१६-१८वीं शतियों के राजनीतिक सिद्धांत

Political Theories of the 16-18th Centuries. राजनीतिक सिद्धांतों का इतिहास History of Political Theories in Hindi. आधुनिक युग के राजनीतिक सिद्धांतों की अंतर्वस्तु. बुर्जुआ राजनीतिक चिंतन के एक प्रथम प्रतिनिधि निकोलो मैकियावली थे। 
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राजनीतिक सिद्धांतों का इतिहास History of Political Theories in Hindi

 सामान्य विवेचना

१६वीं शती मानव जाति के इतिहास का एक सबसे संलक्ष्य मोड़ बिंदु है। इस शती में ही सामंतवाद से पूंजीवाद में वर्गीय विरोधों पर आधारित अंतिम सामाजिक-आर्थिक विरचना में संक्रमण आरंभ हुआ।

संसार के सभी देशों के लिए इतिहास एक ही है।

विश्व ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिधि में सभी देश आ जाते हैं। किंतु कुछ देश उसके साथ कदम मिलाकर चलते हैं, तो कुछ आगे बढ़ जाते हैं और कुछ पीछे। छूट जाते हैं। भिन्न-भिन्न देशों राज्यों और राष्ट्रों का यह असम विकास कम्युनिज्म से पहले की सारी ही ऐतिहासिक प्रक्रिया की एक नियमसंगत प्रवृत्ति है।

अतः स्वाभाविक ही है कि सामंतवादी समाज के गर्भ में नये, बुर्जुआ संबंधों का बीजारोपण और अंकुरण एक ही महाद्वीप की सीमाओं के भीतर भी सभी देशों में एक साथ नहीं हुआ। नयी सामाजिक व्यवस्था का उदय सबसे पहले और सबसे द्रुत गति से उन प्रदेशों में हुआ, जहा पूंजीवादी उत्पादन रीति के जड़े जमाने के लिए बुर्जुआ जीवन पद्धति के विकास के लिए सर्वाधिक अनुकूल वस्तुपरक तथा आत्मपरक, आंतरिक और बाह्य पूर्वापेक्षाएं बन चुकी थी। १६-१७वी शतियों में ऐसा प्रदेश पश्चिमी यूरोप के इटली, नीदरलैंड, इंगलैंड और फांस जैसे देश थे।

एक स्वतंत्र वर्ग में परिणत होते हुए बुर्जुआजी शनैः शनैः सामंतवादी व्यवस्था के विरोधी तबक़ों का अगुआ बन बैठा था। विकासमान पूंजी बादी संबंधों ने सामती संपत्तिधरों को भी प्रभावित किया और वे भी किसी न किसी सीमा तक अपने को उनके अनुरूप ढालने लगे। नयी पूंजीवादी विरचना के प्रादुर्भाव ने मनुष्य को जीवन का नये ढंग गठन करने, पुरानी मनोवृत्ति बदलने और नया विश्व दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया। मध्ययुगीनता, धार्मिक पुराणपचिता और साम संस्थाओं तथा परिपादियों के बोझ से मुक्ति पाना आवश्यक था। यदि मामतबाद में धार्मिक विश्व दृष्टिकोण का प्राधान्य था, तो पूंजीवादी पद्धति अपने उदय के क्षण से ही अपने साथ "विश्व के मानवीकरण" को प्रवृत्ति लेकर आयी थी। अब धर्म और ईश्वर के बजाय मनुष्य गहन तथा विशद अध्ययन का विषय बन गया।

राष्ट्रीय राज्यों के जन्म और विकास के साथ राज्य प्रभुसत्ता की प्राप्ति के साथ धार्मिक चिंतन का ह्रास हुआ और अंतःकरण तथा विचार स्वातंत्र्य की उद्घोषणा की जाने लगी। बुर्जुआ राज्य के वैचारिक आधार का काम करने वाले राजनीतिक सिद्धांत पैदा हुए।

बुर्जुआ राजनीतिक चिंतन के एक प्रथम प्रतिनिधि निकोलो मैकियावली थे। राजनीतिशास्त्र को धर्मशास्त्र के चंगुल से मुक्ति दिलाने की दिशा में प्रथम कदम उन्होंने ही उठाया, जिसका आधुनिक राजनीति विज्ञान के लिए बहुत बड़ा महत्त्व रहा। उन्होंने राज्य के प्रश्न की धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण से नहीं, अपितु लौकिक, धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण विवेचना की सामाजिक विकास के नियमों को खोजने का प्रयास किया और इसके लिए इतिहास तथा यथार्थ वास्तविकता के तथ्यों का आश्रय लिया।

१६-१७वीं शतियों की नीदरलैंड की क्रांति ने गो योशियस और बेनेडिक्ट स्पिनोजा जैसे प्रगतिशील विचारकों को जन्म दिया, जिनके विचारों का आगे के बुर्जुआ राजनीतिक चिंतन पर बड़ा प्रभाव पड़ा।

नीदरलैंड की आरंभिक बुर्जुआ क्रांति का एक कारण सामंतवादी संबंधों का विघटन और सामंती श्रेणियों के विरुद्ध "निचले" तबकों के संघर्ष का बढ़ना थे। किंतु इस क्रांति को अभी सामंतवाद पर पूंजीवाद की विजय का आरंभ नहीं कहा जा सकता था। बुर्जुआजी के विचारधारा पोषकों के दृष्टिकोणों की परिपक्वता और आमूलता पूंजीवादी पद्धति और सामंतवादी व्यवस्था के विरोधों की उग्रता पर बुर्जुआजी की क्रांतिकारिता पर, जन आंदोलनों के पैमाने और क्रांति में जनसामान्य की सहभागिता पर निर्भर थी।

अपने सबसे पूर्ण रूप में पूंजीवादीकरण की प्रक्रिया १७वीं शती के इंगलैंड में व्यक्त हुई, जहां बुर्जुआ बन रहे भूस्वामी, जिनकी टेक्सटाइल उत्पादन के तीव्र विकास में रुचि थी, किसानों को उनकी काश्तों से बेदखल करके भूमि को भेड़ों के लिए चरागाहों में परिणत कर रहे थे। ऐसी भूमियों के इर्द-गिर्द बाड़ाबंदी कर दी जाती थी। १७वीं शती के इंग्लैंड में बुर्जुआ क्रांति की विजय ने देश में पूंजीवाद के तेजी से बढ़ने में निर्णायक भूमिका अदा की। कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि अपने महत्व की दृष्टि से की बुर्जुआ कांति "यूरोपीय पैमाने" की बुर्जुआ क्रांति थी।

इंग्लैंड की बुर्जुआ क्रांति की तैयारी तथा निष्पादन के दौरान और इसके बाद देश में जो पूंजीवादी विकास हुआ, उसके दौरान ऐसे राजनीतिक सिद्धांत प्रतिपादित किये गये, जो बुर्जुआ व्यवस्था के प्रतिष्ठापन के वैचारिक अस्त्र बने। इंगलैंड में विकसित सांविधानिक राजतंत्र तथा गणतंत्र के विचारों, सामाजिक संविदा तथा व्यक्तियों के अधिकारों की समानता के विचारों ने अन्य देशों के बुर्जुआ राजनीतिक चिंतन और यूरोप तथा अमरीका में बुर्जुआ क्रांतियों की तैयारी पर अपनी छाप छोड़ी।

इसी बीच बहुसंख्य युद्धों के जरिये इंगलैंड ने विशाल भूभागों पर कब्जा करके उन्हें अपने उपनिवेश बना लिया था और वहां अत्यंत शोषणकारी शासनों की स्थापना की थी। उपनिवेशों की जनता उपनिवेशवादियों का प्रतिरोध करती थी। पर ऐसा प्रतिरोध केवल अमरीका में ही सफल हो पाया। अमरीकी स्वाधीनता संग्राम का अंत अमरीका की कांग्रेस द्वारा ४ जुलाई, १७७६ को "स्वाधीनता की उद्घोषणा" नामक एक दस्तावेज स्वीकार किये जाने में हुआ।

अपनी बुर्जुआ संकीर्णता के बावजूद यह एक प्रगतिशील और क्रांतिकारी दस्तावेज था। इतिहास में पहली बार किसी बुर्जुआ प्रातिनिधिक संस्था ने जनता की सर्वोच्चता, सभी लोगों की अधिकार-समानता और निरंकुश शासन के उच्छेदन के जनता के अधिकार के सिद्धांत की उद्घोषणा की थी।

किंतु जनसामान्य के संघर्ष के परिणामस्वरूप प्राप्त स्वाधीनता फ़्लों का उपभोग मुख्य रूप से उत्तर के बड़े व्यापारी तथा औद्योगिक बुर्जुआजी और दक्षिण के दासस्वामी बागानमालिकों ने ही किया। बुर्जुआजी की तानाशाही हर तरह से सुदृढ़ करने और शक्तिशाली केंद्रीकृतात्मक सरकार बनाने की मांग पर टिके बड़े अमरीकी के राजनीतिक कार्यक्रम को सैद्धांतिक आधार इस बुर्जुआजी के हैमिल्टन मेडोसन, जे, आदि विचारधारापोषकों की रचनाओं और भाषणों में प्राप्त हुआ। जहां तक छोटे बुर्जुआजी, स्वतंत्र फार्म और विनिर्माण उद्यमों के मजदूरों के हितों को व्यक्त करनेवाली बुर्जुआज जनवादी राजनीतिक चिंतनधारा का संबंध है, तो उसका प्रतिनिधित्व टामस फरसन और टामस पेन करते थे।

तथापि बुर्जुआ राजनीतिक चिंतन अपने पराकाष्ठाबिंदु पर १८वी शती के उत्तरार्ध के कतिपूर्व और अतिकालीन फ्रांस में पहुंचा।

१८वी के अंत तक फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति के लिए आधार पूरी तरह बन चुका था। सामंती निरंकुशतावादी व्यवस्था का मुख्य अवलंब विशेषाधिकारभोगी पोप-पादरी तथा अभिजात श्रेणियां थीं। तीसरी श्रेणी को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे, यद्यपि देश की जनसंख्या में उसका हिस्सा कोई २२ प्रतिशत था। इस श्रेणी में सम्मिलित सभी वर्ग और वर्गीय समूह किसी न किसी सीमा तक सामंती निरंकुश तांत्रिक व्यवस्था द्वारा उत्पीड़न का शिकार बने हुए थे और अत: उसके खात्मे में गहन रुचि रखते थे।

फांसीसी क्रांति का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व था। उसने सामंत बाद पर निर्णायक आपात किया और फ्रांस ही नहीं, सारे यूरोप के भाग्य में प्रगतिशील भूमिका अदा की। किंतु यह क्रांति बुर्जुआ कांति थी और इससे प्रत्यक्ष लाभ बुर्जुआजी को ही पहुंचा।

तथापि बुर्जुआडी, जिसने क्रांति की उद्घोषणा की थी, अपने स्वार्थों को छिपाकर जनता की ओर से संघर्ष कर रहा था। फ्रांसीसी क्रांति की विचारधारा ने भी इस अंतर्विरोध को प्रतिबिंबित किया।

फांसीसी प्रबोधकों के प्रसंग में फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है, "जिन महान लोगों ने आसन्न क्रांति के लिए लोगों में जागृति पैदा की थी, उन्होंने स्वयं चरम क्रांतिकारिता का परिचय दिया। वे किसी भी प्रकार की सत्ताओं को नहीं मानते थे। धर्म प्रकृति की समझ, समाज और राज्यव्यवस्था कुछ को बुद्धि की अदालत के कटघरे में खड़ा होना था और या तो अपने अस्तित्व का करना था या फिर उसके विलोप के लिए तैयार रहना था तथा राज्य के सभी पहले से चले आ रहे रूपों को अतर्कसंगत पाय गया और पुराने कबाड़ की तरह फेंक दिया गया।

एंगेल्स ने यह भी कहा कि तर्कबुद्धि का साम्राज्य और कुछ नहीं बुर्जुआजी का आदर्शीकृत राज्य ही था शाश्वत न्याय को बुर्जुआ न्याय का पर्याय बना दिया गया था, बुर्जुआ संपत्ति के अधिकार को मनुष् का सबसे बुनियादी अधिकार बताया गया और रूसो की " सामाजिक संविदा" व्यवहार में बुर्जुआ जनवादी गणतंत्र ही सिद्ध हुई।

यद्यपि अभिजात वर्ग के विरुद्ध संघर्ष में बुर्जुआजी एक निश्चित सीमा तक उस युग के मेहनतकश वर्गों का भी प्रवक्ता होने का दाव कर सकता था, बुर्जुआ आदोलनों के काल में सभी देशों में उत्पीडित जनसामान्य के पृथक् आंदोलन भी पैदा हुए, जिन्हें हम सर्वहारा आंदोलन का पूर्वगामी कह सकते हैं।

धर्मसुधार युग में ऐनावैप्टिस्टों तथा टी० म्यूजे का आंदोलन, इंग्लैंड की क्रांति के दिनों का लैवलर आंदोलन और फ्रांसीसी क्रांति के काल का बाब्यूफ आंदोलन इसी श्रेणी में आते हैं। इन आंदोलनों को वैचारिक अभिव्यक्ति यूटोपियाई समाजवाद = प्रतिनिधि टामस मोर ( १६वीं शती ) तथा तोमासो कांपानेल्ला (१६ १७वी शती ) की सैद्धांतिक रचनाओं में और १८वीं शती में मैब्ली तथा मोरेली के कम्युनिस्ट सिद्धांतों में मिली, जिनमें जायमान बुर्जु व्यवस्था की घोर आलोचना की गयी थी।

१७-१८वीं शतियों में जर्मनी में राजनीतिक तथा विधिक चिंतन का विकास उस युग के महान प्रबोधकों तथा जनवादियों द्वारा किया गया। राज्य और विधि संबंधी विज्ञान में जर्मन दर्शन के दिग्गज हेर्डेर कांट, फ़िल्ते और हेगेल का अमूल्य योगदान है। किंतु जर्मनी में बुर्जुआजी एकताबद्ध, कृतसंकल्प वर्ग के रूप में सामने नहीं आया। वह और कायर और सामंतों का ताबेदार था। जर्मन बुर्जुआजी की नपुंसकता और दुर्बलत उसकी विचारधारा में प्रकट हुई। इसलिए जो बुर्जुआ क्रांतिकारी विचार और सिद्धांत जर्मनी पहुंचे उन्हें न केवल जर्मनी बुर्जुआजी के विचारधारापोषकों की ओर से खुला और पूर्ण समर्थन प्राप्त नहीं हुआ, अपितु उनमें से कुछ की ओर से विरोध का भी सामना करना पड़ा।

१८वीं शती के उत्तरार्ध से पूजीवाद शनैः शनै रूस में भी फैलने लगा और इसके साथ वहा सामंतवादविरोधी आंदोलन तथा राजनीतिक सिद्धांत पैदा हुए।

१८वीं शती के सात दशक में रूस के अग्रणी सामाजिक चिंतक, पश्चिमी देशों के चिंतकों की भांति उन विचारों और संकल्पनाओं का आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन करने लगे, जो सामंती-भूदासीय संबंधों की नींव पर विकसित हुए थे। वस्तुपरक रूप से इसका कारण एक ओर तो पूंजीवाद के प्रादुर्भाव और सामंतवादी आधार के रूपांतरण की प्रक्रिया थी और दूसरी ओर, भूदास किसानों के आसन्न विद्रोह का खतरा और पुगाचेव के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर छिड़ा किसान युद्ध था। रूस में प्रगतिशील चिंतन के विकास पर फ्रांसीसी प्रबोधकों और फांसीसी क्रांति का भी बड़ा प्रभाव पड़ा।

१८वीं शती के सातवें दशक के आरंभ में रूस के सत्ता वर्ग के सर्वाधिक दूरदर्शी प्रतिनिधियों ने भूदास प्रथा को कुछ नरम बनाने की योजनाएं पेश कीं, ताकि किसानों में असंतोष और न फैले और साथ ही कृषि उत्पादन भी बढ़ सके। मगर इन योजनाओं की जानकारी कुछेक ऊपरी सत्तासीन लोगों तक ही सीमित रही।

रूसी अभिजात वर्ग का प्रतिक्रियावादी भारी बहुमत अपने कम्मी किसानों पर जागीरदारों की निरंकुश सत्ता पर आधारित भूदास प्रभा की अटलता तथा अपरिवर्तनीयता का घोर समर्थक था। खानदानी अभिजातों के विचारधारापोषक और १८वीं शती के सुप्रसिद्ध इतिहासकार म० इनेबतोय ने अपनी रचना 'रूस में किसानों तथा सेवकों को स्वतंत्रता देने अथवा जागीरों को संपत्ति बनाने की कठिनाइयों के बारे में स्फुट विचार' में इस बात पर जोर दिया कि किसान समस्या के समाधान की योजनाओं को गुप्त रखना आवश्यक है, ताकि विद्रोही विचारों को पैदा होने का मौका न मिल सके।

उधर, दूसरी ओर, प्रगतिशील रूसी प्रबोधक विधिवत अ. पोलेनोव मास्को विश्वविद्यालय के विधि प्राचार्य स. देस्नीत्स्की तथा इ. त्रेत्याकोव, दार्शनिक मा. कोज़ेल्स्की तथा द. अनीचकोव नवीन विधि-संहिता निर्माण आयोग के प्रगतिशील सदस्य, "प्राकृतिक पत्रिकाओं के प्रकाशक न. नोविकोव और अन्य सामाजिक विकृतियों तथा विद्यमान सामाजिक व्यवस्था की अन्यायपूर्णता के कारणों को उजागर करने के प्रयास कर रहे थे। उनमें से अधिकांश विधि" सिद्धांत के समर्थक थे और दासता को आरंभिक सामाजिक संविदा" के उल्लंघन का परिणाम मानते थे। उनके मत में, सामाजिक समृद्धि की प्राप्ति के लिए विवेकसंगत तथा न्यायपूर्ण कानून बनाना ही पर्याप्त था। नोविकोव, पोलेनोव, स्नीत्स्की आदि ने देश में  भूदास प्रथा की साहसिक तथा कटु निंदा तो की, मगर उनके निष्कर्ष तथा सुझाव भूदास प्रथा के पूर्ण नहीं, अपितु आंशिक उन्मूलन तक ही सीमित रहे। उनका कार्यक्रम किसानों के दायित्वों का कानून द्वारा निर्धारण किये जाने और उन्हें चल संपत्ति रखने तथा अचल संपत्ति विरासत में पाने का अधिकार दिये जाने की मांग से आगे न बढ़ सका। अधिकांश पश्चिमी यूरोपीय प्रबोधकों की भांति ये रूसी प्रबोधक भी "प्रबुद्ध राजा" विषयक भ्रम पाले हुए थे।

फिर भी भूदास प्रथा और सरकार की नीति की यह आलोचना रूस में क्रांतिकारी विचारधारा के उदय में सहायक हुई, जिसके एक महान प्रवक्ता अ० रदीश्चेव थे। रदीश्चेव पहले रूसी क्रांतिकारी विचारक और दिसंबरवादियों के प्रत्यक्ष पूर्वगामी थे।

रदीश्चेव की पुस्तक 'पीटर्सबर्ग से मास्को तक की यात्रा' रूसी क्रांतिकारी साहित्य की प्रथम कृति है।

रदीश्चेव मानते थे कि जनता को स्वेच्छाचारी शासन का तख्ता उलटने और दासता का अंत करने का अधिकार है। उन्होंने १८वीं शती के प्रबोधकों के बीच बहुप्रचलित इस धारणा का खंडन किया कि मनुष्य का एकाकीपन ही उसकी “प्राकृतिक अवस्था" है, उन्होंने मनुष्य को सामाजिक प्राणी बताया और इस मर्म को समझा कि जनता ही इतिहास की मुख्य तथा निर्णायक शक्ति है। 

सामंतवादी व्यवस्था का संकट स्थानिक नहीं, सार्विक परिघटना था। केवल पश्चिमी यूरोप और ही उससे ग्रस्त न थे। 17-18वीं शतियों में मुस्लिम देश, भारत, जापान और चीन भी उस में आये थे। सामंतवाद की सामाजिक तथा आध्यात्मिक बुनियादी पर आपात तथा धार्मिक पूर्वाग्रहों को ध्वस्त करनेवाले और बुद्धि की कसौटी पर अंधविश्वासों एवं जड़मूत्रों की जांच तथा मानव व्यक्तित्व के श्रेण्योपरि मूल्यों की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले सामाजिक आंदोलन इन देशों में भी पैदा हुए। स्वतंत्रता की अनुभूति तथा उसके शुद्ध मानविक कानूनों को सामंती नैतिकता के बाध्यकारी नियमों के मुकाबले में रखा गया, जो व्यक्ति के नैतिक स्तर को सहारा देने के बजाय उल्टे उसका निर्लज्ज दमन ही करते थे।

विभिन्न सामंतवादी राजनीतिक विधिक संस्थाओं की कटु आलोचना की गयी। सरकारी अधिकारियों द्वारा अपने पदों के दुरुपयोग को घृणित ठहराया गया। पूर्व के देशों में ऐसे विचारक पैदा हुए, जो सभी लोगों की समानता, जिसमें राज्य के नागरिकों के नाते समानता भी सम्मिलित है, का सिद्धांत प्रतिपादित करते थे। उनमें से सबसे निर्भीक और अडिग चिंतकों ने राजाओं की परम सत्ता पर अंकुश लगाने और प्रभुसत्ता का धारक जनता को स्वीकार करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पश्चिम और पूर्व, दोनों ही में सामंत बाद के अस्त और बुर्जुआ परिपाटियों के उदय के साथ समाज के आत्मिक तथा वैचारिक जीवन में जो प्रक्रियाएं घट रही थीं, वे अपने स्थूल लक्षणों की दृष्टि से लगभग एक ही जैसी थीं।

(तत्कालीन सोवियत संघ के प्रगति प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक राजनीतिक सिद्धांतों का इतिहासके भाग-2 से साभार )

संदर्भ - K. Marx, F. Engels, Collected Works, vol. 8, Moscow, Progress Publishers, 1977, p. 161.

K. Marx, F. Engels, Selected Works in Three Volume -1.3, Moscow, Progress Publishers, 1977, p. 115-16. ** F. Engels, Anti-Dühring, Moscow, Progress Publisher

5. p. 24.

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