किसानों के “मन की बात” भी तो सुनिये, सरकार !

#किसान_अब_दिल्ली_फतह_करेगा यूं ही हमेशा उलझती रही है, ज़ुल्म से खल्क, न उनकी रस्म नयी है, न अपनी रीत नयी, यूं ही हमेशा, खिलाये हैं हमने आग में फूल, न उनकी हार नयी है, न अपनी जीत नयी !! मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की यह कालजयी पंक्तियां, आज भी प्रासंगिक हैं और कभी भी …
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किसानों के “मन की बात” भी तो सुनिये, सरकार !

#किसान_अब_दिल्ली_फतह_करेगा

यूं ही हमेशा उलझती रही है,

ज़ुल्म से खल्क,

न उनकी रस्म नयी है,

न अपनी रीत नयी,

यूं ही हमेशा, खिलाये हैं हमने

आग में फूल,

न उनकी हार नयी है,

न अपनी जीत नयी !!

मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की यह कालजयी पंक्तियां, आज भी प्रासंगिक हैं और कभी भी कालबाधित नहीं होंगी।

#IamWithFarmers

किसानों का एक मार्च कुछ सालों पहले मुंबई में भी हुआ था। नासिक से पैदल चल कर किसानों का हुजूम अपनी बात कहने मुम्बई शहर में गया था। सरकार तब भाजपा शिवसेना की थी। मुख्यमंत्री थे देवेंद्र फडणवीस। जब यह मार्च शांतिपूर्ण तरह से अपनी बात कहने के लिये मुम्बई की सीमा में पहुंचा तो मुम्बई ने उनका स्वागत किया। उन्हें खाना पीना उपलब्ध कराया, उन्हें देशद्रोही नहीं कहा। उनकी बात सुनी। कुछ न कुछ उन बातों पर गौर करने के आश्वासन दिए। यह बात अलग है कि जब तक यह हुजूम रहा, सरकार आश्वासन देती रही।

हम सबने पैदल चले हुए कटे-फटे तलवों की फ़ोटो देखी थी।

यह आंदोलन (Farmers Protest) किसी कृषि कानून के खिलाफ नहीं था। यह आंदोलन था, किसानों की अनेक समस्याओं के बारे में, जिसमें, एमएसपी की बात थी, बिचौलियों से मुक्ति की बात थी, बिजली की बात थी, किसानों को दिए गए ऋण माफी की बात थी और बात थी, फसल बीमा में व्याप्त विसंगतियों की।

सरकार ने उन समस्याओं के बारे में बहुत कुछ नहीं किया, वचनं कि दरिद्रता ! कुछ कहा तो ! कुछ सुना तो ! पर आज जब तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ देश भर के किसान लामबंद हैं तो कहा जा रहा है कि वे भटकाये हुए लोग हैं। भड़काया गया है उन्हें। कुछ खालिस्तानी भी उन्हें कह रहे हैं। कुछ तो देशद्रोही के खिताब से भी नवाज़ रहे हैं।

#दिल्ली_चलो

सरकार एक तरफ तो कह रही है कि यह सभी कृषि कानून सरकार ने, किसानों के हित के लिये लागू किये हैं, पर इनसे किस प्रकार से किसानों का हित होगा, यह आज तक वह बता नहीं पा रही है।

सरकारी खरीद कम करते जाने, मंडी में कॉरपोरेट को घुसपैठ करा देने, जमाखोरों को जमाखोरी की छूट दे देने, बिजली सेक्टर में जनविरोधी कानून बना देने से, किसानों का कौन सा हित होगा, कम से कम यही सरकार बना दे !

आज जब किसानों के जत्थे दर जत्थे, दिल्ली सरकार को अपनी बात सुनाने के लिये शांतिपूर्ण ढंग से जा रहे हैं तो, उन को बैरिकेडिंग लगा कर रोका जा रहा है, पानी की तोपें चलाई जा रही हैं, सड़कें बंद कर दी जा रही हैं, और सरकार न तो उनकी बात सुन रही है और न सुना रही है।

छह साल से लगातार मन की बात सुनाने वाली सरकार,  कम से कम एक बार किसानों, मजदूरों, बेरोजगार युवाओं, और शोषित वंचितों की तो बात सुने। सरकार अपनी भी मुश्किलें बताएं, उनकी भी दिक्कतें समझे, और एक राह तो निकाले। पर यहां तो एक ऐसा माहौल बना दिया गया है कि, जो अपनी बात कहने के लिये खड़ा होगा, उसे देशद्रोही कहा जायेगा।

अगर यही स्थिति रही तो सरकार की नज़र में, लगभग सभी मुखर नागरिक, देशद्रोही ही समझ लिए जाएंगे।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।