शर्म हमको मगर नहीं आती : मज़दूरों के दुःख के समय हम दीवाली मना रहे हैं !

जिनके पेट भरे हों वे कोरोना संकट में भी दीवाली मनाते हैं #9बजे9मिनट : Those who are full, celebrate Diwali even in corona crisis. जब उस दिन मोदी जी ने वीडियो में अपनी नई फरमाइश रखी थी तभी से मेरे दिमाग में ये चल रहा था कि इस बार भी ऐसा ही होगा कि जो …
 | 
शर्म हमको मगर नहीं आती : मज़दूरों के दुःख के समय हम दीवाली मना रहे हैं !

जिनके पेट भरे हों वे कोरोना संकट में भी दीवाली मनाते हैं

#9बजे9मिनट : Those who are full, celebrate Diwali even in corona crisis.

जब उस दिन मोदी जी ने वीडियो में अपनी नई फरमाइश रखी थी तभी से मेरे दिमाग में ये चल रहा था कि इस बार भी ऐसा ही होगा कि जो मोदीजी बोलेंगे, लोग उससे भी आठ कदम आगे जाकर उस पर अमल करेंगे। जैसे कि ताली, थाली पीटने के तमाशे के दौरान लोगों ने किया था। पूरी सोशल डिस्टेंसिंग की ऐसी तैसी कर के लोगों ने रैलियां निकाल दी थीं। तो ठीक उसी तरह हमारे बेहतरीन स्कूल कॉलेजों के डिग्री धारी होनहारों ने 5 अप्रैल की रात को 9 बजे मोदी जी की दिया जलाने वाली कही बात में कई पॉवर जोड़ते हुए शोर मचाया, शंख, घंटे बजाए और पुरज़ोर पटाखे जलाए।

समझ में नहीं आ रहा था कि ये महाशक्ति दिखाना हो रहा था या कोई जश्न था।

जश्न उस वक्त जब देश कोविड-19 के संकट में जकड़ा हुआ (#IndiaFightsCoronavirus) है, रोजगारों में ताले लगे हैं और आर्थिक स्थिति बदहाली की ओर है। अभी भी मजदूर लोग सड़कों पर हैं उनके पास खाने के सामान के लाले पड़े हैं। पर शर्म हमको मगर नहीं आती जो हम तमाशे में लगे हैं और मज़दूरों के दुःख के समय हम दीवाली मना रहे हैं। दिए तक तो तमाशा फिर भी सही था कि चलो ठीक है थोड़ा धीरज और सकारात्मकता के लिए ऐसा किया गया। पर पटाखे जलाने वालों को क्या देश के हाल में ख़ुशी ज़ाहिर करनी थी?

Coronavirus Update

असल में मोदी जी और उनकी पार्टी मिडल क्लास और एलीट तबके से नीचे देख नहीं पाते हैं। उनके निर्णयों, अकस्मात फैसलों से ऐसे लगता है कि जैसे देश में सिर्फ खाते पीते अमीर लोग ही रहते हों। क्या उन्हें नहीं पता था कि लॉक डाउन लम्बा रहा तो रोज़ खाती कमाती अधिकतर जनता सड़क पर आ जाएगी। क्या वे अभी यह नहीं समझ सके थे कि देश में कितने ही प्रवासी मज़दूर, गैर संगठित क्षेत्र के रोज़ खाने कमाने वाले लोग अभी परेशान हैं। अभी उनकी व्यवस्था को पहले ध्यान देना होगा ना कि ये मिडल क्लास और एलीट लोगों के लिए एक नए करतब की घोषणा करना सही होगा। शायद वे अगर ऐसा कुछ संदेश देते कि अपने आस पास के ठेकेदार से लोग सम्पर्क करें और एक मज़दूर का भोजन मुहैया कराएं या ये कह देते कि सरकारी अफसर राशन वितरण की प्रणाली व तरीकों में तेज़ी लाएं और उसे जल्द दूर दराज़ में भी पहुँचाने की सुचारू व्यवस्था करें, तो फिर भी ठीक होता कि संकट में एक प्रधानमंत्री कुछ संदेश दे रहा है।

रही बात जनता की तो उनके भक्त अब राजनैतिक छूट की आदत के एक ऐसे दौर में हैं जब वे बीजेपी या मोदी जी की भी नहीं सुनते हैं। वरना कहीं भी मोदी जी ने पटाखों की बात नहीं की थी और भीड़ में बाहर आने को तो मना ही किया था। पर फिर भी पटाखे भी जले और लोग सड़क पर भी आए। ये जहालत नेताओं और सरकारों की ढील का ही नतीजा है जो काफी समय से कानून तोड़ने के विभिन्न रूपं में दिखती आ रही थी।

खुदगर्ज़ मिडल क्लास  | Greedy Middle Class
शर्म हमको मगर नहीं आती : मज़दूरों के दुःख के समय हम दीवाली मना रहे हैं !
Mohammad Zafar मोहम्मद ज़फ़र, शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत

इससे हमें यह भी पता चलता है कि भले ही कई जगह लोग मज़दूरों के लिए मदद को आ रहे हों पर वर्ग विभाजन के रूप में देखें तो ये हकीकत है कि सामान्यतः देश की एलीट व मिडल क्लास बड़ी ही मतलबी व खुदगर्ज़ है। वो दान दक्षिणा से फिर भी मजदूरों की मदद कर दें पर उनके साथ सम्भाव याने एम्पैथी में शामिल नहीं हैं। और सरकारों का कितना ध्यान मजदूर व किसानों पे रहता है यह तो हम जानते हैं। उनकी अनदेखी कोई आज नई बात नहीं है। हमारी सामाजिक व्यवस्था ही उस पर आधारित है। वो तो जो लोग कम्बल में थे उन्हें कोरोना के आने के बाद जब मज़दूर सडकों पर निकले तब देश की असमता दिखाई दे रही है वरना हम सब जानते ही हैं कि देश में असमता व असमानता की कितनी गहरी खाई है।

अपने स्वयं के अनुभव से भी मैंने अभी देखा कि मज़दूरों को सरकार के द्वारा भोजन पहुँचाने में ही अभी बड़ी समस्याएँ हैं। लिस्टों के बनने के बाद भी कई लोग भोजन के लिए भटक रहे हैं। स्वाभिमान से खाता कमाता इंसान सरकार पर निर्भर हो गया। मगर हम लोग हैं कि उनके दर्द पे तमाशे पर तमाशे कर रहे हैं और कभी थाली बजा रहे हैं तो कभी पटाखे छुड़ा रहे हैं।

प्यारे देशवासियों, अभी इस कठिन समय में कम से कम कुछ तो शर्म करो।

मोहम्मद ज़फ़र

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription