इत्तेफाक देखिए पिछले दिनों से राजकपूर को(पर) पढ़ रहा हूँ और आज शशि कपूर के जाने की ख़बर आई।
शशि कपूर मेरे प्रिय नहीं थे। 'दीवार' और 'गौतम गोविंदा' देखी है।
'गौतम गोविंदा' बचपन में, 'दीवार' तो उफ़, 'ऑल टाइम हिट' लेकिन उसकी वज़हें दूसरी थीं।
शशि का क़िरदार लेख लिखने के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकता है लेकिन वे मुझे इंटरटेन नहीं कर पाते थे।
उस परिवार के, उनदिनों के राज और शम्मी मेरे प्रिय हैं।
असल में राज कपूर, देव आनन्द, दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना, धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन आदि के युग में वे बेहद सॉफ्ट(मैं कमज़ोर कहना चाहता था, हालाँकि कॉमर्शियल नज़रिए से) लगते।
आदित्य कुमार गिरि, लेखक सेठ आनन्दराम जयपुरिया कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं। |
शशि कपूर के अंदर मैं एक संज़ीदा अभिनेता देखता रहा हूँ। व्यक्तिगत रूप से उनकी अदाएँ मुझे प्रभावित करती रही हैं।
अमिताभ के वे एक तरह से 'गाइड' भी रहे हैं। बहुत बुरे दिनों में उन्हें जिनदिनों सही सलाह की जरूरत थी, शशि हमेशा उनके साथ रहे। उन्हें क्या करना और क्या नहीं करना-की सलाह शशि ही देते। अमिताभ को द्वितीय श्रेणी के अभिनेताओं की कतार में जाने से शशि ने ही रोका।
थिएटर शशि के अनुरूप था। पिता के थिएटर ग्रुप को शशि ने ही जीवित रखा।
मैं लेकिन यह जरूर कहूँगा काश उन्होंने अपनी योग्यता के अनुरूप पटकथाएँ चुनी होतीं।
शशि को श्रद्धांजलि