मंदिरों में दलित पुजारी : ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में एक युगांतरकारी फैसला!

Dalit Priests in Temples: An epoch-making decision towards the end of Brahmanshahi! धर्म प्रधान देश भारत में धार्मिक सेक्टर से जुड़ी घटनाएँ प्रायः ही लोगों को उद्वेलित करती हैं. विगत सप्ताह से इस क्षेत्र से जुड़ी दो घटनायें चर्चा का खास विषय बनी हुई हैं. इनमें पहली घटना उस राम मंदिर निर्माण से जुड़ी है, …
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मंदिरों में दलित पुजारी : ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में एक युगांतरकारी फैसला!

Dalit Priests in Temples: An epoch-making decision towards the end of Brahmanshahi!

धर्म प्रधान देश भारत में धार्मिक सेक्टर से जुड़ी घटनाएँ प्रायः ही लोगों को उद्वेलित करती हैं. विगत सप्ताह से इस क्षेत्र से जुड़ी दो घटनायें चर्चा का खास विषय बनी हुई हैं. इनमें पहली घटना उस राम मंदिर निर्माण से जुड़ी है, जिसके पक्ष में जन-भावना जगाने के लिए हिंदूवादी पार्टी भाजपा के एल के आडवाणी ने 25 सितम्बर,1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ-यात्रा की शुरुआत की. उनकी उस रथ यात्रा से जो जन-भावना भड़की उसके फलस्वरूप देश की अपार जन और धन की हानि के बाद भाजपा एकाधिक बार सत्ता में आई, जिसके जोर से वह 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का शिलान्यास कराने में सफल हो गयी. परवर्तीकाल में राम के भव्य मंदिर निर्माण के साथ ही दर्शन के लिए आने वाले यात्रियों को बेहतर सुविधां देने के लिए और भूमि खरीदी गयी. मार्च 2021 में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा खरीदी गयी उस भूमि को लेकर अब एक बड़ा घोटाला सामने आया है. आरोप यह है कि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 18 मार्च, 2021 को जिस भूमि का 18.50 करोड़ में रजिस्ट्री कराया, उसका रजिस्ट्री से 10 मिनट पहले सिर्फ दो करोड़ में बैनामा कराया गया था. इससे पूरा राष्ट्र सन्न है क्योंकि इसका संपर्क कोटि-कोटि राम भक्तो की भावना से जुड़े राममंदिर से है. यह भूमि घोटाला जनता को स्पर्श कर चुका है इसलिए सोशल मीडिया पर,’ अभी तो सिर्फ जमीन खरीद का कमीशन गया है: पत्थर-रेत- सीमेंट- ईंट और सरिया का कमीशन बाकी है’ जैसी बातें खूब वायरल हो रही हैं. खैर!इसे लेकर आरोप- प्रत्यारोप का अंतहीन सिलसिला शुरू हो चुका है.

Tamil Nadu’s Stalin government announced the appointment of 200 non-Brahmin and women priests in 100 days

बहरहाल मंदिर निर्माण के लिए भूमि खरीद घोटाले के साथ ही तमिलनाडु की स्टालिन सरकार द्वारा 100 दिन में 200 गैर-ब्राह्मण व महिला पुजारियों के नियुक्ति की घोषणा से भी पूरा राष्ट्र विस्मित है. इसके लिए जल्द ही तमिलनाडु में 100 दिन का ‘शैव अर्चक कोर्स’ शुरू होगा, जिसे करने के बाद कोई भी पुजारी बन सकता है. नियुक्तियां तमिलनाडु हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल इंडोमेंट डिपार्टमेंट के अधीन आने वाले 36,000 मंदिरों में होगी.

स्टालिन सरकार के इस फैसले को भाजपा की ओर से हिन्दू विरोधी फैसला बताते हुए कहा गया कि द्रमुक पार्टी की नींव ही हिन्दू विरोध के मूल विचार पर पड़ी है. उसने तमिलनाडु के धर्मार्थ मामलों के मंत्री पीके शेखर बाबू के इस फैसले का भी कड़ा विरोध किया है कि मंत्रालय के अधीन आने वाले मंदिरों में पूजा तमिल में होगी.

बहरहाल हिंदुत्ववादी भाजपा और ब्राह्मणों की ओर से स्टालिन सरकार के गैर-ब्राह्मणों और महिलाओं को पुजारी बनाने के ऐतिहासिक फैसले का विरोध कम होते जा रहा है, लेकिन इसे लेकर 24 कैरेट आंबेडकरवादियों को जो सदमा लगा है, उससे वे उबरते नहीं दिख रहे हैं.

वास्तव में भारी हैरानी की बात है कि तमिलनाडु के मंदिरों में गैर-ब्राह्मणों और महिलाओं की नियुक्ति के सरकारी फरमान को लेकर सर्वाधिक आपत्ति ब्राह्मणों में नहीं, उन दलित – बहुजन बुद्धिजीवियों में है, जिनके समाज के लिए सदियों से देवालयों के द्वार बंद रहे हैं. इन समुदायों के बुद्धिजीवी स्टालिन सरकार के फैसले से दलित- बहुजन को हतोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया पर तरह-तरह की युक्ति खड़ी करते हुए प्रचारित कर हैं कि बाबा साहेब और पेरियार ने जिस अन्धविश्वास, पाखंडवाद और ब्राह्मणवाद को ख़त्म करने में पूरी जिंदगी लगा दी, स्टालिन का फैसला उस पर पानी फेर देगा. इस फैसले से मनुवाद को बढ़ावा मिलेगा.इनके इस अभियान में गैर-दलित बहुजनों के साथ प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का भी खासा सहयोग मिल रहा है.

बहरहाल गैर-ब्राह्मण जातियों और महिलाओं की मंदिरों के पुजारी के रूप में नियुक्ति के फैसले को हतोत्साहित करने जुटे बहुजन और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने बता दिया है कि वे क्यों अब तक भारत में सामाजिक परिवर्तन तथा वर्ण-व्यवस्था के वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़े और आधी आबादी के सशक्तिकरण में व्यर्थ रहे हैं. वे अपनी बौद्धिक दारिद्र्ता के चलते यह जान ही नहीं पाए कि दुनिया के दूसरे वंचित समुदाय अश्वेतों, महिलाओं इत्यादि की भांति ही भारत के वंचितों की दुर्दशा व अ-शक्तिकरण का एकमेव कारण शासकों द्वारा उनका शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) बहिष्कार है और बिना शक्ति के समस्त स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी सुलभ कराये इनका मुकम्मल सशक्तिकरण हो ही नहीं सकता. वे यह समझने में व्यर्थ रहे हैं कि समाज के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे से ही आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की सृष्टि होती है. अगर इसकी थोड़ी उपलब्धि किया भी तो वे धर्म को शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत समझने में पूरी तरह व्यर्थ रहे.

धर्म को विषमता का बड़ा कारक न मानने के कारण ही अधिकांश संगठन वंचितों को मात्र आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में हिस्सेदारी दिलाने तक अपनी गतिविधियों को महदूद रखे.

शक्ति के स्रोत के रूप में धर्म की उपेक्षा दुनिया के तमाम चिन्तक, जिनमें मार्क्स भी रहे, ही किये और आज भी किये जा रहे हैं. यह एकमात्र बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर थे जिन्होंने जोर गले से कहा था कि धर्म भी शक्ति का एक स्रोत होता है और शक्ति के रूप में ‘धर्म की शक्ति’ का महत्त्व ‘आर्थिक शक्ति’ से ज्यादा नहीं तो किसी प्रकार कम भी नहीं है. प्रमाण देते हुए उन्होंने बताया था कि प्राचीन रोमन गणराज्य में प्लेबियन बहुसंख्य होकर भी अगर अपने अधिकारों से वंचित रहे तो इसलिए कि धार्मिक शक्ति डेल्फी के मंदिर के पुजारी के पास होती थी, जो शासक पैट्रीशियन जाति का होता था. भारत में धार्मिक शक्ति की महत्ता प्रमाणित करते हुए उन्होंने कहा था,’क्यों बड़े से बड़े लोग साधु-फकीरों के पैर छूते हैं ? क्या कारण है कि भारत के लाखों लोग अंगूठी-छल्ला बेचकर काशी व मक्का जाते हैं? भारत का तो इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां पुरोहित का शासन, मजिस्ट्रेट के शासन से बढ़कर है.’

बहरहाल जो धर्म शक्ति के स्रोत के रूप में आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, सारी दुनिया में ही उसका लाभ पुरोहित वर्ग जरुर उठाता रहा है, किन्तु एक सामाजिक समूह के रूप इसका लाभार्थी वर्ग केवल भारत में ही विकसित हुआ. शेष धर्मों में पुरोहितों को इसका लाभ व्यक्तिगत रूप से मिलता रहा. कारण, हिन्दू धर्म को छोड़कर बाकी धर्मों में पुरोहित बनने के दरवाजे सभी समूहों के लिए मुक्त रहे, सिवाय उनकी महिलाओं के. हालांकि 1886 भागों में बंटे ब्राह्मणों में सभी को पौरोहित्य का अधिकार कभी नहीं रहा. पर, चूँकि भारत के विभिन्न अंचलों में फैले छोटे-बड़े असंख्य मंदिरों के पुजारी वहां के कुछ खास ब्राह्मण ही हो सकते थे, इसलिए असंख्य भागों में बंटे ब्राह्मण पुरोहित वर्ग में तब्दील हो गए. इससे जिन ब्राह्मणों को पौरोहित्य का अधिकार नहीं रहा, वे भी आम लोगों में पुरोहित ब्राह्मणों के समान ही सम्मान पाने लगे. पौरोहित्य के अधिकार ने ही ब्राहमणों को ‘भूदेव’ के आसन पर बिठा दिया: हिन्दू समाज में सर्वोच्च बना दिया.

इस अधिकार से वंचित होने के कारण ही क्षत्रिय ‘जन-अरण्य का सिंह’ होकर भी दस वर्ष तक के बालक ब्राह्मण को पिता समान सम्मान देने के लिए विवश रहे. इस क्षेत्र का अनाधिकारी होने के नाते ही सदियों से भारतीय नारी हर जुल्म सहते हुए पति के चरणों में, पति चाहे लम्पट व कुष्ठ रोगी ही क्यों हो, स्वर्ग तलाशने के लिए ही अभिशप्त रही. वैसे तो पौरोहित्य के अधिकार से वंचित रहने के कारण तमाम अब्राह्मण जातियों की हैसियत ब्राह्मणों के समक्ष निहायत ही तुच्छ रही, किन्तु सर्वाधिक बदतर स्थिति दलितों की हुई. पुरोहित बनना तो दूर उन्हें मंदिरों में घुसकर ईश्वर के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करने तक का अधिकार नहीं रहा.

अगर ब्राह्मणों की भांति दलितों को भी अबाध रूप से मंदिरों में प्रवेश और पौरोहित्य का अधिकार रहता तब क्या वे मानवेतर प्राणी में तब्दील होते? क्या तब भी हिन्दू उनके साथ अस्पृश्यता मूलक व्यवहार करते?

सच तो यह है कि धार्मिक सेक्टर से सम्पूर्ण बहिष्कार ही दलितों के प्रति अस्पृश्यतामूलक व्यवहार का प्रधान कारण है. हिन्दू सोचते हैं जब दलित देवालयों से ही अछूत के रूप में बहिष्कृत हैं तो हम उनसे सछूत जैसे व्यवहार क्यों करें!

बहरहाल कल्पना किया जाय कोई चमत्कार घटित हो जाता है और समस्त आर्थिक गतिविधियों, राजनीति की संस्थाओं तथा ज्ञान के क्षेत्र मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रातिशूद्र और उनकी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिल जाती है. पर, अगर पौरोहित्य पर ब्राह्मणों का एकाधिकार पूर्ववत रहता है, क्या हिन्दू समाज में समता आ पायेगी? हरगिज नहीं !

हिन्दू समाज को समतावादी बनाने के लिए पौरोहित्य का प्रजातंत्रीकरण करना ही होगा. अर्थात जिस समाज की जितनी संख्या है, उस अनुपात में पौरोहित्य में उसके स्त्री और पुरुषों को भागीदारी सुनिश्चित करनी ही होगी. अगर ऐसा नहीं किया गया तो तमाम तरह की बराबरी हासिल करने के बादजूद तमाम गैर-ब्राह्मण जातियां ब्राह्मणों के कदमों में लोटती रहेगी. ऐसे में हर हाल में धार्मिक शक्ति का बंटवारा जरूरी है. अगर भारतीय समाज धार्मिक शक्ति के बंटवारे के लिए मन बनाता है तो इसमें डॉ. आंबेडकर का यह सुझाव काफी कारगर हो सकता है,जो उन्होंने अपनी बेहतरीन रचना ‘जाति का विनाश’ में सुझाया है.

‘हिन्दुओं के पुरोहिती पेशे को अच्छा हो कि समाप्त ही कर दिया जाय, लेकिन यह असम्भव प्रतीत होता है. अतः यह आवश्यक है कि इसे कमसे कम वंश-परम्परा से न रहने दिया जाय. कानून के द्वारा ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वही व्यक्ति पुरोहिताई कर सकेगा, जो राज्य द्वारा निर्धारित परीक्षा पास कर ले. गैर-सनदयाफ्ता पुरोहितों द्वारा कराये गए कर्मकांड क़ानून की दृष्टि में अमान्य होने चाहिए, और बिना लाइसेंस पुरोहिताई करना अपराध माना जाना चाहिए.

पुरोहित राज्य का कर्मचारी होना चाहिए और उस पर राज्य सरकार का अनुशासन लागू होना चाहिए.

आई.सी.एस.अधिकारियों की तरह पुरोहितों की संख्या भी राज्य द्वारा निर्धारित होनी चाहिए. भारतवर्ष में लगभग सभी व्यवसाय विनियर्मित हैं. डॉक्टरों, इंजीनियरों व वकीलों को अपना पेशा आरम्भ करने से पहले अपने विषय में दक्षता प्राप्त करनी पड़ती है. इन लोगों को अपने जीवन में न केवल देश के नागरिक व अन्य कानूनों के पाबंद रहना पड़ता है, वरन अपने विशिष्ट पेशे से सम्बंधित विशिष्ट नियम व नैतिकता का पालन भी करना पड़ता है. .. हिन्दुओं का पुरोहित वर्ग न किसी कानून की बंदिश में है न किसी नैतिकता में बंधा हुआ है. वह केवल अधिकार व सुविधाओं को पहचानता है, कर्तव्य शब्द की उसे कोई कल्पना ही नहीं है. यह एक ऐसा परजीवी कीड़ा है जिसे विधाता ने जनता का मानसिक और चारित्रिक शोषण करने के लिए पैदा किया है. अतः इस पुरोहित वर्ग को मेरे द्वारा सुझाई गयी नीति से कानून बनाकर नियंत्रित किये जाना आवश्यक है. कानून इस पेशे का द्वार सबके लिए खोलकर इसे प्रजातान्त्रिक रूप प्रदान कर देगा. ऐसे कानून से निश्चय ही ब्राह्मणशाही समाप्त हो जायेगी. इससे जातिवाद, जो ब्राह्मणवाद की उपज है, समाप्त करने में सहायता मिलेगी.’

बहरहाल स्वाधीन भारत में भी ब्राह्मणशाही से त्रस्त अ-ब्राह्मण जातियों के बुद्धिजीवियों ने डॉ. आंबेडकर से ब्राह्मणशाही के खात्मे का अचूक मन्त्र पाकर भी कभी ‘पौरोहित्य के पेशे के प्रजातांत्रिकरण’ की मांग नहीं उठाया. यह एक मात्र बहुजन लेखकों का संगठन ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’(बीडीएम) है जो 2007 से अपने स्थापना काल से ही पौरोहित्य में सामाजिक और लैंगिक प्रतिबिम्बन अर्थात पौरोहित्य के कार्य में ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय, वैश्य और शुद्रातिशूद्र समुदायों के पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाता रहा है.

चूँकि बीडीएम मानता है कि मानव जाति के दुखों का प्रधान कारण शक्ति के स्रोतों का लोगों के विभिन्न तबको और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारा है इसलिए धर्म को आर्थिक शक्ति के समतुल्य शक्ति का एक स्रोत मानते हुए यह पौरोहित्य जैसे बेहद लाभकारी व सम्मानजनक पेशे में गैर-ब्राह्मण स्त्री-पुरुषों के हिस्सेदारी की बात पुरजोर तरीके से उठाता रहा है. किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि बहुजन बुद्धिजीवियों ने इसमें कोई रूचि नहीं ली.

बहरहाल बहुजन बुद्दिजीवियों की अरुचि के बावजूद कुछेक सरकारों ने धार्मिक सेक्टर में विविधता लाने का निर्णय लिया. केरल में गैर- ब्राह्मणों को हिस्सेदारी दी गयी है. 2019 में आंध्र प्रदेश की जगन मोहन रेड्डी सरकार ने मंदिरों के ट्रस्टों में गैर-ब्राह्मणों और महिलाओं को प्रतिनिधित्व प्रदान कर विविधता लाने का निर्णय लिया. किन्तु तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने गैर- ब्राह्मणों और महिलाओं को पौरोहित्य में हिस्सेदारी प्रदान करने का जो साहसिक फैसला किया, वह विशुद्ध युगांतरकारी है. इससे देश के लाखों मंदिरों में गैर-ब्राह्मणों और महिलाओं के पुजारी बनने का मार्ग प्रशस्त होगा, जो कालांतर ब्राह्मणशाही व ब्राह्मणों की सर्वोच्चता के खात्मे का सबब बनेगा.

एच.एल.दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.) 

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