कल तक जो संघी ये चिल्लाते थे कि ‘भारत कोई धर्मशाला नहीं’ वे देश के संसाधनों और नौकरियों में बाहरी लोगों की ‘घुसपैठ’ को कैसे उचित बताएंगे ?

मिथ्या प्रचार की कार्यशालायें ! स्थान-स्थान पर बीजेपी (bjp) अपने कार्यकर्ताओं की कार्यशालायें आयोजित कर रही है जिसे मीडिया कवरेज मैनेज किया गया है। इन कार्यशालाओं की रिपोर्टिंग को देखें, तो एक चीज साफ है कि वे अपने नेताओं कार्यकर्ताओं को सीएए और एनआरसी पर उठ रहे सवालों का जबाब देने लायक कोई मसाला नहीं …
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कल तक जो संघी ये चिल्लाते थे कि ‘भारत कोई धर्मशाला नहीं’ वे देश के संसाधनों और नौकरियों में बाहरी लोगों की ‘घुसपैठ’ को कैसे उचित बताएंगे ?

मिथ्या प्रचार की कार्यशालायें !

स्थान-स्थान पर बीजेपी (bjp) अपने कार्यकर्ताओं की कार्यशालायें आयोजित कर रही है जिसे मीडिया कवरेज मैनेज किया गया है। इन कार्यशालाओं की रिपोर्टिंग को देखें, तो एक चीज साफ है कि वे अपने नेताओं कार्यकर्ताओं को सीएए और एनआरसी पर उठ रहे सवालों का जबाब देने लायक कोई मसाला नहीं दे रहे, बल्कि उन्हें प्रशिक्षित कर रहे हैं कि कैसे मिथ्या प्रचार किया जाए। हालांकि एनआरसी पर रिपोर्टिंग्स में हद दर्जे चुप्पी है जिसको लेकर पीएम, एचएम और प्रेजिडेंट के बयानों के कंट्राडिक्शन्स से पीएम झूठे साबित हो चुके हैं और एचएम नए झूठ गढ़ने लगे हैं।

सीएए पर प्रचारित किया जा रहा है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भ्रम फैला रही हैं कि ये मुसलमानों के खिलाफ है, जबकि इन पार्टियों में से किसी का ऐसा स्टैंड नहीं रहा है। वे किसी को यह नहीं बता रहे कि पहले के कानून में ऐसी कौन सी बाधा थी, जो उन्हें दुनिया के किसी भी व्यक्ति को नागरिकता देने से रोक रही थी ?

जाहिर है सिर्फ धार्मिक आधार पर भेदभाव को मान्यता देने वाला संशोधन लाकर उन्हें बहुसंख्यक हिन्दू तुष्टिकरण और मुस्लिम अल्पसंख्यक तिरस्कार पर राष्ट्रव्यापी डिबेट करानी थी।

दूसरे वे यह भी नहीं बताते कि श्रीलंका के तमिल हिन्दुओं और तिब्बत के बौद्धों को क्यों छोड़ा गया जबकि उनके लिए भी ‘हिन्दुओं का होमलैंड’ कोई और नहीं ? स्पष्ट है कि श्रीलंका और चीन के जिक्र से साम्प्रदायिक गोलबंदी की दलील नहीं मिलती। वे यह भी नहीं बताते कि आसाम में हिन्दू ही सर्वाधिक विरोध क्यों कर रहे हैं ? क्यों असम मूल के लोग अन्य कारणों से इसके खिलाफ हैं ? क्योंकि नार्थ ईस्ट की प्रार्थमिकताओं से मैदानों के संघियों का सरोकार नहीं या फिर उनकी चिंताएं मैदानों में साम्प्रदायिक गोलबंदी के काम की नहीं हैं ?

इन सब दलीलों के बीच वे यह भी नहीं बताते कि कल तक जो संघी ये चिल्लाते थे कि ‘भारत कोई धर्मशाला नहीं’ वे देश के संसाधनों और नौकरियों में बाहरी लोगों की ‘घुसपैठ’ को कैसे उचित बताएंगे ?

एक और जरूरी बात ये कि मलाला यूसुफजई हो या तस्लीमा नसरीन या पाक के वे मुसलमान जो प्रगतिशील हैं और ईशनिंदा कानून से पीड़ित हुए हैं, या बलूच अथवा सिंध के बागी हैं जिनको पीएम मोदी ने लालकिले से पुचकारा था, उन्हें आप क्यों निराश करेंगे ?

बहरहाल दिलचस्प बात ये है कि सीएए के खिलाफ देशभर में संविधानप्रेमियों के आंदोलनों में हिन्दू और मुसलमान दोनों की समान भागीदारी से परेशान सरकार ये प्रचारित करना चाह रही है गोया मुसलमान ही विरोध में हों और विपक्ष उसे हवा दे रहा हो। विपक्ष ने जो कभी नहीं कहा उसे सत्ता पक्ष कह रहा है कि विपक्ष ये कह रहा है। यह वही अंदाज है जिसमें चार्वाक के लिए निंदा करते हुए कहा गया कि ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत’ चार्वाक दर्शन है।

मधुवन दत्त चतुर्वेदी

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