लालू प्रसाद यादव की सजा : भ्रष्ट समाज में ऐसे फैसलों से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ‘न्याय’ के पक्ष में कोई खड़ा नहीं होना चाहता

हम दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में एक ऐसा नमूना देश बन कर उभरे हैं जहां भ्रष्टाचार में जेल जाने पर उस पार्टी का जनाधार और मजबूत होता है। शाहनवाज आलम चारा घोटाले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की सजा पर समाज में दो तरह से प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। …
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हम दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में एक ऐसा नमूना देश बन कर उभरे हैं जहां भ्रष्टाचार में जेल जाने पर उस पार्टी का जनाधार और मजबूत होता है।

शाहनवाज आलम

चारा घोटाले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की सजा पर समाज में दो तरह से प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक तबके का आरोप है कि उन्हें ‘पिछड़ा’ वर्ग से होने के कारण सजा हुई है और अगड़ी जाति से आने के कारण ही पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नथ मिश्र बरी कर दिए गए हैं। इस तबके के अनुसार यह न्यायपालिका पर मनुवादी शक्तियों के वर्चस्व को दिखाता है। वहीं दूसरा तबका इसे न्याय की जीत बताते हुए इसे भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेताओं के खिलाफ एक ऐतिहासिक फैसला बता रहा है लेकिन वह जगन्नाथ मिश्र के बरी हो जाने पर कोई तार्किक जवाब नहीं दे पा रहा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि इन दोनों की तरह की प्रतिक्रियाओं का अपना सामाजिक और राजनीतिक धरातल है। उन्हें बलि का बकरा बताने वालों में ज्यादातर कथित पिछड़ी जातियों से आते हैं जिनके ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर हुए राजनीतिक उभार में लालू प्रसाद यादव एक महत्वपूर्ण कारक रहे हैं। वहीं दूसरी व्याख्या के साथ खड़े लोगों में ज्यादातर कथित सवर्ण जातियों से ताल्लुक रखते हैं जो लालू को बिहार में सवर्णों के वर्चस्व वाली राजनीति को हाशिए पर डालने और हिंदुत्व के रथ और उसके तत्कालीन नायक को रोकने का दोषी मानते रहे हैं और जिन्होंने इसी वजह से हमेशा ही लालू यादव की नकारात्मक छवि को पसंद किया है।

हम अपनी न्यायपालिका के फैसलों को एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के बजाए एक कबीलाई समाज के बतौर देखते हैं

लालू प्रसाद पर आ रही इन प्रतिक्रियाओं में सामाजिक और जातिगत आधारों को संज्ञान में रखना भारतीय समाज के भ्रष्टाचार या अन्य किसी भी अपराध के प्रति उसके नजरिए के मुख्य नियामक तत्व के बतौर ‘जाति’ के महत्व को समझने के लिए जरूरी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि हम अपनी न्यायपालिका के फैसलों को एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के बजाए एक कबीलाई समाज के बतौर देखते हैं। यही वह मुख्य वजह है कि ऐसे या इससे भी बड़े आपराधिक मामलों में सजा के बावजूद इन प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगता क्योंकि ऐसे हर फैसले से ‘पीडित’ और ‘उत्पीड़क’ होने का एक मजबूत राजनीतिक तर्क पैदा हो जाता है। पदसोपान (हाईरारकी) आधारित समाज जहां हर जाति या समुदाय एक दूसरे पर वर्चस्व की इच्छा रखता है, में यह तर्क राजनीति की सबसे अहम संचालक शक्ति होती है।

क्योंकि ‘न्याय’ के पक्ष में कोई खड़ा नहीं होना चाहता

हिंदुत्व के नाम पर भाजपा का उभार और उसके सत्ता तक पहुंचने या सामाजिक न्याय के नाम पर कथित वंचित जातियों के जातिगत गोलबंदियों के सहारे राज्य सत्ता पर विराजमान होने तक में सबसे अहम कारक ‘दूसरों’ पर वर्चस्व की इच्छा ही रही है। यानी, आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के बजाए हमारी पूरी राजनीतिक प्रक्रिया, ‘ऐतिहासिक अन्यायों और शोषणों’ का बदला लेने या उनसे हिसाब बराबर करने की आकांक्षाओं से ही संचालित है। ऐसे में हर महत्वपूर्ण घटनाक्रम स्वभावतः एक ‘वर्चस्व’ केंद्रित नजरिये से देखा जाने लगता है, चाहे वह न्यायिक प्रक्रिया से ही जुड़ा हुआ क्यों न हो। परिणाम स्वरूप, ‘अन्याय’ को दुरूस्त करने की पूरी बहस से ‘न्याय’ गायब हो जाता है, ‘न्याय’ के पक्ष में कोई खड़ा नहीं होना चाहता। मसलन, अगर आप बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने को ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का बदला लिया जाना बताने वालों से बात करें तो उस ध्वसं को जायज ठहराने वाले लोग भी यह जरूर मानेंगे कि यह काम कानून विरोधी था, लेकिन वे कभी भी इसके दोषियों के साथ न्याय किए जाने का समर्थन नहीं करेंगे। इसीतरह, बहुसंख्यक समुदाय में आप को ऐसा बड़ा हिस्सा मिलेगा जो गुजरात 2002 की साम्प्रदायिक हिंसा को गलत तो बताएगा लेकिन वो इसके आरोपियों के साथ न्याय होने यानी उनको दंड दिए जाने के सख्त खिलाफ होगा।

समानता के लक्ष्य को हासिल करने में विफल रहे, या समानता को आयद करनी की संवैधानिक मूल्यों को सख्ती से लागू कर पाने में नाकाम रहे भारती समाज, में ‘न्याय’ कोई स्वतंत्र और सम्प्रभु अवधारणा नहीं बन पाया। उसे हमेशा सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक जैसे विश्लेषण के साथ परिभाषित होना पड़ता है, मसलन- सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय या आर्थिक न्याय। जाहिर है अगर एक लोकतांत्रिक राज्य के बतौर हम समानता के लक्ष्य को हासिल कर पाने में कामयाब हुए होते तो ‘न्याय’ जैसी महान अवधारणा को किसी और अवधारणा के भरोसे परिभाषित होने की मजबूरी नहीं होती। दूसरे शब्दों में ‘समानता’ के अभाव में हर न्यायिक फैसले का एक ‘अन्यायिक’ पाठ हमेशा मौजूद रहेगा।       

इसीलिए हम देखते हैं कि ऐसे किसी भी फैसले को एक समाज के बतौर हम ‘न्यायिक’ से ज्यादा ‘राजनीतिक’ फैसला मानते हैं। इस फैसले को भी इसी शोर शराबे में देखा जाएगा, जिसमें ‘भ्रष्टाचार’ या ‘न्याय’ शब्द शायद ही केंद्रीय बहस में आए। इसीलिए हम पाते हैं कि बिहारी समाज या उस पर नजर रखने वाले राजनीतिक व्याख्याकारों में बहस ‘भ्रष्टाचार’ पर नहीं बल्कि इस पर हो रही है कि इस फैसले से लालू और मजबूत होंगे या भाजपा और नीतीश उनकी राजनीति को खत्म कर देने में सफल हो जाएंगे?

इन दोनों सम्भावनाओं की बहस हमारे समाज के भ्रष्ट चरित्र को जाहिर करने के लिए पर्याप्त है। मसलन, एक सम्भावना यह जताई जा रही है कि लालू के जेल जाने से उनका भटका हुआ जातिगत जनाधार फिर वापस उनके पास सहानुभूति में लौट आएगा और चूंकि लालू अपने बेटों को पार्टी का कमान सौंप चुके हैं इसलिए राजद को इससे फायदा होगा। दूसरे शब्दों में हम दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में एक ऐसा नमूना देश बन कर उभरे हैं जहां भ्रष्टाचार में जेल जाने पर उस पार्टी का जनाधार और मजबूत होता है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि यूरोप के तमाम देशों में भ्रष्टाचार में नेताओं के जेल जाने से उनकी पूरी राजनीति ही नहीं चौपट हो गई बल्कि उनकी जनता ने ही उन्हें अछूत बना दिया।

वहीं, इस सम्भावना में कि इससे भाजपा को फायदा होगा, यह सामाजिक सच्चाई अंनर्तनिहित है कि इससे अगड़ी जातियों का राजनीतिक वर्चस्व सामंती मानसिकता वाले बिहार में फिर से बढ़ेगा। यानी भ्रष्टाचार के आरोप में सजा, हमें सामाजिक और राजनीतिक तौर पर एक प्रगतिशील दिशा में ले जाने के बजाए एक सामंती और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के वर्चस्व की दिशा में ले जाएगा। यह भी हमें एक लोकतंत्र के बतौर मजाक साबित करने के लिए पर्याप्त है। यकीन मानिए, ऐसा दुनिया में शायद ही कहीं होता हो।  

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