मोदी की तुगलकी नीतियों की देन है मंदी और डूबती अर्थव्यवस्था

मंदी और राजनीति-शून्य आर्थिक सोच की विमूढ़ता Recession and Politics – Zero Economic Widening अति-उत्पादन पूँजीवाद के साथ जुड़ी एक जन्मजात व्याधि है। इसीलिये उत्पादन की तुलना में माँग हमेशा कम रहती है। यही वजह है कि पूंजीवाद में हर एक चक्र के बाद एक प्रकार की संकटजनक परिस्थिति सामने आती ही है। लेकिन पूँजीवाद के …
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मोदी की तुगलकी नीतियों की देन है मंदी और डूबती अर्थव्यवस्था

मंदी और राजनीति-शून्य आर्थिक सोच की विमूढ़ता Recession and Politics – Zero Economic Widening

अति-उत्पादन पूँजीवाद के साथ जुड़ी एक जन्मजात व्याधि है। इसीलिये उत्पादन की तुलना में माँग हमेशा कम रहती है। यही वजह है कि पूंजीवाद में हर एक चक्र के बाद एक प्रकार की संकटजनक परिस्थिति सामने आती ही है।

लेकिन पूँजीवाद के इस चक्रिक संकट की चर्चा से भारत में अभी की तरह की मंदी की व्याख्या करना शायद अर्थनीति संबंधी सबसे जड़ बुद्धि का परिचय देना होगा।

पूँजीवाद के इस संकट के कथन से सन् 1929 की महामंदी की कोई व्याख्या नहीं हो सकती है। वह इसे नहीं बताती है कि क्यों 1929 की तरह की डरावनी परिस्थिति दुनिया में बार-बार पैदा नहीं होती है ?

पूँजीवाद सिर्फ अति-उत्पादन ही नहीं करता है , वह उतनी ही गति से अपने उत्पादों की नई माँग भी पैदा करता है। नित नये उत्पादों से बाजार को पाट कर उपभोक्ताओं में उनकी लालसा पैदा करता है।

माँग का संबंध अर्थनीति के सिर्फ भौतिक जगत से नहीं, आबादी के चित्त में उसकी क्रियात्मकता, उस जगत के अक्श से होता है। इसे ही पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया की द्वंद्वात्मकता कहते हैं।

माल और उसके प्रति आदमी की लालसा के बीच की दूरी को पाटने के क्रम में ही अर्थ जगत में सक्रियता बनी रहती है।

जब पूँजीवाद माल के प्रति लालसाओं को पैदा करने में असमर्थ होता है, अर्थजगत मंदी के भँवर में एक प्रकार से अंतहीन स्तर तक धँसता चला जाता है।

आदमी में लालसाओं का संबंध उसकी आंतरिक ख़ुशियों से, भविष्य के प्रति उसकी निश्चिंतता और अपने रोज़गार के प्रति आश्वस्ति से होता है। सबसे अच्छा उपभोक्ता सबसे उन्मुक्त और उल्लसित मनुष्य ही हो सकता है।

किसी भी वजह से डरे, दबे हुए और अस्तित्वीय चिंता में डूबे आदमी में कोई लालसा नहीं रहती है।

1929 की महामंदी के अनुभवों की व्याख्या करते हुए जॉन मेनार्ड केन्स ने आर्थिक मंदी को आबादी के मनोविज्ञान से जोड़ते हुए कहा था कि जब यह मनुष्यो के मनोविज्ञान में पैठ जाती है तो इसे निकालना बहुत सख़्त होता है। इसके लिये वर्षों के आश्वस्तिदायक परिवेश की ज़रूरत होती है।

कहना न होगा, भारत की अभी की मंदी बिल्कुल वैसी ही है जिसका सीधा संबंध सामाजिक मनोविज्ञान से है। इसके मूल में मोदी शासन, मोदी की तुगलकी नीतियाँ, घर की स्त्रियों के धन तक को खींच कर निकाल लेने का उनका अश्लील उत्साह, दमन और उत्पीड़न के प्रति गहरा आग्रह और सरकारी दमन-तंत्र के मनमाने प्रयोग की स्वेच्छाचारी नीतियाँ हैं।

अर्थात्, अभी की भारत की मंदी की, जिसमें पारले जी के स्तर के सस्ते बिस्कुट का उत्पादन भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, कोई शुद्ध अर्थनीतिक व्याख्या संभव नहीं है। इस मंदी का सत्य अर्थनीति में नहीं, राजनीति में, समाज-नीति में निहित है।

Public mind is not just about economics

इसकी कोई भी शुद्ध आर्थिक व्याख्या (Net economic interpretation), जितने भी गंभीर आँकड़ों के आधार पर की जाए, संतोषजनक नहीं हो सकती है। जन चित्त सिर्फ अर्थनीति से नहीं बनता है। इसमें अर्थनीति की निर्णायकता का तर्क भी इसलिये तात्कालिक दृष्टि से बेकार हो जाता है क्योंकि क्षितिज से मूलगामी आर्थिक परिवर्तन का विकल्प एक सिरे से ग़ायब है।

आज भारत की मंदी से लड़ाई एक बड़े राजनीतिक संघर्ष की माँग कर रही है। जब तक राजनीति में कोई ऐसा मुक़ाम तैयार नहीं होता है, जो लोगों को उनकी दासता की भावना से मुक्त करके उल्लसित कर सके, इस मंदी से मुक्ति लगभग असंभव जान पड़ती है।

मंदी से मुक्ति कैसे (How to get rid of recession)

इस मंदी से मुक्ति के लिये कृषि क्षेत्र और आम लोगों को मामूली राहतें देने वाले पैकेज की बातें सचमुच अर्थशास्त्रियों के सोच की सीमाओं को ही दर्शाती है। आज की मंदी पर अर्थशास्त्रियों की मंत्रणाएं विचार की कोरी मुद्राएँ लगती है। 1929 का अंत विश्वयुद्धों और उसके बाद के विश्व राजनीतिक भूचाल के रूप में सामने आया था, वैसे ही यह मंदी हमारे क्षेत्र में एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का कारक बने तो वह आश्चर्यजनक नहीं होगा। वातावरण में उन काली घटाओं के संकेतों को आसानी से पढ़ा जा सकता है।

अरुण माहेश्वरी

Recession and sinking economy are the result of Modi’s Tughlaqi policies