जानिए अगर पं. नेहरू न होते तो कश्मीर कभी भी भारत का न होता

वरिष्ठ पत्रकार राजीव मित्तल का आलेख “नेहरू, कश्मीर और कश्मीरियत को यहाँ से समझें” मूलतः 21 जून 2018 को हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुआ था। पं. नेहरू और कश्मीर के संबंध को समझने के लिए यह छोटा सा आलेख आज भी प्रासंगिक है … हस्तक्षेप के पाठकों के लिए पुनर्प्रकाशन कुछ वर्षों से कश्मीर को नेहरू की …
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जानिए अगर पं. नेहरू न होते तो कश्मीर कभी भी भारत का न होता

वरिष्ठ पत्रकार राजीव मित्तल  का आलेख “नेहरू, कश्मीर और कश्मीरियत को यहाँ से समझें” मूलतः 21 जून 2018 को हस्तक्षेप पर प्रकाशित हुआ था। पं. नेहरू और कश्मीर के संबंध को समझने के लिए यह छोटा सा आलेख आज भी प्रासंगिक है … हस्तक्षेप के पाठकों के लिए पुनर्प्रकाशन

कुछ वर्षों से कश्मीर को नेहरू की चाशनी में डाल कर जलेबी की तरह कुछ ऐसे पेश किया जा रहा है कि देखो यह है कश्मीर समस्या, और साथ में चटखारेदार नमकीन जैसे रिश्ते मसलन शेख अब्दुल्ला मोतीलाल नेहरू की अवैध संतान थे, एडविना के आकर्षण में फंसे नेहरू ने कश्मीर का मामला गले की फांस बना दिया।

कश्मीरियत क्या है

आइये पहले कश्मीरियत  (Kashmiriyat in Hindi ) को जान लें। कश्मीरी और अफ़ग़ान दो ऐसे समाज हैं, जिन पर जबरन काबिज़ नहीं हुआ जा सकता। एक हज़ार साल पहले महमूद गजनवी ने पूरे पश्चिम भारत की हवा निकाल दी थी, लेकिन वो कश्मीर का कुछ नहीं बिगाड़ सका। कई हमलों में मुँह की खाने के बाद उसने अपने घोड़े हिंदुकुश की तरफ मोड़ दिए।

कश्मीर में इस्लाम कैसे आया How did Islam come to Kashmir

कश्मीर में इस्लाम आया सूफियों के ज़रिए और वहां इस्लाम काबिज हुआ ब्राह्मणों की बदौलत, जिन्होंने तिब्बत के राजवंश से आए एक बौद्ध राजकुमार को हिन्दू नहीं बनने दिया। नतीजा यह हुआ कि उस राजकुमार ने इस्लाम अपनाया और सूफी मिठास को कड़वाहट में बदल ब्राह्मणों की ऐसी की तैसी कर डाली और कुछ ही सालों में घाटी पर इस्लामी पताका फहराने लगी।

सेंकड़ों साल बाद जब कश्मीर महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का हिस्सा बना तो वहां का माहौल बेहद सहज और सद्भावनापूर्ण था। उनके मरते ही अंग्रेजों ने कश्मीर घाटी जम्मू के डोगरा राजा गुलाब सिंह को 35 लाख रुपये में बेच दी। गुलाब सिंह और बाद के डोगरा राजाओं ने कश्मीरी मुसलमानों के साथ वही व्यवहार किया, जो बिहार के भूमिहार या राजपूत जमींदार पिछड़ों के साथ करते थे।

कश्मीर घाटी पर डोगरा शासकों के जुल्म और शेख अब्दुल्ला का विद्रोह Dogra rulers on the valley and rebellion of Sheikh Abdullah

अगले नब्बे साल तक पूरी कश्मीर घाटी पर डोगरा शासन ने बेहिसाब जुल्म किए और वहां की जनता को हर सुविधा से वंचित रखा, जबकि लूट खसोट चरम पर रही। ऐसे में आखिरी डोगरा राजा हरि सिंह के जुल्मों के खिलाफ बिगुल फूंका शेख अब्दुल्ला ने। शेख की नेतृत्व क्षमता से जवाहरलाल नेहरू भी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने शेख अब्दुल्ला को कश्मीरियों का एकमात्र नेता मान लिया।

पटेल और अन्य कई कांग्रेसी व कट्टरपंथी हिन्दू नेता कश्मीर के नाम से हमेशा बिदके

बंटवारे के समय सैकड़ों रियासतों को भारतवर्ष में शामिल कर चुके सरदार पटेल और अन्य कई कांग्रेसी नेता व कट्टरपंथी हिन्दू नेता, पता नहीं क्यों कश्मीर के नाम से हमेशा बिदके। ये सभी नेता कश्मीर घाटी से छुटकारा पाना चाहते थे लेकिन अंतर्राष्ट्रीय हालात की सर्वाधिक बेहतर समझ रखने वाले नेहरू कश्मीर को भारत के लिए बेहद ज़रूरी मानते थे, और इसीलिए एडविना और लार्ड माउन्टबेटन की एक न सुनते हुए नेहरू पठानकोट के लिए अड़ गए, क्योंकि पाकिस्तान को करीब-करीब दिया जा चुका पठानकोट अगर भारत को न मिलता तो भारत के लिए कश्मीर की स्थिति बिल्कुल वैसी हो जाती जैसे पाकिस्तान के लिए पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था।

कश्मीर पर कब्जा करने के लिए शुरुआती हमले क़बायलियों ने किए थे न कि पाक फौज ने The first attack was carried out by the tribal people to capture Kashmir, not the Pak army.

1947 में बंटवारे के बाद कश्मीर पर कब्जा करने के लिए शुरुआती हमले खुले तौर पर क़बायलियों ने किए थे न कि पाक फौज ने। यह स्थिति ज़्यादा ख़तरनाक थी। घाटी के बड़े हिस्से पर खूंखार क़बायलियों का कब्जा हो चुका था। उस समय नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के साथ मिल कर डोगरा राजा पर भारत में शामिल होने का दबाव बनाया, उससे दस्तख़त कराए और तब भारतीय फौजों ने हमले शुरू लिए और तब पाक फौज भी सामने आ गई।

पाकिस्तान ने युद्धविराम न किया होता तो भारत के पास पूरा कश्मीर होता, लेकिन जुम्मा-जुम्मा दो दिन पहले पैदा हुए एक राष्ट्र के सर्वोच्च नेता के रूप में नेहरू के सामने राष्ट्रसंघ में जाने के सिवा और चारा ही क्या था, जबकि देश के अंदर उनके मंत्रिमंडल में ही कश्मीर को लेकर कोई उत्साह नहीं था।

 

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