एक पूर्व संघ-कार्यकर्ता कारसेवक की आपबीती है मैं एक कारसेवक था

मैं एक कारसेवक था यह किताब उन सब को पढ़नी चाहिए, जो संघ को भीतर से समझना चाहते हैं। ख़ासतौर पर संघ के कार्यकर्ताओं को !
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एक पूर्व संघ-कार्यकर्ता कारसेवक की आपबीती है मैं एक कारसेवक था

“में कहता हूँ आँखिन देखी” की तर्ज़ पर यह एक पूर्व संघ-कार्यकर्ता कारसेवक की आपबीती है “मैं एक कारसेवक था” (Main Ek Karsewak Tha book by Bhanwar Meghwanshi)।

यह किताब उन सब को पढ़नी चाहिए, जो संघ को भीतर से समझना चाहते हैं। ख़ासतौर पर संघ के कार्यकर्ताओं को !

यह क़िताब संगठन निर्माण की उन बारीकियों के बारे में बताती है, जिनकी बदौलत संघ हज़ार शाखाओं वाला एक ऐसा विराट वृक्ष बन पाया है, जिसकी जड़ें पाताल तक जा पहुंची हैं।

यह क़िताब बिना लाग लपेट उस सपने के बारे में भी बताती है, जिसे संघ इस देश में साकार करना चाहता है और जो लगभग साकार हो भी चुका है।

ऐसा क्या है उस सपने के भीतर जिसने एक देशभक्त दलित को जीवन भर के लिए सम्प्रदायवाद ब्राह्मणवाद विरोधी कर्मकर्ता बना दिया ? यह क़िताब भारतीय सन्दर्भ में राष्ट्रवाद के जुमलों और उसके वास्तविक अभिप्रायों के बारे में बताती है।

हर देशभक्त के लिए, हर बहुजनवादी के लिए और हर उस व्यक्ति के लिए यह किताब काम की है, जो अपने समय और समाज के बारे में सचमुच चिंतित है।

क़िताब के लेखक हैं Bhanwar Meghwanshi और प्रकाशक नवारुण प्रकाशन के Sanjay Joshi.

आशुतोष कुमार