घिर गए हैं मोदी, उनकी अग्निपरीक्षाओं का अंत नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अग्निपरीक्षाओं का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा।वे आग का एक मजंर पार करते हैं तो अगले ही कदम फिर आग सुलगने लगती है। प्रधानमंत्री अभी कश्मीर की आग (Kashmir fire) को बुझाकर फारिग ही हुए हैं की नागालैंड में अलग झंडे की मांग (Demand for separate flag in Nagaland) उठने …
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घिर गए हैं मोदी, उनकी अग्निपरीक्षाओं का अंत नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अग्निपरीक्षाओं का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा।वे आग का एक मजंर पार करते हैं तो अगले ही कदम फिर आग सुलगने लगती है। प्रधानमंत्री अभी कश्मीर की आग (Kashmir fire) को बुझाकर फारिग ही हुए हैं की नागालैंड में अलग झंडे की मांग (Demand for separate flag in Nagaland) उठने लगी है। ये मांग करने वाले वे ही लोग हैं जिनके साथ चार साल पहले मोदी जी ने गुपचुप समझौता किया था, यहां तक कि संसद तक को नहीं बताया था।

ताजा खबर है कि नागालैंड में शांति बहाल करने के लिए केंद्र सरकार के साथ वार्ता करने वाले संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इसाक-मुइवा)- National Socialist Council of Nagaland (Issac-Muivah) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। संगठन ने 2015 में हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के तहत नागालैंड के लिए अलग झंडा और संविधान पर सहमति देने की मांग की है।

संगठन के चेयरपर्सन क्यू सू और महासचिव टी मोइवा ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि नागालैंड के लोग इस बात को लेकर संशय में है कि नगा समास्या का सम्मानित समाधान (Respected solution to Naga problem) हो पाएगा या नहीं। राज्य का अलग झंडा और संविधान नगा लोगों की पहचान और उनके गौरव से जुड़ा है।

केंद्र सरकार ने लम्बी जद्दो-जहद के बाद कश्मीर से अलग झंडा समाप्त किया है। कल तक जम्मू-कश्मीर का भी अपना एक ध्वज हुआ करता था लेकिन अनुच्छेद 370 और 35 – A की समाप्ति के दुस्साहसिक फैसले के बाद ये मुमकिन हो सका कि अब जम्मू-कश्मीर में तिरंगा लहरा रहा है। सीमावर्ती नागालैंड में भी पहले से तिरंगे के बजाय राज्य के एक प्रथक ध्वज का इस्तेमाल किया जा रहा है, हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि 2015 में हुए नगा समझौते में किसी को इस तरह की अनुमति नहीं दी गयी थी।

केंद्र सरकार और एनएससीएन(आई-एम) के बीच शांति समझौते पर चार साल पहले हस्ताक्षर हुए थे। संगठन का कहना है कि इन दोनों मुद्दों पर चर्चा के बगैर नगा समस्या का बेहतर तरीके से समाधान नहीं हो सकता है। मोदी सरकार ने दोनों मुद्दों पर अभी तक अनुमति नहीं दी है। सरकार समझौते को मूर्त रूप देने में विलंब कर रही है।

देश के लिए नगा समस्या नयी नहीं है। Naga problem is not new for the country.

देश के उत्तर-पूर्वी भाग का नागा समुदाय लंबे समय से नागा बहुल इलाकों को मिलाकर ग्रेटर नागालिम (Greater Nagalim including Naga dominated areas) यानि नया देश बनाने की मांग करता रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि नागा लोग परंपरागत रूप से किसी भी देश के प्रति अपनी भावना नहीं रखते। वे चीन, भारत और म्यांमार वे इनमें से किस देश का भाग हैं, ये असमंजस है। इसलिए उनकी शुरू से भावना रही है कि वे अपना नया देश ग्रेटर नागालिम बनाएं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे शुरू से अब तक हिंसा की लड़ाई लड़ रहे हैं।

ग्रेटर नागालिम राज्य में मणिपुर, असम और अरूणचल प्रदेश के नागा बहुल इलाकों को मिलाकर राज्य गठन की मांग शुरू से की जाती रही है। आज भी ये मुद्दा यहां ताजा है और ये समस्या आज भी यहां जीवित है। इस मुद्दे पर अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और नागा समाज में सक्रिय नागा समूह के बीच दिल्ली में एक बड़ा समझौता भी हुआ था। हालांकि तब इस मुद्दों के तथ्यों को सीक्रेट मिशन की तरह रखा गया, लेकिन इसके लिए एक फ्रेमवर्क की बात कही गई थी।

नागालैंड की समस्या हालांकि जम्मू-कश्मीर जैसी नहीं है लेकिन कमतर भी नहीं आंकी जा सकती। केंद्र ने हड़बड़ी में 2015 में नगा समझौता कर तो लिया था, लेकिन अब यही समझौता सरकार के गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है।

मणिपुर में भाजपा की सरकार बनने के बाद इस समस्या के समाधान की कुछ उम्मीद हुई थी, आज अगर नागा समुदाय की मांग पर अमल किया जाए, तो मणिपुर का 60 प्रतिशत भूभाग ग्रेटर नागालिम में शामिल करना पड़ जाएगा।

केंद सरकार दूसरे राज्यों को संतुष्ट करने के लिए ये कहती रही है कि नागा समस्या के हल के लिए पूर्वोत्यर के राज्यों का पुर्नगठन नहीं होगा। बीजेपी के लिए इस समस्या का समाधान करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि पार्टी हर राज्य में अपना विस्तार कर रही है, ऐसे में किसी एक के पक्ष में फैसला पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है।

अब देखना ये होगा कि क्या केंद्र सरकार नगा समस्या का निराकरण भी उसी सख्ती के साथ कर पाएगी जैसा कि उसने जम्मू-कश्मीर में किया। क्या केंद्र नागालैंड में भी एक निशान, एक विधान का अपना वादा पूरा कर पाएगी ?

अगर नगा समस्या का समाधान न हुआ तो ये जम्मू-कश्मीर में मिली कामयाबी को धूमिल करने वाला मुद्दा हो सकता है। सरकार को इस मसले पर बन्दूक के बजाय बातचीत का रास्ता ही अख्तियार करना चाहिए।

वैसे एक सवाल बार-बार उभरता है कि क्या संघीय ढाँचे में राज्यों को उनकी प्रथक सांस्कृतिक-भौगोलिक पहचान के अनुरूप कोई ध्वज देने से राष्ट्रीय एकता, अखंडता प्रभावित होती है ? दुनिया अनेक राष्ट्रों में राज्यों के पास पृथक् ध्वज रखने का अधिकार है और वे दुनिया के समृद्ध राष्ट्र भी हैं।

राकेश अचल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

http://www.hastakshep.com/oldnaga-problem-solutions/