रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष पर पंजा मारकर मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था की कब्र खोद दी

रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष पर सरकार का पंजा (Government’s paw on Reserve Bank’s Reserve Fund) : सरकार ने खुद को ही नि:स्व किया है रिजर्व बैंक से अंतत: एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ रुपये केंद्र सरकार ने लेकर दिवालिया हो रही निजी कंपनियों के तारणहार की भूमिका अदा करने और चंद दिनों के लिये …
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रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष पर पंजा मारकर मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था की कब्र खोद दी

रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष पर सरकार का पंजा (Government’s paw on Reserve Bank’s Reserve Fund) : सरकार ने खुद को ही नि:स्व किया है

रिजर्व बैंक से अंतत: एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ रुपये केंद्र सरकार ने लेकर दिवालिया हो रही निजी कंपनियों के तारणहार की भूमिका अदा करने और चंद दिनों के लिये अपने खुद के वित्त में सुधार करने का जुगाड़ कर लिया है।

दो दिन पहले ही वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों को सत्तर हज़ार करोड़ रुपये नगद देने और एनबीएफसी (NBFC) को अलग से हाउसिंग क्षेत्र में निवेश (Investment in housing sector) के लिये बीस हज़ार करोड़ देने की घोषणा की है। इसके अलावा, इसी साल, महीने भर बाद सितंबर से ही 36 रफाल लड़ाकू विमानों की पहली किश्त की डिलेवरी शुरू होगी जिसमें सरकार को बचे हुए लगभग उनसठ हज़ार करोड़ रुपये का भुगतान करना है। अर्थात् इन तीन मदों में ही सरकार पर लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त ख़र्च आना है। प्रत्यक्ष राजस्व संग्रह में कमी (Decrease in direct revenue collection), जीएसटी से संग्रह में कमी (Reduction in collection from GST) और राज्य सरकारों के प्रति केंद्र की बढ़ती हुई देनदारी के चलते सरकार पर जो अतिरिक्त बोझ आया हुआ है, उन सबके लिये सरकार के पास रिजर्व बैंक की इस राशि से सिर्फ तीस हज़ार करोड़ बचेगा। इस पर भी उद्योग जगत अपनी गिद्ध-दृष्टि गड़ाए हुए हैं।

अर्थात्, इन एक लाख छियत्तर हज़ार करोड़ में से सरकार को एक पैसा भी कृषि क्षेत्र के लिये या जन-हितकारी अन्य किसी भी काम के लिये अतिरिक्त मिलने वाला नहीं है। प्रतिरक्षा की कुछ खास ख़रीदों के अलावा बाक़ी रुपया बैंकों और उद्योग जगत के घाटों की पूर्ति में हवा हो जाने वाला है।

इस प्रकार, रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष को कम करके और उसके मुनाफे को लेकर सरकार ने एक प्रकार से अपनी आपदा-नियंत्रण शक्ति के साथ समझौता किया है, जिसका भारत की अन्तरराष्ट्रीय बाजार में साख पर निश्चित प्रभाव पड़ेगा।

आगे देखने वाली चीज रहेगी कि अन्तरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियाँ मोदी सरकार के इस बदहवास कदम का किस प्रकार मूल्याँकन करती है। इसका निश्चित असर भारत में विदेशी निवेश के हर रूप पर पड़ेगा। बजट में घोषित सोवरन बांड की स्कीम को तो सरकार पहले ही ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। अब रिजर्व बैंक की पतली हालत उसकी संभावना को और भी नष्ट करने के लिये काफी है।

भारत में विदेशी निवेश (Foreign investment in India) पर गहरे असर की आशंकाओं के कारण ही अब तक रिजर्व बैंक के अंदर से ही इसका विरोध किया जा रहा था। लेकिन अंतत: सरकार ने विमल जालान कमेटी (Vimal Jalan Committee) से सिफ़ारिश करवा कर और अपने कठपुतले गवर्नर के ज़रिये इस कोष को हस्तगत कर ही लिया।

रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष पर पंजा मारकर मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था की कब्र खोद दी
Arun Maheshwari अरुण माहेश्वरी, लेखक प्रख्यात वाम चिंतक हैं।

विमल जालान कमेटी ने अपनी सिफ़ारिश में इस बात को खास तौर पर नोट किया है कि भारत दुनिया की एक सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थ-व्यवस्था है, इसीलिये सरकार अपने केंद्रीय बैंक से एक प्रकार की तात्कालिक लेने का यह जोखिम उठा सकती है। जालान कमेटी का यह तर्क कितनी बालुई ज़मीन पर टिका है, इसे भारतीय अर्थ-व्यवस्था में विकास की दर में आए भारी गतिरोध को देख कर कोई भी बहुत आसानी से समझ सकता है।

लेकिन सरकार निरुपाय थी। जिस प्रकार उसके सामने अपने दैनंदिन ख़र्च उठाने की समस्या पैदा हो रही थी, उसमें कश्मीर के महँगे राजनीतिक खेल तक के लिये धन जुटाना उसके लिये समस्या बन सकता था। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा हथियारों का ख़रीदार है। भारत की इसी सचाई पर उसकी सारी कूटनीति भी टिकी हुई है। ऐसे में रिजर्व बैंक का यह रिजर्व कोष ही उसके लिये डूबते को तिनके का सहारा बचा हुआ था। अब इसका प्रयोग करके सरकार ने खुद को और ज्यादा नि:स्व और भारत को बुनियादी रूप से काफी कमजोर किया है।

नोटबंदी और कश्मीर नीति की तरह ही इसे भी भारत की तबाही के दूरगामी प्रभाव वाले मोदी सरकार के एक और कदम के रूप में ही देखा जाना चाहिए। वैसे बड़ी पूँजी से जुड़े जिन लोगों को इससे कुछ तात्कालिक लाभ होंगे, वे निश्चित तौर पर इसे मंदी-निवारक रामवाण औषधि का प्रयोग बता कर कुछ दिनों तक इसकी प्रशंसा का कीर्तन जरूर करेंगे।

अरुण माहेश्वरी