मोदी सरकार की हाथ की सफाई और महामारी को छूमंतर करने का खेल

पुरानी कहावत है कि जो इतिहास से यानी अनुभव से नहीं सीखते हैं, इतिहास को दोहराने के लिए अभिषप्त होते हैं। नरेंद्र मोदी का सत्ता पर ज्यादा से ज्यादा प्रत्यक्ष नियंत्रण हासिल करने का मोह क्या कोविड-19 की महामारी के मामले में भी, दूसरी लहर के विनाशकारी इतिहास का आगे भी दोहराया जाना ही भारतवासियों …
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मोदी सरकार की हाथ की सफाई और महामारी को छूमंतर करने का खेल

पुरानी कहावत है कि जो इतिहास से यानी अनुभव से नहीं सीखते हैं, इतिहास को दोहराने के लिए अभिषप्त होते हैं।  नरेंद्र मोदी का सत्ता पर ज्यादा से ज्यादा प्रत्यक्ष नियंत्रण हासिल करने का मोह क्या कोविड-19 की महामारी के मामले में भी, दूसरी लहर के विनाशकारी इतिहास का आगे भी दोहराया जाना ही भारतवासियों की नसीब में नहीं लिख रहा है? सारे लक्षण तो इसी के हैं।

Prime Minister Narendra Modi’s address to the nation on June 7, announcement of changes in vaccine policy

बेशक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम 7 जून का संबोधन, टीका नीति में बदलाव की घोषणा और दूसरी लहर की तबाही के सामने अपनी सरकार की मुस्तैदी के दावों के जरिए, विफलता के आरोपों से अपनी सरकार के बचाव पर ही केंद्रित रहा था।

प्रधानमंत्री ने कम से कम अपने मुंह से, महामारी की दूसरी लहर पर काबू पाने का दावा तक नहीं किया था। फिर भी, अचरज की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री के संबोधन से कम से कम शासनतंत्र और उनके समर्थक समूह तक यही संदेश गया कि कोविड की दूसरी लहर पर काबू पाया जा चुका है। अब दूसरे विषयों को उठाने का समय आ गया है।

यह इसके बावजूद था कि प्रधानमंत्री के राष्ट्र को संबोधित करने के इस दिन पर भी, दैनिक केसों की संख्या 81 हजार के करीब थी। यह संख्या बेशक, 7 मई को दूसरी लहर के शीर्ष पर दर्ज हुए 4,14,188 नये केसों के मुकाबले, उल्लेखनीय कमी को दिखाती थी। फिर भी, यह संख्या पहली लहर के शीर्ष पर, सितंबर के मध्य में दर्ज हुई दैनिक संक्रमणों की संख्या से बहुत कम भी नहीं थी। लेकिन, दूसरी लहर पर काबू पाए जाने का एलान तो प्रधानमंत्री के पक्के जोड़ीदार, गृहमंत्री इससे भी तीन दिन पहले ही कर चुके थे। 4 जून को गुजरात में एक कार्यक्रम में उन्होंने ‘कोविड-19 की दूसरी लहर पर बहुत तेजी से नियंत्रण कर लिए जाने’ का और जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नियंत्रण कर लिए जाने का, बाकायदा एलान भी कर दिया था। उस रोज केसों की दैनिक संख्या, 1 लाख 32 हजार से ज्यादा थी यानी पहली लहर के शीर्ष से करीब 33 फीसद ऊपर।

In the second half of April and the first fortnight of May, the outbreak of the second wave of COVID-19 was at its fastest.

वास्तव में अप्रैल के दूसरे और मई के पहले पखवाड़े में, कोविड-19 की दूसरी लहर का प्रकोप सबसे तेजी पर था और अस्पताल बैड, वेंटीलेटर, दवा, आक्सीजन, एंबुलेंस, श्मशान-कब्रिस्तान, समेत सारी व्यवस्थाएं नाटकीय तरीके से ढह गयी नजर आ रही थीं और इस सबके बीच छोटे-छोटे निजी या संगठनगत प्रयासों को छोडक़र, शासन तंत्र से लेकर सत्ताधारियों तक, कोई भी लाचार लोगों की मदद करने के लिए मौजूद नजर ही नहीं आ रहा था। उस समय सत्ताधारी संघ परिवार ने मुसीबत के मारे लोगों की मदद करने के प्रयासों में अपनी ताकत लगाने के बजाए, अपनी सारी ताकत इन कठोर सचाइयों को नकारने में और यह दिखाने में ही लगा रखी थी कि हालात उतने बुरे नहीं हैं, जितना देसी-विदेशी मीडिया के एक हिस्से द्वारा दिखाया जा रहा था। उनका सारा ध्यान, प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की छवि की हिफाजत करने पर ही था। जहां अप्रैल के आखिर में, संघ प्रमुख मोहन भागवत, मोदी और उनकी सरकार के बचाव के लिए यह दलील दे रहे थे कि अकेले सरकार के प्रयास से ऐसे संकट पर काबू नहीं पाया जा सकता है, वहीं मई के मध्य में वह सरकार की अकरनियों की आलोचनाओं को नकारात्मकता का बढ़ जाना करार देकर बाकायदा ‘‘पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’’ की मांग पेश कर चुके थे। कहने की जरूरत नहीं है कि उनके पीछे-पीछे, समूचा संघी ईको-सिस्टम, ‘‘पाजिटिविटी-पाजिटिविटी’’ की पुकार करने लगा।

         यहां से कोविड-19 पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोबारा नियंत्रण पाए जाने के दावों तक की यात्रा ज्यादा मुश्किल नहीं थी। फिर भी मई के तीसरे हफ्ते में भी हालात इतने खराब थे कि सीधे ऐसे दावों की शुरूआत करना मुश्किल था। ऊपर से संकट के समय में लोगों की मदद करने वालों के बीच, संघ परिवार के संगठनों की अनुपस्थिति पर उठते सवाल अब भी बहुत गर्म थे। लिहाजा भाजपा को न चाहते हुए भी, मोदी सरकार की सालगिरह के महीने के आखिर में पडऩे वाले आयोजनों को टालने का एलान करना पड़ा। फिर भी, भाजपा व संघ परिवारी संगठनों ने 30 मई को ‘सेवा और संगठन’ दिन मनाने की और सरकार की ओर से लोगों की मदद के कुछ कार्यक्रमों की घोषणा के जरिए, संकट के समय में लोगों का ख्याल रख रहे होने की रस्मअदायगी कर के ही, सब सामान्य हो चुका होने की मुद्रा अपना ली। मोदी सरकार को उसकी घोर विफलताओं की आलोचनाओं से बचाने के लिए, यह मुद्रा जरूरी थी। आखिर इसी तरह विषय बदलकर, मोदी और उनकी सरकार की छवि को बचाने की उम्मीद की जा सकती थी। कहने की जरूरत नहीं है कि विधानसभाई चुनावों के पिछले चक्र में मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन से, उनकी छवि बचाने की अर्जेंसी और बढ़ गयी थी।

         स्वाभाविक रूप से इस बीच उत्तर प्रदेश की ओर खासतौर पर ध्यान गया, जहां कोविड की दूसरी लहर में तबाही की और खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में तबाही की भयानक खबरें आ रही थीं और दुनिया भर में गंगा में बहतीं तथा गंगा के तट पर रेती में रामनामी से ढंकी उथली कब्रों में दफ्र हजारों लाशों की तस्वीरें सारी दुनिया ने देखी थीं। और इसी सब की पृष्ठभूमि में तथा पांच महीने से ज्यादा से जारी किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में, तीन स्तरीय पंचायती चुनाव में भाजपा की हार ने, अगले साल के शुरू में होने जा रहे विधानसभाई चुनाव के लिए खतरे की घंटी बजा दी। खतरे की गंभीरता भांपकर आरएसएस खुद मैदान में उतर पड़ा। उसकी तरफ से चिंता जतायी गयी। फिर, आरएसएस द्वारा अनुमोदित इनपुट एकत्र करने वाले दल भेजे गए। अंतत: योगी आदित्यनाथ को दिल्ली बुलाया गया और मोदी-शाह जोड़ी समेत भाजपा अध्यक्ष से मुलाकात कर उन्हें, इसका भरोसा दिलाना पड़ा कि वह चुनाव के लिए ‘सब को साथ लेकर चलने’ के लिए यानी संघ-भाजपा के लोगों की शिकायतों को दूर करने के अलावा, छोटे-छोटे जातिवादी समूहों को साथ रखने के लिए, जरूरी एडजस्टमेंट करने के लिए अपने ईगो पर नकेल लगाने के लिए तैयार हैं।

         बहरहाल, यह गौरतलब है कि योगी को चुनाव तक के लिए अभयदान देकर लखनऊ वापस भेजे जाने तक का पूरा घटनाचक्र, राष्ट्र के नाम मोदी के संबोधन के तीसरे-चौथे दिन तक पूरा भी हो चुका था। इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश से फुर्सत पाते ही मोदी-शाह-नड्डा की भाजपा, केंद्र सरकार के मंत्रालयों के काम-काज की विस्तृत समीक्षा की लंबी कसरत में जुट चुकी थी, जिसके जरिए इसका वातावरण बनाया जा रहा था कि केंद्रीय मंत्रिमंडल का महत्वपूर्ण विस्तार/ बदलाव होने जा रहा है। यह कोविड-19 की चुनौती की ओर से ध्यान हटाने की विभिन्न कोशिशों का ही एक और हिस्सा  है। उधर, केंद्रीय नेतृत्व से इशारा लेकर, खासतौर पर मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक जैसे भाजपा-शासित राज्यों ने न सिर्फ मौतों की गिनती घटाकर दिखाने के खेल को और तेज कर दिया है बल्कि संक्रमणों की संख्या से लेकर पॉजिटिविटी दर तक के मामले में हेराफेरी बढ़ा दी है, ताकि यह दिखाया जा सके कि कोविड-19 का संकट करीब-करीब खत्म ही हो गया है। अचरज नहीं कि मध्य प्रदेश में कोविड-19 से मौतों की संख्या में भारी हेरा-फेरी को बेनकाब करने के बाद, अभी हाल में कुछ दैनिकों ने पिछले हफ्तों में हुए टैस्टिंग के भारी फर्जीवाड़े को बेनकाब किया है, जिसके पीछे उद्देश्य यही लगता है कि महामारी को खत्म हो गया दिखाया जाए। महामारी से निपटने मेें मौजूदा सरकार की घनघोर विफलता की आलोचनाओं का मोदी ब्रिगेड की नजरों में एक ही जवाब है–महामारी के पीछे छूटने और कुछ भी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण हो जाने का माहौल बनाया जाए। अचरज नहीं कि उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारियों के हिस्से के तौर पर कथित गोरक्षकों के हमलों से लेकर, मुसलमानों के खिलाफ हमलों तक का सिलसिला, फिर से तेज हो गया है।

         इस सब को संघ-भाजपा जोड़ी की चुनावी-राजनीतिक पैंतरेबाजी मानकर ही छोड़ा जा सकता था, बशर्ते यह कोविड-19 महामारी के सामने हमारे देश को और अरक्षित नहीं बना रहा होता। याद रहे कि यह सब तब हो रहा है, जब महामारी की तीसरी लहर के आने को लेकर सभी वैज्ञानिक एक तरह से एक राय हैं। और इस संभावित तीसरी लहर का मुकाबला करने का कोई सबसे बड़ा हथियार है, तो वह टीकाकरण है। लेकिन, पहली लहर के उतार के बाद, महामारी को खत्म मानकर मोदी सरकार जिस तरह से सो गयी थी, वैसा ही वह एक बार फिर महामारी की ओर से ध्यान हटाने की अपनी उतावली में करने पर आमादा है। रही बात तीसरी लहर की तैयारियों की तो मोदी सरकार तो, अस्पतालों आदि की सुविधाओं के विस्तार जैसी दूसरी तैयारियों की तो बात ही क्या करना, टीकाकरण के लिए बजट में रखे गए 35,000 करोड़ रु0 के प्रावधान में से भी खासा हिस्सा बचाने और राज्यों के सिर पर टीकाकरण का भारी बोझ डालने की कोशिश कर रही थी। अब भी, जबकि 7 जून की प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद, राज्यों के हिस्से का 25 फीसद टीका भी खरीदने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार ने दोबारा स्वीकार कर ली है, 25 फीसद टीकों का वितरण निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिया गया है, जो पहले महीने में ही टीका वितरण में बहुत गंभीर असमानताएं पैदा भी कर चुका था। इसके ऊपर से, ‘महामारी खत्म’ की मुद्रा के सहारे देश में टीकों की उपलब्धता और टीकाकरण की रफ्तार तथा समस्याओं के तमाम वास्तविक प्रश्नों तथा आलोचनाओं को दबाने की ही कोशिश की जा रही है, जबकि उनके अंकुश के बिना टीकाकरण की तमाम संभावनाओं का दोहन किए जाने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है। याद रहे कि अब भी मोदी सरकार, न सिर्फ साल के आखिर तक ही 18 वर्ष की आयु तक के पूर्ण या लगभग-पूर्ण टीकाकरण का वादा कर पायी है बल्कि अब भी देश में टीका उत्पादन की रफ्तार को बढ़ाने के लिए उसने शायद ही कोई वास्तविक कदम उठाए हैं, जबकि इसके बिना इस लक्ष्य को पूरा किया ही नहीं जा सकता है। महामारी की चुनौती को नजरों से छुपाने की मोदी सरकार की बाजीगरी, महामारी की जगह, उसका मुकाबला करने की तैयारियों को ही गायब कर सकती है। इस जादूगरी का असली खतरा यही है कि जैसे पहली लहर के उतार के बाद की मोदी सरकार की मुजरिमाना लापरवाही ने दूसरी लहर का इतना भयानक होना सुनिश्चित किया था, वैसे ही अब जबकि दूसरी लहर उतार पर नजर आ रही है, उसी तरह की लापरवाही का दुहराया जाना, तीसरी लहर के सामने देश और जनता को और अरक्षित कर सकता है।                           

0 राजेंद्र शर्मा

मोदी सरकार की हाथ की सफाई और महामारी को छूमंतर करने का खेल
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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