मोदी राज से योगी राज की ओर…..मीडिया हिन्दुत्व लहर की पूर्ण चपेट में

पांच राज्यों के लोकतांत्रिक जनमत ने प्रमाणित कर दिया है कि वर्तमान 21वीं सदी मोदी व आरएसएस–भाजपा की सदी है। जिसके झंडाबरदार भागवत, शाह व मोदी व योगी जी हैं। कालांतर से आरएसएस-भाजपा पर ये आरोप मढ़े जाते रहे हैं कि ये सैद्धांतिक व मूल रुप में ही दलितों, महिलाओं व मुस्लिमों व अन्य अल्पसंख्यकों …
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मोदी राज से योगी राज की ओर…..मीडिया हिन्दुत्व लहर की पूर्ण चपेट में

पांच राज्यों के लोकतांत्रिक जनमत ने प्रमाणित कर दिया है कि वर्तमान 21वीं सदी मोदीआरएसएसभाजपा की सदी है। जिसके झंडाबरदार भागवत, शाह व मोदी व योगी जी हैं।

कालांतर से आरएसएस-भाजपा पर ये आरोप मढ़े जाते रहे हैं कि ये सैद्धांतिक व मूल रुप में ही दलितों, महिलाओं व मुस्लिमों व अन्य अल्पसंख्यकों के घोर विरोधी व घनघोर साम्प्रदायिक रहे हैं। पर देश के अवाम ने लोकतांत्रिक उत्सव में अपनी प्रचंड भागेदारी इनके पक्ष में दिखाकर यह साबित कर दिया है कि ये सारे आरोप ना केवल बेबुनियाद हैं बल्कि फिजूल भी कहे जा सकते हैं।

कहने का यह अभिप्राय बताने की कतई जरूरत नहीं है कि संघ ने अपनी सोच 21वीं सदी की आधुनिक सोच के हिसाब से लोगों को भ्रमित करने मात्र के लिए कुछ परिवर्तित सी कर ली लगती है। तभी तो लोगों के इनके प्रेम व विकास पर इतना अटूट विश्वास जताया है। तभी तो डिमोनिटाइजेशन पर व इस पर कुर्बान 100 से ज्यादा आम लोगों ने चूं तक नहीं की।

आज संघाचारी भी खूबमखूब ढोल पीटते मिल जाएंगें कि अब वो जातिवादी व साम्प्रदायिक उन्मादी नहीं हैं, जो कि यूपी के चुनाव ने भी प्रमाणित कर ही दिया है।

क्या मुस्लिम और क्या दलित व यादव सभी ने तो जीतोड़ वोटिंग की थी। अब दिल्ली के नगर निगम चुनाव के परिणाम भी तो इसी कथा का अगला पन्ना साबित हुए हैं। फिर भी पता नहीं क्यूं मायावती, वामपंथियों, समाजवादियों व मुलायम कुनबे की बेवजह ही सांस फूली हुई है। पर कुछ विदेशी इवीएम के जानकार यह भी संभावना जता रहे हैं कि इसमें गड़बड़ी करना संभव है। पर वो ठहरे विदेशी इससे हमें क्या? हम ठहरे विशुद्ध राष्ट्रवादी तथा समरसता और देशभक्ति के प्रतीक। 

यूपी जीतने पर ट्रम्प फोन पर मोदी जी को भूरी-भूरी बधाई देते हैं पर इसका यह कतई अर्थ ना निकाला जाए कि दोनों मुस्लिमों, महिलाओं, बड़े कॉरपोरेटो के बारे एकसमान सोच वाले हैं?

.…जारी….

आज सामाजिक-राजनीतिक गलियारों में कुछ सिरफिरे व सहिष्णुता का राग अलापने वाले सैक्यूलर टाइप कुछ लोग यह खुसर-फुसर सी मचा रहे हैं कि वो देखो देश के सबसे बड़े राज्य में ताजा-ताजा बने मुख्यमंत्री योगी जी के शपथ लेते ही लखनऊ में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास को गंगाजल, गोमूत्र, देसी गायों के सैकड़ों लीटर दूध से दो दिनों से रगड़-रगड़ कर धोया जा रहा है। आवास के शुद्धिकरण, पवित्रीकरण की मुहिम में सैकड़ों शाखाचारी-भगवाधारी दिन-रात जी जीन से जुटे पड़े हैं, सो अलग। उच्चतम कोटि के पंडितों द्वारा हवन करवाए जा रहे हैं।

लोग कह रहे हैं कि ये सारी कवायद इसलिए चल रही है क्योंकि इस राजनिवास में दलित मुख्यमंत्री रही थीं, इसलिए इसको पवित्र करना जरूरी है।

अब आप ही बताएं कि क्या इत्तेभर से आप योगी जी व संघ को जातिवादी कह देंगे? भले ही ये आरक्षण को खत्म करने की बारम्बार कह रहे हो, पर क्या इससे इनका जातिवादी होना सिद्ध हो जाता है।

लोगों के कहने की क्या है, सुने हैं वो तो ये भी कह रहे हैं कि एक अपवित्र आदमी विशुद्ध पवित्र राजनिवास में रहेगा।

अब किस-किस की सुनें, कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि योगी जी मुस्लिमों, दलितों व महिलाओं के बारे में मानवीय विचार ना रखने के बहुत बड़े धन्नासेठ कहे जाते हैं। शायद इसी खासी विषेशता के चलते इनका नाम नागपुर से आयातित हुआ है।

जहिर है कुछ तो कारण रहे होंगे कि यूपी की जनता द्वारा चुने गए 325 विधायकों में से एक भी चुना हुआ प्रतिनिधि सीएम बनने के लायक नहीं है? यह तो सरासर लोकतांत्रिक तरिके से चुने 325 लोगों की व इनको अपना मत देने वाली जनता की अक्षम्य तौहीन है।

फिर ये कौन से तरह के लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटा जा रहा है?

जब दो उप मुख्यमंत्री हो सकते हैं, तो तीन भी हो सकते थे। तो क्यों नहीं किसी महिला को या मुस्लिम को इसमें शामिल किया गया?

ये अकारण तो नहीं हो सकता कि योगी जी के शपथ लेने के दो घन्टे बाद ही राज्य के कई जिलों में मुस्लिमों द्वारा संचालित बूचड़खानों को सील कर दिया गया?

योगी जी को इंसानों से ज्यादा गायों से प्रेम व लगाव है, इसलिए इनके राजनिवास में विशेष गौशाला भी बनाई जा रही है।

पशुप्रेम अच्छा है पर इंसान प्रेम का क्या?

मीडिया भी इसको विशेष एजेंडा के तहत देश के नए नायक के रूप में गढ़ रहा है।

यह कहना कितना उचित होगा कि आज संपूर्ण मीडिया हिन्दुत्व लहर की पूर्ण चपेट में आ गया है।

आज भाजपा-आरएसएस-मीडिया में अंतर करना काफी कठिन सा हो गया है। अक्सर दोनों एक दूसरे के  पूरक से नजर आते हैं। वैसे इस निजाम में ये सब सवाल असार्थक से लगते है क्योंकि योगी जी का जोर कर्म प्रधानता पर है ना कि मोदी जी की तरह कोरे भाशण प्रधानता पर?

पड़ोसी राज्य के नए-नए मुख्यमंत्री बने त्रिवेन्द्र जी ने भी शपथ लेते ही पहले काम के तौर पर गंगा की पूजा की और एलान किया कि राज्य में गौवंश संरक्षण कानून का कड़ाई से पालन होगा? हवनों का धुआं यहां भी थमने का नाम नहीं ले रहा है।

इनका दूसरा एलान भी स्वच्छता अभियान व निर्मल गंगा योजना पर रहा।

पर अब लोग कह रहे है कि क्या इन राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार किसानी, गरीबी, मंहगाई जैसे लोगों के जीवन को हरपल प्रभावित करने वाले मुद्दें इनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है?

लोगों का कहना है कि विकास की सुनामी में विकास तो अवश्य होगा पर किन-किन हिन्दूराष्ट्र वाले एजेंडा का होगा, यह आम लोगों की सोच के परे का मामला लगता है।

कुछ सिरफिरे यानि ठीक-ठीक अपनी भाषा में बोलें तो राष्ट्रविरोधी लोगों का कहना है कि अब देश को राष्ट्र व देशप्रेम के बहाने विकास के नाम पर दंगों व फसादों में झोंकने का कानूनी लाइसेंस देश की जनता ने दे दिया है।

साम्प्रदायिक सद्भाव व सहिष्णुता का राग अलापने वाले भी पता नहीं किस मिट्टी के बने हैं अब भी चुप नहीं बैठ रहे।

असल विकास के कौन से एजेंडा होगें गाय, रोमियो, बूचड़खाने, गंगा, या कुछ और? आखिर यह तय करने का अधिकार तो योगी जी, मोदी जी का ही है ना। इसमें कोई ताज्जुब की बात कहां है कि शुरुआती एक हफ्ते में सीएम बनते ही बिना किसी कैबिनेट की बैठक के 50 से ज्यादा घोषणाएं कर चुके हैं। लगता है मोदी जी की तर्ज पर इनके पास भी समय कम है और काम बहुत ज्यादा।

रोमियो स्कवायड भले ही युवा भाई-बहनों को प्रताड़ित कर उनसे पैसा वसूल रही हो पर एक्टिव जरूर हुई है। अब बेचारे पुलिसवालों को कौन बताए कि ये लव-जिहाद ही है बस नाम बदला है उनको मुस्लिम व दलित युवाओं की हड्डी पसली तोड़ उनको जेलों मे ठूंसना था।

बेसक मणिपुर के ट्राइबल्स ने वहां हिन्दुत्व का वैधानिक झंडा थाम लिया हो पर अब भी अदिवासियों को उनके अधिकारों, जमीनों, जंगलों से ऐसे ही खदेड़ा जाना अनवरत जारी है।

क्या आदिवासी महिलाओं की अस्मत से यूंही खेला जाता रहेगा?

आखिर कब तलक इनको नक्सली करार देकर इनकी हत्याएं जायज ठहराई जाती रहेंगी? पर आज मोदी तूफान के आगे यह विश्वास और गाढ़ा होता जा रहा है कि मानवीय व सामाजिक सवालों के आज कोई मायने नहीं हैं। आने वाले समय में गुजरात, हिमालच व झारखंड में भी अपनी ही सोच आने वाली है।

गुजरात से चली विकास की यह आंधी उत्तर प्रदेश की तरह बंगाल, केरल व त्रिपुरा पर झंडा गाडने में अवश्य ही कामयाब होने वाली है। पर बेचारे मध्यवर्गीय शिक्षित वामपंथी आज भी भारतीय आमजन दलित, मजदूर, गरीब, दलित-मजदूर महिला के जीवन की समस्याओं से दूर भारीभरकम शब्दों व सिद्धांतों की घटाटोप में ही उलझे मीटिंगों व सेमिनारों आदि में ही व्यस्त दिखते हैं। कोरे सिद्धांतों की चादर में ऐसे लिपटे पड़े हैं मानों बाहर झांकने पर बिच्छू इनको डंक कार देगा?

वैसे लोग तो यह भी कह रहे हैं कि अब भाजपा-राजग पार्टियों को छोड़कर बाकि सब पार्टी धारकों कम से कम 2024 तक वनवास पर चले जाना चाहिए।

वैसे मायावती को अपनी दुकान माफी बसपा का तो विलय ही भाजपा में कर लेना चाहिए, क्योंकि दोनों ही जाति की राजनीति करती हैं। ऐसा बसपाई ही कह रहे हैं क्योंकि चुनाव में मायावती के चमारों व जाटवों ने भी भाजपा को ही वोट दिया है। जय योगी जी।

वैसे कुछ पगलैट टाइप लोगों का कहना है कि वर्तमान सुनामी के सामने तभी टिक पाना संभव है जब 2019 में भाजपा एक तरफ और देश की तमाम छोटी-बड़ी लोकल व राष्ट्रीय पार्टियां दूसरी तरफ हो जाएं। हो सकता है ऐसा दौर भी आ ही जाएं। क्योंकि राजनीति में कुछ भी संभव है।

पर आज के दिन तक देश की जनता पर हमें पूर्ण विष्वास है कि वह राष्ट्रहित में, विकास, मन्दिर व हिन्दुत्व निर्माण के लिए, गंगा व हिन्दुस्थान की स्वच्छता के खातिर, गाय के मान-सम्मान व आरक्षण के खात्मे के लिए अवश्य ही जुलाई 2017 में मोहन भागवत जी को राष्ट्रपति की शपथ दिलाकर ही दम लेंगे? भले ही खुद भागवत जी इसके लिए ऊपरी मन से मना कर रहे हों। वैसे भी आजकल दमदार लोगों का ही जमाना है और आज के भारतवासियों को शायद ऐसे ही दमदार पुरुषों की जरूरत है।

जय मोदी, जय गुजरात, जय विकास, जय योगी-भागवत और जय बंगाल-केरल विद शाह जी। 2014 से देश का आवाम यह प्रमाणित करने पर तुला है कि ’यह पब्लिक है, जो कुछ नहीं जानती है’।

ये पब्लिक बारम्बार चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि गड़बड़ी इवीएम में नहीं हमारे दिमागों में है।

लोगों ने बता दिया है कि इवीएम का मतलब ’एवरी वोट फोर मोदी’। हम बाबरी, गोधरा, मुजफ्फरनगर, कैराना, दुलिना, मिर्चपुर, अखलाक, रोहित, कलबुर्गी, नजीब, कृश्णनन आदि-आदि से कोई सरोकार नहीं रखना चाहते।

देश की जनता के सारे सरोकार तो सीधे संघ से जुड़ रहे हैं, इतनी सी बात दलितों, वामपंथियों व अल्पसंख्यकों को पल्ले क्यों नहीं पड़ रही है?

बेशक महंगाई पूंजीपतियों की स्थाई रखैल बन जाए, रोजगार दम तोड़ते जाएं, शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएं चौपट हो जाएं पर हम हिन्दू होने, मोदी भक्त होने, राष्ट्रवादी होने पर अपने जाथर से भी ज्यादा गर्व महसूस कर रहे हैं।

स्कूल-यूनिवर्सिटी बंद किए या निजी पूंजी को बेचे जा सकते हैं, पर भारतमाता के जयकारे के साथ हर गांव-गली में गउशालाएं खोलनी जरूरी है।

सुन रहे हैं कि 2017 आखिर तक देश की तमाम गउमाताओं के आधार कार्ड भी बन जाएंगे। और इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि 2019 के संसदीय चुनावों में गायों को वोट डालने का अधिकार भी मिल जाए। पर पुरुष प्रधान समाज में माता के तो चहूंओर खुबम खुब ढिढोरे पीटे जा रहे हैं पर पिताओं की कोई खैर-खबर नहीं ले रहा है। लिहाजा मौसी (बिल्ली) ने भी मूछें तरेर ली है। हिन्दू देवी-देवताओं के वाहन रहे तमाम चूहें, कुत्ते, हाथियों, बैलों, सेरों कछुओं आदि की राष्ट्रीय खाप पंचायतें जोरों पर चल रही हैं। आन्दोलन की रणनीतियां गढी जा रही है और मांगपत्र तैयार हो रहे हैं और सुने हैं सब मिलकर एक सांझा मंच बना रहे हैं और आने वाले दिनों में जंतर-मंतर पर बड़ा कार्यक्रम करने की फिराक में हैं। क्योंकि जब गाय का आधार व वोट कार्ड बन सकता है तो बाकियों का क्यों नहीं?

किसी ने सही कहा है कि परिवर्तन समाज का नियम है और आज भयंकर परिवर्तन का दौर है, आप भी बदल जाइये जनाब नहीं तो आपको ही बदल दिया जाऐगा। क्योंकि आज विकास के अंधड़ में किसी भी तरह के विरोध की कोई गुंजाइश नहीं है।

भारत की सभी माताओं की जय और सबके विनाश पर कुछ का विकास।

मुकेश कुमार

(Mukesh Kumar Asst. Prof. Dept. Of Commerce PGDAV College)