जानिए जस्टिस काटजू ने क्यों कहा 'गोदी' मीडिया और 'मुक्त' मीडिया में बहुत अंतर नहीं है

जस्टिस मार्कंडेय काटजू का मीडिया पर हिंदी में लेख. इस लेख में जस्टिस काटजू अपरोक्ष रूप से तथाकथित फ्री मीडिया के धुरंधरों के कारनामों पर प्रकाश डालते हुए कई महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे हैं।
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 जस्टिस मार्कंडेय काटजू का मीडिया पर हिंदी में लेख

The pitiable condition of the Indian media: Justice Katju points out there is little difference between the ‘godi’ media and the ‘free’ media’

भारतीय मीडिया अब दो खेमों में बंट गया है

 (1) बहुसंख्यक, जो बेशर्म, बिक चुकी और चापलूस 'गोदी' मीडिया है। इस शिविर के लोग भारत की परिस्थितियों की एक गुलाबी तस्वीर पेश करते हैं ( नाज़ी प्रचार मंत्री डॉ गोएबल्स Dr Goebbels की तरह, जो कहते रहे कि जर्मनी द्वितीय विश्व युद्ध जीत रहा था, जब कि स्पष्ट रूप से हार रहा था)। वे सरकार के आलोचकों को देशद्रोही, माओवादी, 'टुकड़े-टुकड़े' गैंग आदि के रूप में चित्रित करते हैं, और पाकिस्तान के खिलाफ भावनाओं को भड़काते हैं, जिसे शैतान के रूप में चित्रित किया जाता है, और मुसलमानों को अक्सर देशद्रोही, कट्टर और आतंकवादी के रूप में ब्रैंड करते है।

इस शिविर का नेता एक टीवी एंकर है जिसे मैं लॉर्ड भो भो ( Lord Bhow Bhow ) कहता हूं ( लॉर्ड हौ हौ नाज़ियों के लिए रेडियो प्रसारण देते थे और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई )। उसने एक अनुकरणीय शैली विकसित की है, और वह अपने झुंड से बहुत आगे है। एक पत्रकार के रूप में तटस्थ और निष्पक्ष होने के बजाय वह लगातार अपने टीवी शो पर भाजपा सरकार की लाइनों को दोहराता है, चीखता है और पागल की तरह चिल्लाता है उन सभी पर जो शो में उससे असहमत हैं, उन्हें बोलने के लिए बहुत कम समय देता है (वास्तव में वह ज्यादातर समय खुद बोलता है), और अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक भावनाओं और पाकिस्तान के खिलाफ द्वेष और शत्रुता को भड़काता है I सत्य उसके लिए पूरी तरह बेमतलब और अप्रासंगिक है, जैसा कि डॉ गोएबल्स के लिए था, और वह बिना किसी हिचक के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता हैI

शिविर के अन्य लोग भी उसी का अनुसरण करते हैं, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी दोनों टीवी चैनलों के कई एंकर शामिल हैं। गुलाम प्रिंट मीडिया भी ज्यादातर इसी खेमे में है।

(2) अल्पसंख्यक, जो प्रत्यक्ष रूप से भाजपा का विरोधी और एक 'स्वतंत्र' मीडिया और ईमानदार होने का दिखावा करता है, वास्तव में भाजपा विरोधी संघर्ष और भाजपा विरोधी ताकतों की एक गुलाबी तस्वीर पेश करके तथ्यों से परे है।

यह शिविर सरकार द्वारा कोविड संकट, बढ़ती बेरोजगारी, किसान आंदोलन, आदि के बारे में गलत तरीके से व्यवहार करने पर जोर देता है, लेकिन जानबूझकर यह नहीं कहता है कि इस सब के बावजूद भारतीय लोगों के बीच मोदी की लोकप्रियता रेटिंग, जैसा कि कई जांच रिपोर्टों में पता चला है, अपरिवर्तित है और अभी भी बहुत ज़्यादा है।

इन लेखों को पढ़ें-

The Badshah of Indian Politics: Why the BJP government's flops don't affect Modi's popularity among India's young - https://www.edexlive.com

The reason why PM Modi's popularity doesn't change - https://www.youtube.com

इस खेमे में एक पत्रकार है, जिसका नाम मैंने मिकी माउस ( Mickey Mouse ) रखा है, जो सालों से एक 'गोदी मीडिया' टीवी चैनल में अग्रणी पद पर था। बाद में वहां से बर्खास्त होने पर जमकर भाजपा विरोधी हो गए। अब वह अपना खुद का YouTube चैनल चलाता है, जिसके बारे में उनका दावा है कि उसके एक साल के भीतर 1.5 मिलियन फॉलोवर्स और 240 मिलियन से अधिक बार देखा गया है।

उनका काम करने का तरीका सरल है : वे एक गर्म विषय को उठाते हैं और फिर लगातार उसके पीछे पड़ जाते हैं, और इस तरह यह धारणा बनाते हैं कि वह ग्राउंड जीरो ( ground zero ) से रिपोर्ट करते हैं, जबकि अन्य पत्रकार शायद ही कभी ऐसा करते हैं।

उदाहरण के लिए, उन्होंने किसानों के आंदोलन का मुद्दा उठाया, और फिर महीनों तक सिंघू, टिकड़ी, या ग़ाज़ीपुर सीमा पर सुबह-सुबह राकेश टिकैत और अन्य लोगों का साक्षात्कार लिए। बाद में वे पश्चिम बंगाल चुनाव को कवर करने के लिए कोलकाता चले गए।

दिल्ली लौटने पर वह किसानों के संघर्ष की प्रशंसा करते रहे, लेकिन जानबूझकर इस सच्चाई की रिपोर्ट नहीं की कि यह काफी हद तक फीकी पड़ गई है, कि दिल्ली की सीमाओं पर भीड़ अब कुछ हज़ार ही है (जबकि पहले यह लाखों की थी)।

एक महिला पत्रकार हैं, जिन्हें मैं मैडम पोम्पडौर ( Madame Pompadour ) कहता हूं, जो राडिया टेपों ( Radia Tapes ) में लिप्त थीं, और उन्हें लगा कि जब कांग्रेस, जिसके वे करीब थीं, सत्ता में थीं, तो वह केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों के विभागों को वितरित कर देंगी। जब भाजपा सत्ता में आई तो वह रोने लगी और किकियाने लगी कि अब कोई उससे संपर्क नहीं करता, लेकिन इस हालत की वह खुद दोषी है। क्या एक पत्रकार का काम किसी राजनीतिक दल के साथ तालमेल बिठाना और उसके नेताओं के साथ मित्रता बढ़ाना है?

बाद में वह अपनी टीम के साथ कोविड पीड़ितों के बारे में रिपोर्ट करने के लिए देश भर में गईं, जिनके लिए उनके दिल से खून बह रहा था (उनका दिल बहुत आसानी से और बार-बार छल्ली हो जाता है ) लेकिन उन्होंने अभी तक यह खुलासा नहीं किया है कि इसके लिए उनकी टीम को किसने फंड किया।

एक हिंदी पत्रकार हैं, जिसे मैं हम्प्टी डम्प्टी ( Humpty Dumpty ) कहता हूं (क्योंकि हम्प्टी की तरह वह गिर पड़े थे ), जो एक टीवी चैनल के प्रमुख एंकर थे, लेकिन जब अंदेशा हुआ कि वह बर्ख़ास्त कर दिए जाएंगे, तो उन्होंने जल्दी से इस्तीफा दे एक नए राजनीतिक दल में शामिल हो गए, यह सोचकर कि वह राजनीति में आगे जायेँगे। लेकिन जब उन्हें राज्यसभा टिकट नहीं मिला तो वे खिन्न हो गए, और अब दूसरों के साथ मिलकर एक हिंदी वेबसाइट शुरू कर दी है, जिस पर वे हमेशा भाजपा की आलोचना करते हैं। पत्रकारिता, राजनीति की तरह, अजीबोगरीब बेडफेलो बनाती है ( journalism, like politics, makes strange bedfellows ) I

एक अंग्रेजी मीडिया पत्रकार हैं जो सरकार की आलोचना करते हैं, कुछ अन्य लोगों के साथ एक वेबसाइट चलाते हैंI वह हमेशा प्रेस की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं, लेकिन इसका अमल करने में विश्वास नहीं करते, क्योंकि वह कभी भी अपने विचारों से अलग विचारों को अपने पोर्टल में प्रकाशित करने की अनुमति नहीं देते (उदाहरण के लिए यह विचार कि भारत की विशाल समस्याओं का समाधान संवैधानिक ढांचे के बाहर है, या मुसलमानों को शरिया, बुर्का और मदरसों को छोड़ना होगा यदि वे प्रगति करना चाहते हैं), यहां तक कि इस अस्वीकरण ( disclaimer ) के साथ भी नहीं कि प्रकाशित विचार प्रकाशकों के नहीं हैं। मैंने उसका उपनाम पीडीपी (PDP) रखा है ('प्रचार करें लेकिन अभ्यास न करें' - Preach but don't practice)

फिर भी, इस 'मुक्त' माध्यम को जीवित रखने के लिए जनता से एक सप्ताह में कई लाख रुपये दान करने की भीख माँगने वाले उनके पोर्टल से रोजाना कई बार ट्वीट आते रहते हैं।

तो वास्तव में 'गोदी' मीडिया और 'मुक्त' मीडिया में बहुत अंतर नहीं है।

- जस्टिस मार्कंडेय काटजू , पूर्व न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया

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