भागवतजी ! आरएसएस स्त्री विरोधी क्यों है?

स्त्रियों के प्रति दोयम दर्जे और पशुवत उपभोग की वस्तु मानने का ही दुष्परिणाम है कि मोदी के भारतीय राजनीति का शिखर पुरुष बनने के बाद देशभर में महिलाओं के प्रति अपराधों में न केवल बाढ़ आई है, बल्कि बलात्कारियों और यौन-अपराधियों के समर्थन में प्रदर्शन किये गये,
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Mr Bhagwat Why is RSS anti-women भागवतजी ! आरएसएस स्त्री विरोधी क्यों है?

 Mr Bhagwat! Why is RSS anti-women?

"बलात्कार जैसी घटनाएं ग्रामीण भारत में नहीं बल्कि इंडिया में ज्यादा होती हैं" या फिर "सभी भारतीयों का डीएनए एक है"

जैसे विवादास्पद बयानों के लिए चर्चित संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों इंदौर में हुए एक कार्यक्रम में कहा था कि 'पति की देखभाल के लिए पत्नी एक करार से बंधी होती है। यदि पत्नी इसका उल्लंघन करती है तो पति उसे छोड़ सकता है।'

क्या है 'सप्तपदी'

क्या सचमुच हिंदुओं के सोलह संस्कारों में से एक वैवाहिक संस्कार के समय ऐसी कोई अनिवार्य वचनबद्धता का समावेश है? हां, अवश्य है और यह वचनबद्धता ही वर-वधू के वैवाहिक जीवन की आधारशिला है। इसमें पहले कन्या वर की वामांगी अर्थात पत्नी का स्थान ग्रहण करने से पहले सात वचन (संकल्प) प्राप्त करती है जो दोनों परिवारों की सूत्रबद्धता से लेकर दैनिक व्यवहार, गृहस्थाश्रम के संचालन, संतति व परिवार के पालन-पोषण, सामाजिक दायित्वों के निर्वहन तथा नैतिक व धर्म के पालन से सम्बंधित होते हैं।

इसी प्रकार वर भी वधू से इन्हीं से मिलते-जुलते सात वचन (संकल्प) प्राप्त करता है। ऐसी उभयनिष्ठ की सहमति के बाद ही कन्या का पिता/पालक/संरक्षक उसे वर के वामांग में प्रतिष्ठापित करता है।

यह प्रकिया सात चरणों में अग्नि और उपस्थित समाज को साक्षी मानकर सम्पन्न की जाती जिसे 'सप्तपदी' कहा गया है। आजकल की चलताऊ भाषा में इसे 'सात फेरे' जैसे अत्यंत संकुचित भाव वाले सतही कार्यक्रम में बदल दिया गया है। जबकि इन सात वचनों के बिना हिंदू -विवाह संपूर्ण नहीं माना जाता है।

स्त्री-पुरुष की समानता पर आधारित है हिंदुओं का दाम्पत्य जीवन

इस तरह हिंदुओं का जो दाम्पत्य जीवन स्त्री-पुरुष की समानता पर आधारित है उसे संघ प्रमुख द्वारा सिर्फ पुरुषवादी नजरिए से देखना न केवल हिंदू परंपराओं के अनुसार है और न ही आधुनिक संदर्भ में मानवाधिकारवादी सोच के अनुकूल।

यदि गहराई से विचार किया जाए तो उनका यह कथन उनके परमपूज्य गुरुजी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की उसी ख़ब्त की अगली कड़ी है जिसमें उन्होंने कहा है कि 'किसी भी जाति की विवाहित महिला की पहली संतान नंबूदरी ब्राह्मण से होनी चाहिए और उसके बाद ही वह अपने पति से संतानोत्पत्ति कर सकती है'। (ऑर्गनाइज़र, 2 जनवरी, 1961)

ऐसा कहते हुए गोलवलकर स्त्रियों को सिर्फ बच्चे पैदा करने वाली मशीन तथा उस पर पुरुषों का नैसर्गिक वर्चस्व का अधिकार मानते हैं। चाहे वह उनकी अपनी मां, बहन, पत्नी या पुत्री ही क्यों न हो। इसके साथ ही वे हिंदुओं को नस्लीय आधार पर श्रेष्ठ तथा निम्नस्तरीय दो अलग-अलग रूपों में विभाजित मानते हैं और यह भी आवश्यक समझते है कि निचले स्तर के हिंदुओं का पशुओं की तरह नस्ल सुधार उच्चवर्गीय नंबूदरी ब्राह्मणों के माध्यम से होना चाहिए। उनके लिए स्त्री की अस्मिता का जरा भी मूल्य और महत्व नहीं है; वे सिर्फ नस्ल सुधार की सामग्री हैं।

इस तरह गोलवलकर ने मध्यकाल से प्रचलित उसी जातीय तथा पुरुषवादी मानसिकता का पृष्ठपोषण किया जिसमें सामंतों व अन्य तथाकथित श्रेष्ठिवर्ग द्वारा अधिकारपूर्वक निम्न जातियों की दूल्हन की प्रथम रात्रिकालीन सहवास का अमानवीय अधिकार अपने लिए सुरक्षित कर लिया था।

यह आश्चर्यजनक है कि संघियों के 'परमपूज्य गुरुजी' गोलवलकर ने यह विचार अपने अज्ञानी और गँवार स्वयंसेवकों की भीड़ के बीच नहीं बल्कि अहमदाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों की एक सभा में भाषण देते हुए व्यक्त किये थे।

और, बात वहीं पर खत्म नहीं हुई बल्कि इस गुरुवाणी को आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने बड़ी शान और श्रद्धापूर्वक अपने एक लेख 'क्रॉस ब्रीडिंग में हिन्दू प्रयोग' शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित किया। (संदर्भ—उपरोक्त)

रंग बदलने में गिरगिट को बहुत पीछे छोड़ते हुए संघ द्वारा अपने परमपूज्य गुरुदेव की नाक बचाने की अनेक असफल कोशिशें की जाती रही हैं।

स्त्रियों के प्रति दोयम दर्जे और पशुवत उपभोग की वस्तु मानने का ही दुष्परिणाम है कि मोदी के भारतीय राजनीति का शिखर पुरुष बनने के बाद देशभर में महिलाओं के प्रति अपराधों में न केवल बाढ़ आई है, बल्कि बलात्कारियों और यौन-अपराधियों के समर्थन में प्रदर्शन किये गये, उनके जमानत पर रिहा होने के बाद उन्हें फूल-मालाओं से लादकर स्वागत सत्कार किया गया। कुलदीप सैंगर, चिन्मयानंद, कठुआ आदि इस तरह के ज्वलंत उदाहरण हैं।

स्त्री-विरोध संघियों के डीएनए में शामिल है, इसे मोदी ने बंगाल चुनाव में 'दीदी ओ दीदी' कहकर ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ाते हुए एक बार फिर साबित किया है तो कोई आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि वे इससे पहले 'डेढ़ करोड़ की गर्लफ्रेंड', 'जर्सी गाय' और 'फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को लड़कियां सप्लाइ करती हैं' जैसी बातें कहकर अपने संघी संस्कारों से सिंचित अति तुच्छ मानसिकता का परिचय देते रहे थे।

संघियों का एक बड़ा आदर्श-पुरुष विनायक दामोदर सावरकर भी महिलाओं के प्रति कुंठाग्रस्त था। उसने शिवाजी महाराज के सैनिकों द्वारा युद्ध में पकड़ी गई मुस्लिम स्त्रियों का बलात्कार न कर उनको ससम्मान वापस लौटाने को अनुचित बताया है।

उत्तर प्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर मुस्लिम महिलाओं को कब्र से भी निकाल कर उनके बलात्कार करने की बात कही है।

भाजपा सांसद साक्षी ने कहा कि हिंदुओं को दस-दस बच्चे पैदा करने चाहिए।

कुल मिलाकर देखा जाये तो इसमें जरा सा भी संदेह नहीं होना चाहिए कि संघ की मूल फासिस्ट सोच ही स्त्री विरोधी है। तभी तो मोहन भागवत ने हिंदुओं के वैवाहिक संस्कार की गर्हित एवं एकांगी व्याख्या करने का दुस्साहस किया।

श्याम सिंह रावत

वरिष्ठ पत्रकार

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