आज की तारीख में काला दिवस के रूप में मने प्रेस दिवस

आज की तारीख में काला दिवस के रूप में मने प्रेस दिवस आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस है (Today is national press day)। मेरे कई साथी जो मीडिया समूह में मालिकान और संपादकों की चाटुकारिता करते हुए मीडिया की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे हैं, उनमें से काफी मुझे नकारात्मक सोच का व्यक्ति बताने लगे हैं। …
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आज की तारीख में काला दिवस के रूप में मने प्रेस दिवस

आज की तारीख में काला दिवस के रूप में मने प्रेस दिवस

आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस है (Today is national press day)। मेरे कई साथी जो मीडिया समूह में मालिकान और संपादकों की चाटुकारिता करते हुए मीडिया की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे हैं, उनमें से काफी मुझे नकारात्मक सोच का व्यक्ति बताने लगे हैं। मैं उनसे ही पूछता हूं कि प्रेस दिवस पर मैं क्या लिखूं। क्या यह लिख दूं कि देश की प्रेस हर उस कसौटी पर खरी उतर रही जिसके लिए उसका गठन किया गया था। नहीं न ?

तो फिर नकारात्मक तो लिखना पड़ेगा ही न।

जिस प्रेस का गठन समाज की समस्याओं, बुराइयों को जनता के सामने लिए किया गया था। कमजोर, जरूरमंद की आवाज बनने के लिए किया गया था। नौकरशाह, पूंजीपतियों और राजनेताओं की निरंकुशता पर अंकुश रखने के लिए किया गया था, वह आज की तारीख में नौकरशाह, पूंजपीतियों और राजनेताओं की रखैल बनकर रह गई है।

कहने तो देश में अनगिनत प्रेस, क्लब हैं। प्रेस परिषद है। पर ये सब संगठन बस शाम को दारू पीकर बकवास करने के लिए सिमट कर रह गये हैं।

गत दिनों मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई के लिए रूप में कई स्वाभिमानी मीडियाकर्मियों ने सुप्रीम कोर्ट क आदेश के पक्ष में मोर्चा खोला। उन कर्मियों में से कितने को टर्मिनेट कर दिया गया, कितने के ट्रांसफर कर दिये गये। ये सभी मीडियाकर्मी आज की तारीख में मीडिया में चल रहे दमन और अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। मीडिया हाउस में काम कर रहे कितने मीडियाकर्मियों का मानसिक, आर्थिक, दैहिक शोषण किया जा रहा है।

कहां हैं, प्रेस क्लब ? कहां प्रेस परिषद ? कहां है प्रेस की जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेही देने वाले लोग ?

कहना गलत न होगा कि देश में यदि कहीं पर सबसे अधिक शोषण, दमन और उत्पीड़न है तो वह प्रेस ही है। जो प्रेस दूसरे के हक की लड़ाई लड़ने का दंभ भरती है वह अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ पा रही है। मीडियाकर्मी अपने और अपने मालिकों के हित साधने के लिए मीडिया की जिम्मेदारियों तिलांजलि दे रहे हैं।

Establishment of Press Council in India

प्रेस के गठन की बात करें तो प्रथम प्रेस आयोग ने हमारे देश में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा एवं पत्रकारिता में उच्च आदर्श कायम करने के उद्देश्य से एक प्रेस परिषद की कल्पना की थी। परिणाम स्वरूप चार जुलाई 1966 को भारत में प्रेस परिषद की स्थापना की गई, जिसने 16 नंवबर 1966 से अपना विधिवत कार्य शुरू किया। तब से लेकर आज तक प्रतिवर्ष 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्व में आज लगभग 50 देशों में प्रेस परिषद या मीडिया परिषद है। भारत में प्रेस को वाचडॉग एवं प्रेस परिषद इंडिया को मोरल वाचडॉग कहा गया है। क्या ये हैं ?

आज की तारीख में काला दिवस के रूप में मने प्रेस दिवस
CHARAN SINGH RAJPUT चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

मीडिया को समाज का दर्पण एवं दीपक दोनों माना जाता है। ये यह है ? आज की तारीख में तो यह इन तीनों के विरोध में काम कर रहा है। इनमें जो समाचार मीडिया है, चाहे वे समाचारपत्र हो या समाचार चैनल, उन्हें मूलत: समाज का दर्पण माना जाता है। दर्पण का काम है समतल दर्पण का तरह काम करना ताकि वह समाज की हू-ब-हू तस्वीर समाज के सामने पेश कर सकें। क्या यह तस्वीर पेश हो रही है। कहना गलत न होगा कि गलत कामों पर पर्दा डालकर गलत काम करने वालों को महिमामंडन करना आज का प्रेस का काम हो गया है।

मतलब खोजी पत्रकारिता के नाम पर आज पीली व नीली पत्रकारिता न जाने कितने पत्रकारों के गुलाबी जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है।

खुद भारतीय प्रेस परिषद ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में प्रेस ने ज्यादा गलतियां की हैं। अधिकारियों की तुलना में प्रेस के खिलाफ अधिक शिकायतें दर्ज हैं।
पत्रकारिता आजादी से पहले एक मिशन थी। आजादी के बाद यह एक व्यवसाय बन गई। इसमें मैनेजरों के रूप में काम करने वाले संपादकों, पत्रकारों का बहुत बड़ा योगदान है।

यदि आपातकाल की बात छोड़ दें तो पत्रकारिता की ओर से भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई बड़ा अभियान नहीं छेड़ा गया बल्कि खुद भ्रष्टाचार की चपेट में आ गई। वजह जो भी प्रेस अपनी जिम्मेदारियों और जवाबदेही से नहीं बच सकती है।

चरण सिंह राजपूत