. पी. एन. अरोड़ा एवं श्रीमती उपासना अरोड़ा ने अभी तक गाज़ियाबाद में 20000 से ज्यादा पेड़ लगवा दिए हैं

हेल्थ टॉक का भी आयोजन

Organizing Health Talk

इस प्रेस वार्ता में यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के डॉ सुनील डागर, डॉ राहुल शुक्ल, डॉ अनुज अग्रवाल, डॉ विक्रम ग्रोवर एवं गौरव पांडेय मौजूद रहे।

चिकित्सा अधीक्षक डॉ अनुज अग्रवाल ने बताया कि 21 नवंबर, 2018 बुधवार को यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल कौशाम्बी, गाज़ियाबाद की मेन लॉबी में प्रातः 10 बजे एक निःशुल्क लंग स्क्रीनिंग टेस्ट- Lung screening test एवं फेफड़ों को प्रदूषण के प्रभाव से बचाये रखने एवं स्वस्थ रखने के लिए हेल्थ टॉक का भी आयोजन किया जा रहा है

सीओपीडी यानी क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस

COPD or chronic bronchitis

डॉ अंकित सिन्हा ने बताया कि वास्तव में सीओपीडी हमारे फेफडों और श्वसन-तंत्र से संबंधित समस्या है, जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस भी कहा जाता है। हमारे शरीर में फेफडे फिल्टर की तरह काम करते हैं। दरअसल इसमें छोटे-छोटे वायु-तंत्र होते हैं, जिन्हें एसिनस कहा जाता है। जब हम सांस लेते हैं तो फेफडे का यही हिस्सा शुद्ध ऑक्सीजन को छान कर उसे हार्ट तक पहुंचाता है। फिर वहीं से ऑक्सीजन युक्त रक्त का प्रवाह पूरे शरीर में होता है। इसके बाद बची हुई हवा को फेफडे दोबारा फिल्टर करके उसमें मौजूद नुकसानदेह तत्वों को सांस छोडने की प्रक्रिया के माध्यम से बाहर निकालते हैं। जब फेफडे के इस कार्य में बाधा पहुंचती है तो इससे सीओपीडी की समस्या पैदा होती है।

प्रदूषण से बचने के लिए मास्क

Masks to Avoid Pollution

डॉ. अंकित सिन्हा ने कहा कि हमें यदि प्रदूषण से बचने के लिए मास्क लेना ही है तो एन 95 क्वालिटी का मास्क लेना चाहिए और एक मास्क को 5 दिन से ज्यादा उपयोग नहीं करना चाहिए। पांच दिन बाद मास्क बदल लेना चाहिए।

लाभ नहीं पहुंचाते एयर प्यूरीफायर

Air purifiers do not benefit

डॉ. सिन्हा ने कहा कि घरों में लगाए जाने वाले एयर प्यूरीफायर के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि सस्ती क्वालिटी व कम दाम वाले एयर प्यूरीफायर कोई लाभ नहीं पहुंचाते, बल्कि उनमें से ओज़ोन गैस का खतरा और आयनाइजेशन की वजह से नुकसान पहुंचने का भी ख़तरा बना रहता है। एयर प्यूरीफायर में हेपा फिल्टर HEPA filter होना चाहिए और उसमें एक इंडिकेटर भी होना चाहिए जो ये बताए कि उस एयर प्यूरीफायर ने एयर क्वालिटी इंडेक्स को कितना ठीक किया है।

40 पार को सीओपीडी का खतरा अधिक

40 plus risk of COPD

डॉ. अर्जुन खन्ना ने कहा कि प्रदूषण की वजह से या ज्यादा स्मोकिंग करने वाले लोगों के फेफड़ों और सांस की नलियों में नुकसानदेह केमिकल्स और गैस जमा हो जाते हैं। इससे सांस की नलिकाओं की भीतरी दीवारों में सूजन पैदा होती है। आमतौर पर सांस की ये नलिकाएं भीतर से हलकी गीली होती हैं, लेकिन धुएं, धूल या हवा में मौजूद किसी अन्य प्रदूषण की वजह से श्वसन नलिकाओं के भीतर मौजूद यह तरल पदार्थ सूखकर गाढ़ा और चिपचिपा बन जाता है। कई बार यह म्यूकस सांस की नलियों की अंदरूनी दीवारों में चिपक जाता है। इससे व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ होती है। बदलते मौसम में यह समस्या ज्यादा नजर आती है। चालीस वर्ष की उम्र के बाद लोगों में इस बीमारी की आशंका बढ जाती है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लगती है।

सीओपीडी का उपचार/  medicines for copd 

डॉ. अर्जुन खन्ना ने कहा कि सीओपीडी लम्बे समय तक बने रहने वाला (क्रोनिक) रोग है। लक्षणों की गंभीरता के आधार पर यह कुछ सप्ताहों से लेकर कई महीनों तक का हो सकता है। वर्तमान में सीओपीडी का कोई उपचार नहीं है। इस स्थिति का नियंत्रण औषधियों या जीवन शैली में परिवर्तन द्वारा किया जाना चाहिए।

डॉ अर्जुन खन्ना ने काला दमा के मरीजों में जाँच और परीक्षण के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि रोग का निर्धारण शारीरिक परीक्षण और सुझाई गई अन्य जाँचों द्वारा होता है, इन जाँचों में हैं:

स्पाइरोमेट्री, रक्त या बलगम का परीक्षण, एक्स-रे और सीटी स्कैन्स, आर्टीरीअल ब्लड गैस एनालिसिस और ओक्सिमेट्री।

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