क्या भारतीय लोकतंत्र ’सुधारों’ के लिए वाकई रोड़ा-बाधक है ?

Too much democracy: Is Indian democracy really a hindrance to ‘reforms’? Eliminating opposition and democracy in the name of ‘reforms’ is more obstructive and fatal for Indian democracy. भारतीय लोकतंत्र क्या वाकई में इस समय कई प्रकार के झंझावातों, कठिनाईयों, चुनौतियों के सबसे मुश्किल एवं कठिन दौर से नहीं गुजर रहा है ? 1991 के …
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क्या भारतीय लोकतंत्र ’सुधारों’ के लिए वाकई रोड़ा-बाधक है ?

Too much democracy: Is Indian democracy really a hindrance to ‘reforms’?

Eliminating opposition and democracy in the name of ‘reforms’ is more obstructive and fatal for Indian democracy.

भारतीय लोकतंत्र क्या वाकई में इस समय कई प्रकार के झंझावातों, कठिनाईयों, चुनौतियों के सबसे मुश्किल एवं कठिन दौर से नहीं गुजर रहा है ? 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद यह वह समय है, जब देश की अर्थव्यवस्था एवं अन्यान्य कई प्रकार के सुधारों, फैसलों, नियमों, कानूनों आदि को लेकर भारी घमासान मचा हुआ है। सरकार निजीकरण के रास्ते पर सरपट दौड़ती जा रही है। देश की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या की प्रत्यक्ष पालनहार कृषि क्षेत्र को निजीकरण के रास्ते ले जाने के लिए सरकार अड़ी हुई है, तो सवाल उठना एवं उठाना स्वाभाविक है कि क्या वाकई देश में अब मिश्रित अर्थव्यवस्था के तरीके से विकास, प्रगति, तरक्की, उन्नति एवं संवृद्धि के सारे रास्ते बेकार या निरर्थक हो गये एवं होते जा रहे हैं ?

क्या अब देश को मिश्रित अर्थव्यवस्था की जरूरत नहीं है ? | Does the country no longer need a mixed economy?

कृषि, बीमा, बैंकिग, रेलवे, यहां तक की सुरक्षा उपकरण तैयार करने वाली इकाईयां सब कुछ लगातार, एक के बाद एक प्रायवेट, निजी क्षेत्रों को सौंपी जा रही है। क्या यह सरकार की नाकामी, अक्षमता, अदूरदर्शिता है या सरकार की सोची समझी रणनीति है, जिसके एवं जिनके लिए सरकार काम कर रही है ? या क्या यह सरकार की आर्थिक सुधारों का महत्वपूर्णं भाग है ? क्या यह देश के प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने का खेल नहीं है ? जिनकों दशकों की मेहनत और करोड़ों लोगों की खून-पसीने की कमाई के पैसे से तैयार एवं खड़ा किया गया है।

देश के सार्वजनिक उपक्रमों की भारी भरकम आधारभूत संरचनाओं को जिस षड़यंत्र के तहत निजी हाथों को लगातार सौंपा जा रहा है वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्णं तो है ही, साथ ही साथ बहुत ही खतरनाक भी है।

जिन सार्वजनिक उपक्रमों को देश के करोड़ों जनमानस के टैक्स की कमाई से दशकों बाद तैयार, खड़ा किया गया है, अब इन्हें सरकार लगातार, बारी-बारी से एक-एक कर निजी हाथों को सौंप रही है। क्या यह इन ईमानदार करदाताओं के साथ धोखाधड़ी नहीं है ? जीवन बीमा की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का निर्णय लेने या इसे निजी हाथों में देने के पहले क्या सरकार ने इसके पॉलिसी धारकों की मंशा जानने की कोशिश की है, कि वे क्या चाहते हैं ?

बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बीमा, सुरक्षा, रेल, कृषि, खनन, जंगल, रक्षा, दूरसंचार, सड़क, एयर पोर्ट, रेलवे स्टेशन कौन सा सेक्टर बचा है ? आज बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

उत्तरप्रदेश में बिजली कंपनियों को निजी क्षेत्रों में सौंपने का निर्णय, मध्यप्रदेश में जंगलों को निजी हाथों में सौंपने का फैसला, एयर पोर्ट एवं रेलवे स्टेशनों को निजी क्षेत्रों को देने का निर्णय, मालगाड़ी संचालन निजी हाथों में, कृषि सेक्टर को प्रायवेट कंपनियों को, रक्षा क्षेत्र की जिम्मेदारी निजी हाथों में, क्या-क्या और कितना गिनाया जाय, जिन्हें यह सरकार निजी सेक्टर को सौंपने का फैसली कर चुकी है, लगातार कर रही है, करती जा रही है।

सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के अंदर और अर्थव्यवस्था के अंतर्गत चौतरफा निजीकरण करती जा रही है।

व्यावसायिक, कारोबारी गतिविधियों के बाद अब कृषि क्षेत्र की बारी है। सरकार कृषि क्षेत्र को निजी कंपनियों, पूंजीपतियों, कार्पोरेट घरानों के हवाले करके कृषि में विकासदर बढ़ाना चाहती है, कृषि क्षेत्र में सुधार करना चाहती है। सरकार का इरादा औद्योगिक क्षेत्र की गिरती विकासदर को रोकने के लिए कृषि क्षेत्र में निजीकरण के माध्यम से विकासदर को बढ़ाने का है।

सरकार की मंशा साफ है कि कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी निवेश से कृषि की स्थिति सुधरेगी, कृषि सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आमदनी बढ़ेगी और अंततः कृषि क्षेत्र में विकासदर बढ़ने से देश के विकासदर में सुधार होगा। अर्थव्यवस्था की चौतरफा गिरती, घटती विकासदर पर लगाम लगेगी। अर्थव्यवस्था के भीतर लगातार ऋणात्मक होती, लुढ़कती विकासदर थमने लगेगी। पर क्या ऐसा संभव है ? क्या सरकार जैसा सोच रही है वैसा होगा ? यह बड़ा सवाल है।

कोरोना कालखण्ड की दूसरी तिमाही के विकासदर के आंकड़े आ चुके हैं। इससे साफ है कि तीसरी तिमाही की विकासदर भी ऋणात्मक ही रहेगी, और अर्थव्यवस्था को सुधरने में अभी और समय लगने वाला है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में देश में रोजगार, विकास, सुधार आदि मसले चिंता एवं चुनौती बने रहेंगे। इसका असर आमजन की आमदनी, क्रयशक्ति पर पड़ेगा, जिसका प्रभाव बाजार की मांग पर दिखेगा। बाजार में मांग में कमी आने से उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे आने वाले समय के लिए निवेश घटेगा। निवेश घटने से अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया धीमी ही रहेगी। रोजगार के अवसर और बेरोजगारी के आंकड़े परेशान करते रहेंगे।

दरअसल में देश नोटबंदी और जीएसटी के झटकों से उबरा भी नहीं था और कोरोना की मार ने हमारी अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। बाजार में मांग नहीं होने के कारण देश में चौतरफा बेरोजगारी का आलम है। जीडीपी, विकासदर, रोजगार, बाजार में मांग, निवेश आदि बुनियादी मसले अब देश की आमजनता को बुरी तरह से घेरने एवं परेशान करने लगे हैं। बेलगाम महंगाई से आम आदमी की कमर पूरी तरह टूट चुकी है। ऊपर से कोरोना खर्चों का बोझ आमआदमी के सिर डाला जा रहा है जिससे आम आदमी के फिजूल के खर्चे बढ़ गए हैं। असंगठित क्षेत्र के चारों खाने चित्त होने से राज्य सरकारों की अर्थव्यवस्थाएं भी खोखला हो चुकी हैं, क्योंकि बाजार में मांग पैदा करने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र आज असंगठित क्षेत्र ही रह गया है।

किसी भी अर्थव्यवस्था में विकास की प्रक्रिया एक साइकल (चक्र) के रूप में काम करती है, जिसे सरकार समझने में नाकाम नजर आ रही है। इस समय हमारी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता एवं चुनौती की बात यह है कि कोरोना के कारण प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल सुधार करते हुए महंगाई पर नियत्रंण लगाई जाये। बाजार में मांग बढ़ाने के लिए बुनियादि सुधार किये जायें। सरकार इस पर सही, उचित निर्णय लेने के बजाय देश को गुमराह करने में लगी है। असल आर्थिक मुद्दों से आम जनमानस का ध्यान हटाने के निरर्थक एवं फिजूल के मसलों को मीडिया में परोसकर सरकार न सिर्फ अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रही है, बल्कि देश के 139 करोड़ आम जनमानस के सपनों, उम्मीदों, अरमानों के साथ भी खेल रही है। पाकिस्तान एवं चीन के साथ सीमा विवादों को जानबुझकर भड़काये एवं उलझाए रखते हुए हथियार खरीदने के लिए लोगों के खून-पसीने की कमाई के पैसे को पानी की तरह बहाना न केवल अनुचित, अन्यायपूर्णं है, बल्कि सत्ता के घोर दुरूपयोग का मसला भी है।

स्पष्ट है कि हमारी अर्थव्यवस्था की हालत इस समय बहुत नाजुक एवं चिंताजनक है, जबकि सरकार इसे गंभीरता से लेने के बजाय लोगों को सही जानकारी से ही वंचित कर रही है। बाजार एवं अर्थव्यवस्था को सुस्ती एवं मंदी से तत्काल निकालने की जरूरत है जिससे देश की आर्थिक स्थितियां एवं परिस्थितियां सुधर सकें। शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, गरीबी, बेरोजगारी, असमानता आदि चिंताएं एवं चुनौतियां देश में पहले से ही खराब अवस्था में है। जीडीपी में भारी कमी आने से विकासदर और कम होगी जिससे इन चुनौतियों के और विकराल होने की संभावनाएं कई गुंना तक बढ़ सकती हैं। इसलिए इस समय सरकार को आर्थिक मोर्चे पर अपना प्रदर्शन सुधारने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्णं बात यह है कि सरकार देश के, अर्थव्यवस्था के सभी महत्वपूर्णं क्षेत्रों को निजी क्षेत्रों को सौंपना चाहती है, सरकार के इस निर्णय के पीछे मंशा क्या है ? यह जानने, समझने का वक्त है। क्या सरकार अमेरिका, यूरोप के नक्शेकदम पर चलकर देश को पूरी तरह निजी कंपनियों, बड़े चंद कार्पोरेट घरानों के हाथों देना चाहती है ? क्या सरकार देश की मिश्रित अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदलकर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में तब्दील करना चाहती है ? याद रहे भारत महज एक देश नहीं है, भारत एक उपमहाद्वीप है। भारत की जनसंख्या अमेरिका से चार गुनी और यूरोप से दोगुनी से अधिक है। फिर यह सब कैसे संभव है ? क्या सरकार इस पर कभी गौर करती है ? शायद इसका उत्तर सरकार के पास नहीं है, क्योंकि यह सरकार, सरकार नहीं एक निहायत निजी कंपनी बनती जा रही है।

The country’s most unfortunate democracy at this time

यही इस समय देश के लोकतंत्र का सबसे अधिक दुर्भाग्य है। देश में एवं लोकतंत्र में बेशक सुधारों की निहायत जरूरत एवं आवश्यकता है, होनी भी चाहिए, लेकिन सुधारों का मतलब निजीकरण नहीं होता है। सुधारों के नाम पर चौतरफा निजीकरण के रास्ते खोलना देश के लिए अहितकारी है। सुधारों के लिए चंद बड़े चंद कार्पोरेट घरानों को देश की सार्वजनिक संपदाओं एवं आधारभूत संरचनाओं को सौंपना घातक एवं गलत है। सुधारों के नाम से अध्यादेश के जरिये कानून लाना और संसद में चर्चा नहीं कराना लोकतंत्र की हत्या है। देश का अधिक लोकतंत्र सुधारों के लिए रोड़ा एवं बाधक नहीं है, ’सुधारों’ के नाम पर विपक्ष एवं लोकतंत्र को खत्म करना भारतीय लोकतंत्र के लिए अधिक रोड़ा-बाधक एवं घातक है।

डॉ. लखन चौधरी

(लेखक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं)

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