और कितने टोबा टेकसिंह

जसबीर चावला जी की यह कविता हस्तक्षेप पर मूलतः 18 जनवरी 2015 को प्रकाशित हुई थी। सआदत हसन मंटो के जन्म दिवस 11 मई पर पुनर्प्रकाशन ज़मीन बँट चुकी मुल्क का बँटवारा पूरा हुआ मंटो तुमने लिखा ‘उधर खरदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान दरमियान में ज़मीन …
 | 
और कितने टोबा टेकसिंह

जसबीर चावला जी की यह कविता हस्तक्षेप पर मूलतः 18 जनवरी 2015 को प्रकाशित हुई थी। सआदत हसन मंटो के जन्म दिवस 11 मई पर पुनर्प्रकाशन

 

ज़मीन बँट चुकी

मुल्क का बँटवारा पूरा हुआ

मंटो तुमने लिखा

‘उधर खरदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था

इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान

दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था

टोबा टेक सिंह पड़ा था’

 

टोबा टेकसिंह याने बिशन सिंह

गाँव टोबा टेकसिंह का पागल किसान

पड़ा है आज भी वहीं

मुल्कों के दरमियाँ

नो मेन्स लेंड

ढूँढ रहा अपनी पहचान

 

सरहदों पार

देश और बँटे

सूबेदारों के इलाके

अपनी सरहदें अपने कानून

मजहबी सियासी बँटवारे

ढेरों नो मेन्स लेंड

कई और टोबा टेकसिंह

ढूँढ रहे अपनी-अपनी बेटियां

सब मर्दों की नज़र चढ़ी

रूपकौर आयशा

माई मुख्तार निर्भया

अपनी ज़मीन अपना आसमान

अजीबोग़रीब आवाज़ में बड़बडा रहे सब

‘औ पड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी लालटेन’

‘हिंदुस्तान पाकिस्तान दुर फिटे मुंह’

 

‘टोबा’ तो सचमुच पागल था

ये राजनैतिक दिमाग़ी मरीज़

बाँहें उठा रहे

गड्डमड्ड आवाज़ों में चीखते

लहरा रहे परचम

मुल्क भर में चिल्ला रहे

‘औ पड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दी दाल आफ नफरत फ़िरक़ापरस्ती’

 

( टोबा टेकसिंह : साहित्य को गौरवान्वित करने वाली सआदत हसन मंटो की विशेष कहानी )

।।जसबीर चावला।।

नोट्स –

“Toba Tek Singh” is a short story written by Saadat Hasan Manto and published in 1955. It follows inmates in a Lahore asylum, some of whom are to be transferred to India following the 1947 Partition. The story is a “powerful satire” on the relationship between India and Pakistan. Wikipedia

Saadat Hasan Manto was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 collections of short stories, a novel, five series of radio plays, three collections of essays and two collections of personal sketches.

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription