बीडीएम का हस्ताक्षर अभियान : बहुजन-मुक्ति की अभिनव एक परिकल्पना

Signature Campaign of Bahujan Diversity Mission: An Innovative Vision of Bahujan Liberation कोई आयोजन, कोई घटना, कोई आह्वान महज कुछ घंटों या दिनों तक ही अपना प्रभाव छोड़कर शेष नहीं हो जाता। कुछ आयोजन तो जन मानस और विशेषकर बुद्धिजीवियों को इस कदर उद्वेलित कर देते हैं कि वे गंभीर विमर्श का मुद्दा तक बन …
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बीडीएम का हस्ताक्षर अभियान : बहुजन-मुक्ति की अभिनव एक परिकल्पना

Signature Campaign of Bahujan Diversity Mission: An Innovative Vision of Bahujan Liberation

कोई आयोजन, कोई घटना, कोई आह्वान महज कुछ घंटों या दिनों तक ही अपना प्रभाव छोड़कर शेष नहीं हो जाता। कुछ आयोजन तो जन मानस और विशेषकर बुद्धिजीवियों को इस कदर उद्वेलित कर देते हैं कि वे गंभीर विमर्श का मुद्दा तक बन जाते हैं।

15 मार्च, 2021 को दिल्ली के हिंदी भवन में आयोजित ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ का 15वां स्थापना दिवस समारोह ऐसा ही आयोजन था। यूँ तो इस आयोजन में एच.एल.दुसाध और चन्द्र भूषण सिंह यादव लिखित–सम्पादित पुस्तकों का विमोचन, डाइवर्सिटी मैन ऑफ़ द इयर-2020, डाइवर्सिटी वूमन ऑफ़ द इयर-2020 के ख़िताब से कुछ लोगों का नवाजन और ‘कोरोना काल में हुई क्षति की कैसे हो भरपाई!’

विषय पर चर्चा भी हुई; पर खास बात यह हुई कि बीडीएम के अध्यक्ष दुसाध जी ने बहुजन-मुक्ति की अभिनव कल्पना पेश की।

उन्होंने बताया कि शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाना एक सुफल दायक कार्यक्रम हो सकता है।

हस्ताक्षर अभियान की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने जिन अनुषंगी क्रियाशीलनों की चर्चा की, उनके स्पष्टीकरण के उद्देश्य से पलता कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अजय कुमार चौधरी ने दुसाध जी का एक साक्षात्कार लिया है। इस साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर स्वरूप जो बातें दुसाध जी ने बतायी हैं, उनसे बहुजन मुक्ति का सबसे कारगर आन्दोलन शुरू हो सकेगा। यह आन्दोलन साहित्यिक आन्दोलन जैसा होगा। इस आन्दोलन को वैचारिक ऊर्जा बीडीएम द्वारा प्रकाशित पुस्तकों, पम्फलेटों और स्टिकरों से मिलेगी।

साक्षात्कार को साहित्य और मीडिया में खूब महत्त्व मिल रहा है। यह संवाद और सम्प्रेषण की विधा है। जिज्ञासु पाठक और कुशल पत्रकार साक्षात्कारदाता से उनके विचारों और प्रतिक्रियाओं को बड़ी कुशलता से प्राप्त कर लेते हैं और अपने–अपने संचार माध्यमों के जरिये विशाल पाठक और श्रोता वर्ग तक पहुंचा देते हैं।

प्रोफ़ेसर अजय कुमार चौधरी ने बहुजन मुक्ति के लिए प्रस्तावित हस्ताक्षर अभियान से जुड़े हर पहलू को समझने–समझाने की गरज से प्रश्न किए हैं और दुसाध जी ने बड़ी उत्कटता से मुग्धकारी उत्तर दिए हैं। यह साक्षात्कार बहुजन मुक्ति के लिए अपेक्षित जागृति लानेवाला तथा क्रियाशीलता को गति देनेवाला है।

हस्तक्षेप डॉट कॉम’ वेव पत्रिका में प्रकाशित यह साक्षात्कार वंचित समूह के पाठकों और बुद्धिजीवियों के बीच गहन विमर्श का विषय बना हुआ है। सोशल एक्टिविस्ट इसे आर्थिक–सामाजिक गैरबराबरी दूर करने का मूलमंत्र मान रहे हैं।

बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस साक्षत्कार से एक वैचारिक आन्दोलन के सिद्धान्तकार के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। बिना अस्त्र शस्त्र के परिवर्तनकामी विचारों के वाहक साहित्य के बदौलत आर्थिक–सामाजिक गैरबराबरी को दूर करने का सपना देखना बहुत बड़ी बात है।

दुसाध जी का यह सपना साकार हो सकता है यदि समर्पित एक्टिविस्ट साथियों का साथ मिल जाय।

Signature campaign for equitable sharing of sources

जब इंटरव्यू लेनेवाले प्राध्यापक अजय कुमार चौधरी ने इस हस्ताक्षर अभियान के बारे में मीडिया में कोई खास चर्चा न होने का कारण जानना चाहा तो दुसाध जी ने बताया कि बीडीएम् के 15वें स्थापना दिवस का मुख्य विषय शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए हस्ताक्षर अभियान पर चर्चा करना नहीं था। इसलिए समारोह में अन्य प्रस्तुतियों पर जोर दिया गया। इस पर बुद्धिजीवियों में मंथन जारी रहे केबल इस लिए थोड़ीचर्चा कर दी गई। हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत तो जुलाई 2021 में होनी है।

गजब का इतिहासबोध है एचएल दुसाध में

दुसाध जी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होनेवाले आंदोलनों और उनकी उपलब्धियों की प्रामाणिक जानकारी से लैस रहते हैं।

जब अजय कुमार चौधरी ने दूसरा सवाल किया कि आपके मन में बहुजनों की मुक्ति के लिए शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटबारे का विचार और उसके लिए हस्ताक्षर अभियान चलाने का विचार कैसे आया ? तो उन्होंने कहा कि अपने ही देश में विभिन्न संगठनों ने अपनी मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा किया है। उनके अनुसार हस्ताक्षर अभियान आन्दोलन का एक प्रभावी जरिया है। यह कोई सर्वथा नया अभियान नहीं है।

गौरतलब बात यह है कि इस साक्षात्कार में दुसाध जी ने स्पष्ट कर दिया है कि वे दूसरे संगठनों की सफल रणनीतियों को अपनाने में संकोच नहीं करते। अपने ही किसी प्रयास के असफल हो जाने पर वे हताश नहीं होते। जीतने के लिए, सफल होने के लिए हमें बार–बार प्रयास करना होगा– यह उनका दृढ विश्वास है। 22 जनवरी, 2018 को प्रकाशित ऑक्सफाम की रिपोर्ट, जिसमें यह बताया गया था कि देश की सृजित दौलत का 73% हिस्सा टॉप की 1% आबादी वाले लोगों के हाथ में चला गया है, स्तब्धकारी था। इस रिपोर्ट के आने के बाद सामाजिक–आर्थिक गैरबराबरी दूर करने हेतु बीडीएम ने बिहार, यूपी, झारखण्ड के 15 जिलों में हस्ताक्षर अभियान चलाया था, जिसे अपेक्षित प्रगति न होने पर स्थगित कर दिया गया था। हस्ताक्षर लेने के बहाने बहुजनों से संपर्क साधकर समर्पित कार्यकर्ता उन्हें एकजुट कर सकते हैं, उनकी बदहाली के लिए जिम्मेदार लोगों और उनके षड्यंत्रों को पहचानने में उनकी मदद की जा सकती है।        

इस साक्षात्कार में दुसाध जी ने बताया है कि 2018 के मुकाबले 2021 में स्थिति अधिक गंभीर है। दुसाध जी की इस मान्यता में काफी दम है। विनिवेशीकरण, निजीकरण और लैटरल इंट्री के जरिए सरकार अल्प जनों को लाभ पहुंचा रही है और बहुजनों को अवसर न देकर अवनति के गर्त में धकेल रही है। 2021 में सुविधाभोगी वर्ग का दबदबा बढ़ा है। शक्ति के स्रोतों पर उनका कब्ज़ा 80—90 प्रतिशत तक हो गया है। ऐसी विषम परिस्थिति में बहुजनों के हमदर्द चिन्तक का मन विकल होता है तो यह स्वाभाविक ही है। उनकी इसी विकलता ने हकमार वर्ग के खिलाफ अभिनव अभियान–साक्षरता अभियान चलाने का निश्चय किया है। अपनी बात बिना किसी हो–हल्ला और धरना प्रदर्शन के सरकार तक पहुँचाने का शांतिपूर्ण तरीका है यह हस्ताक्षर अभियान। इस अभियान से पढ़े –लिखे बहुजन स्वयं सचेत होंगे और वे अल्प शिक्षित बहुजनों को जागरूक तथा संगठित कर सकेंगे। दुसाध जी की यह योजना दूरदर्शितापूर्ण प्रतीत होती है।

जब अजय कुमार चौधरी ने पूछा कि आपका मुख्य मकसद भयावह रूप से फ़ैली आर्थिक और सामाजिक विषमता पर सरकारों और सियासी पार्टियों का ध्यान आकर्षित करना है और इसके निराकरण के लिए जन दबाव भी बनाना है तो बीडीएम द्वारा पूर्व में धन–दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए चलाए गए हस्ताक्षर अभियान को ही फिर से क्यों न चलाया जाए ? इस बार शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए हस्ताक्षर अभियान की बात क्यों कर रहे हैं ?

एच एल दुसाध कहते हैं कि चूँकि 2018 के मुकाबले 2021 में स्थिति ज्यादा गंभीर है इसलिए शक्ति के सभी स्रोतों –आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक का विभिन्न सामाजिक समूहों–सवर्ण, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के स्त्री और पुरुषों के मध्य शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाना उचित है। सामाजिक–आर्थिक विषमता आज चरम पर पहुँच गई है। बहुजनों का मान-सम्मान और विकास की सम्भावना सुविधाभोगी वर्ग के खौफ़नाक इरादों का ग्रास बनता जा रहा है ऐसी स्थिति में मुकम्मल लड़ाई का एक सोपान यह हस्ताक्षर अभियान होगा।

हस्ताक्षर अभियान एक अनूठी परिकल्पना है, पर इसके कार्यान्वयन के लिए एक्शन–प्लान क्या होगा; इसका स्पष्टीकरण करते हुए दुसाध जी ने बताया कि शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए बीडीएम बहुजन संगठनों का संयुक्त मोर्चा बनाएगा। मोर्चे में शामिल बहुजन छात्र और अध्यापक तथा एक्टिविस्ट शांतिपूर्ण तरीके से हस्ताक्षर अभियान चलाएँगे। हस्ताक्षर करनेवालों को कुछ प्रिंटेड सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी जिसमें पम्फलेट, स्टीकर और दुसाध जी पांच किताबें- 1.धन–दौलत के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए सर्वव्यापी आरक्षण की जरुरत (विशेष सन्दर्भ: अमेरिकी और दक्षिण अफ्रीकी आरक्षण), 2.हकमार वर्ग (विशेष सन्दर्भ: आरक्षण का वर्गीकरण), 3. धन के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए डाइवर्सिटी ही क्यों ? 4. आखिरी उम्मीद: बहुजन छात्र तथा 5.डाइवर्सिटी मिशन का घोषणा पत्र, होंगी। पम्फलेट में एक 6 पेज का मैटर होगा जिसमें यह बताया जाएगा कि गुरुजनों और एक्टिविस्टों को हस्ताक्षर अभियान से क्यों जुड़ना है। दूसरा पम्फलेट 4 पेज का होगा जिसमें बताया जाएगा कि हस्ताक्षर क्यों देना है। तीसरे पम्फलेट में बताया जाएगा कि गुलामी से मुक्ति के लिए सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई क्यों जरुरी है। इसके अलावा स्थानीय कार्यकर्ताओं को तख्तियों पर लिखे जाने योग्य नारे भी उपलब्ध कराए जाएँगे।

बहुजन छात्र और गुरुजन यूनिवर्सिटी और कॉलेज परिसरों में, जबकि एक्टिविस्ट बस्तियों में जाकर शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे के समर्थन में हस्ताक्षर लेंगे। हस्ताक्षरित पृष्ठों की प्रतियाँ राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, देश के सभी मुख्य मंत्रियों, नीति आयोग, शिक्षा मंत्रालय, औद्योगिक चैम्बरों, मीडिया समूहों, धर्माचार्यों एवं समस्त राजनीतिक दलों को भेजी जाएँगी।

प्रत्येक जिले में हस्ताक्षरों कि संख्या 4-5 हजार होने पर स्थानीय कार्यकर्ता 25-50 की संख्या में इकठ्ठा होकर जिलाधिकारी के पास जमा कराने जाएँगे।

पुस्तकें, पैम्फ्लेट्स, स्टिकर्स – ये वे सामग्रियां हैं जो किसी आन्दोलन रूपी फसल के लिए खाद का काम करती हैं। दिनकर जी ने एक जगह लिखा है, “पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे”।

दुसाध जी की कलम से विचारों के जो अंगारे निकले हैं, वे बहुजनों को क्रांति के लिए प्रेरित–प्रोत्साहित करेंगे। सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव के लिए हुई दो क्रांतियों – रूसी और फ्रांसीसी क्रांति पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि उन क्रांतियों में वहां के साहित्यकारों, चिंतकों और दार्शनिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। जिन पांच पुस्तकों का उल्लेख इस साक्षात्कार में है हुआ है वे सभी ऐसे तथ्यों, आंकड़ों और दृष्टान्तों से परिपूर्ण हैं जो आर्थिक–सामाजिक गैरबराबरी के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए लोगों में जोश पैदा करेंगे।

समीक्ष्य साक्षात्कार में प्रोफ़ेसर अजय कुमार चौधरी ने हस्ताक्षर अभियान को खर्चीला बताया क्योंकि इसमें प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता को 325 रुपये मूल्य की पुस्तकें देने की बात है। अतः इस खर्चीले प्लान को जमीनी स्तर पर उतारना असंभव है। प्रोफ़ेसर अजय की शंका का समाधान करते हुए दुसाध जी ने प्रत्येक हस्ताक्षरकर्ता से 20 रुपये सहयोग राशि लेने की बात कही। मुझे भी लगता है कि हस्ताक्षरकर्ता से 20 रुपये लिए भी जायं तो भी इस आर्थिक बोझ को उठाना बीडीएम के लिए कठिन होगा। बहरहाल अभियान दिलचस्प है।

इस अभियान में स्टिकरों और नारों की भूमिका भी कम न होगी। स्टिकरों पर बहुजन नायकों के चित्र होंगे जिनकी विचारधारा और संघर्ष से हमें प्रेरणा मिलती है। स्टिकर पर लिखा होगा – टॉप की 10 प्रतिशत आवादी के कब्जे में 90 प्रतिशत से ज्यादा शक्ति के स्रोत क्यों हैं ? स्टिकरों पर बीडीएम के 10 सूत्रीय एजेंडे का भी उल्लेख होगा। मांग पत्र और हस्ताक्षरित पृष्ठ जिलाधिकारी को सौपने जाते वक्त नारों को तख्तियों पर चिपका लिया जाएगा और उन नारों का प्रदर्शन करते हुए कार्यकर्ता आगे बढ़ेंगे, मुख से नारा लगाने की जरुरत ही न पड़ेगी। इस अभियान में प्रयोग में आनेवाले नारों की संख्या 30 के करीब होगी। साक्षात्कार से स्पष्ट है कि दुसाध साहब ने इस अभिनव अभियान की रूपरेखा स्पष्ट रूप में बना रखी है।

साक्षात्कार में व्यक्त विचारों से यह भी स्पष्ट है कि दुसाध साहब अहिंसक क्रांति के समर्थक हैं। उनका संगठन बन्दूक के बल पर सत्ता हथियाने के पक्ष में नहीं है। उनका अभिमत है कि भारत में वोट के जरिये बहुजनों की तानाशाही सत्ता कायम होने की आदर्श स्थितियां मौजूद हैं। जिस प्रकार दक्षिण अफ्रीका में सुविधाभोगी वर्ग अंततः बहुजन अश्वेतों की शक्ति के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर हुआ, उसी तरह भारत की बहुसंख्यक आवादी सुविधाभोगी अल्पजन से त्रस्त होकर संगठित होने को विवश हुआ है। अब गैरबराबरी दूर होकर ही रहेगी।

दुसाध साहब का मानना है कि सर्वव्यापी आरक्षण के जरिये ही बहुजनों की गुलामी ख़त्म होगी। शक्ति के स्रोतों के वाजिब बंटवारे के लिए जरुरी दबाव बनाना होगा। भारत में अंग्रेजों के शासन के दौरान 1892 में जब कांग्रेस ने दबाव बनाया था तो भारतीयों को पब्लिक सर्विस कमीशन के 941 पदों में से 158 पद भारतीयों के लिए आरक्षित करने पड़े थे। आजाद भारत में बहुजन गुलाम की जिन्दगी जी रहे हैं। उन्हें सुविधाभोगी अल्पजनो के विरुद्ध लड़ाई लडनी ही पड़ेगी। शक्ति के सभी स्रोतों अर्थात मिलिट्री, पुलिस, ठेकेदारी, पार्किंग, परिवहन, ज्ञान, उद्योग, फिल्म, मीडिया, पौरोहित्य आदि में संख्या के अनुपात में आरक्षण देना होगा। दुसाध साहब सही फरमाते हैं कि जब दलित, आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित तबकों में आरक्षण की महत्वाकांक्षा पनपेगी, तब भारत उस दक्षिण अफ्रीका जैसा बन जाएगा, जहाँ मूल निवासी कालों की तानाशाही सत्ता है। धूर्तता और स्वार्थपरता ने वर्ण व्यवस्था का षड्यंत्र रचकर बहुजनों को वंचित बनाए रखा। कर्मो की विचलनशीलता धर्म शास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही, इसलिए वर्ण व्यवस्था आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली।

दुसाध साहब ने बताया कि 7 अगस्त, 1990 को मंडल कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित होने पर आरक्षण व्यवस्था में नया मोड़ आया। पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलने से सवर्ण बौखला गए। सत्ता की कुर्सियों पर विराजमान सवर्णों ने 24 जुलाई 1991 को नव उदारवादी अर्थ नीति अपनाकर बहुजनों को वंचित रखने का नया खेल शुरू किया जिसके तहत आरक्षण कागजों की शोभा बनकर रह गया।

प्रोफ़ेसर अजय बीडीएम के इस हस्ताक्षर अभियान को अपने ढंग का पहला बौद्धिक आन्दोलन कहना चाहते हैं। वे इसे साहित्यिक आन्दोलन जैसा मानते हैं।

दुसाध साहब ने कहा कि राम मंदिर आन्दोलन साहित्य पर निर्भर आन्दोलन था जिसमें वैदिक तथा भक्ति साहित्य के उद्धरणों का भरपूर इस्तेमाल किया गया और तानाशाही सत्ता कायम हुई।

दुसाध साहब जिन पुस्तकों को हथियार बनाकर बहुजनों के हित की लड़ाई लड़ना चाहते हैं; वस्तुतः वे बड़ी धारदार हैं। अशिक्षित और सूचना तंत्र से कटी हुई आबादी को इस आन्दोलन से जोड़ने में कठिनाई तो है, पर समर्पित कार्यकर्ता उनसे जुड़ने की कोशिश अवश्य करेंगे। बीडीएम अपने मिशन को पूरा करने में अवश्य सफल होगा। जय संविधान !       

-डॉ. प्रकाश ठाकुर

लेखक केंद्रीय विद्यालय के रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं

बीडीएम का हस्ताक्षर अभियान : बहुजन-मुक्ति की अभिनव एक परिकल्पना
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