मोदी समावेशी विकास की बात और चर्चा क्यों नहीं करते हैं ?

समावेशी विकास, आर्थिक विकास और मानव संसाधन विकास का अंतर्संबंध Why does Modi not talk about inclusive development? जीवन, समाज, राष्ट्र और समूची दुनिया के लिए ‘विकास’ एक अत्यंत ही उपयोगी, महत्वपूर्णं एवं सार्थक शब्द है। विकास ही जीवन है, विकास ही प्रगति है, विकास ही उन्नति है, विकास ही उद्देश्य है, और विकास ही …
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मोदी समावेशी विकास की बात और चर्चा क्यों नहीं करते हैं ?

समावेशी विकास, आर्थिक विकास और मानव संसाधन विकास का अंतर्संबंध

Why does Modi not talk about inclusive development?

जीवन, समाज, राष्ट्र और समूची दुनिया के लिए ‘विकास’ एक अत्यंत ही उपयोगी, महत्वपूर्णं एवं सार्थक शब्द है। विकास ही जीवन है, विकास ही प्रगति है, विकास ही उन्नति है, विकास ही उद्देश्य है, और विकास ही दुनिया का अंतिम लक्ष्य है। विकासक्रम का ठहर जाना संकट है, विकासक्रम का धीमा होना खतरा है, विकासक्रम का पीछे चले जाना चेतावनी है, विकासक्रम का रूक जाना मृत्यु है, विकासक्रम का थम जाना अंत है। विकास दैहिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक, सात्विक, बौद्धिक, आध्यात्मिक एवं आत्मिक कई रूपों में, कई दिशाओं में एवं कई प्रकारों में होता है। विकास की इसी परिकल्पना एवं संकल्पना के अंतर्गत ‘संसाधन और समावेशी विकास’ की अत्यंत महत्वपूर्णं एवं सार्थक भूमिका होती है।

विकास में साधनों एवं संसाधनों का योगदान उल्लेखनीय ही नहीं अपितु अविस्मरणीय होता है, यानि साधनों एवं संसाधनों के बगैर विकास की संकल्पना ही निराधार होती है।

विकास में प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की भूमिका जितनी महत्वपूर्णं एवं आवश्यक होती है, उतनी ही उनकी प्राकृतिक उपलब्धता जरूरी होती है। प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की उपलब्धता (Availability of natural resources), बहुलता एवं सुलभता न केवल विकास की दशा, दिशा एवं गति को तय करते हैं, बल्कि विकास के मार्ग का निर्धारण, संधारण भी करते हैं।

प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की उपलब्धता, बहुलता एवं सुलभता के अभाव या कमी में विकास की दशा एवं दिशा ही बदल जाती है। विकास का मार्ग या रास्ता भटक जाता है। प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों के अभाव में पूंजी, श्रम,  संगठन, साहस, तकनीक, प्रौद्योगिकी सब कुछ मिलकर भी विकास के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं। इधर और इसके इतर इनकी समावेशिता भी उतनी ही अनिवार्य, महत्वपूर्णं एवं सार्थक है, अन्यथा विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाता है।

दूसरी तरफ देखते हैं कि जहां प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों के अभाव में पूंजी, श्रम, संगठन, साहस, तकनीक, प्रौद्योगिकी सब कुछ मिलकर भी विकास के लिए कुछ नहीं कर पाते हैं, वहीं इनके अतिरिक्त एक ऐसा संसाधन भी है जो विकास के लिए यह सभी इंताजामात कर लेता है। विकास के लिए आवश्यक एवं जरूरी सभी प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की व्यवस्था कर लेता है। इन समस्त प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की अनुपलब्धता के बावजूद उनकी व्यवस्था करके उत्पादन को अंजाम देकर विकास के सपने को साकार कर लेता है। वह कोई और नहीं अपितु ‘मानव संसाधन’ है जो विकास के असंभव ख्वाब को संभव बना लेता है। समस्त कठिन एवं दुरूह परिस्थितियों को आसान एवं सरल बना लेता है। सारी नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदल देता है। सभी निरर्थकता को सार्थकता में बदल देता है। सभी बर्बादी को सृजन एवं उपयोगिता में तब्दील कर देता है।

Why Human Resource Development is given more importance.

इसलिए विकास की संकल्पना एवं परिकल्पना के अंतर्गत प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की तुलना में ‘मानव संसाधन’ विकास को अधिक महत्व दिया जाता है। यह सच भी है कि विकास की समग्र एवं सम्पूर्णं प्रक्रिया में ‘मानव संसाधन’ की महत्वपूर्णं, सार्थक, सकारात्मक, उपयोगी एवं केन्द्रीय भूमिका होती है। दरअसल में ‘विकास’ की संकल्पना एवं परिकल्पना ही ‘मानव संसाधन’ की सोच की ही उपज होती है। पिछले कुछेक दशकों से दुनियाभर में जिस तरह के मानव संसाधनों के विकास की तरफ जोर दिया जा रहा है; मानवीय संसाधन विकास की जिस तरह की प्रवृत्तियां उभरकर आ रही हैं; जिस तरह की प्रवृत्तियां पनप रही हैं; जिस तरह की प्रवृत्तियां विकसित हो रही हैं; उससे लगता है कि मानवीय संसाधन विकास भौतिक, आर्थिक, तकनीकी एवं औद्योगिक विकास की चकाचैंध में दिशाविमुख हो रहा है; अपने मूल लक्ष्य एवं उद्देश्य से भटकने लगा है।

यह तथ्य चिंताजनक एवं निराशाजनक होने के साथ-साथ चिंतन, विश्लेषण, विमर्श एवं समीक्षा की मांग करता है। आज विकास की जिस तरह की प्रवृत्तियां विकसित हो रही हैं, उससे समाज में अनेक प्रकार की असमानताएं, विषमताएं, विकृतियां, विडम्बनाएं एवं विरोधाभास उत्पन्न हो रहे हैं। मानव संसाधन विकास की जिस तरह की प्रवृत्तियों का विकास हो रहा है, वह जहां एक ओर अवांछनीय एवं अप्रशंसनीय है, वहीं दूसरी ओर इससे अयोग्यता एवं अमानवीयता बढ़ती जा रही है।

आज जिस तरह के मानव संसाधन विकास को पोषित, पल्लवित किया जा रहा है, उससे समाज में व्यक्तिवादी एवं स्वार्थी सोच, विचारधारा एवं व्यक्तित्व का विकास हो रहा है। समय रहते इस प्रकार की सोच एवं विचारधारा पर गहन चिंतन, मंथन, विश्लेषण की आवश्यकता है, ताकि उन कमियों का निराकरण किया जा सके एवं उनमें सुधार किया जा सके।

आज दुनिया का प्रत्येक राष्ट्र सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, कूटनीतिक एवं सुरक्षात्मक दृष्टि से या कहें कि आंतरिक आत्मनिर्भरता एवं बाहरी सुरक्षा दोनों ही पक्ष से पूर्णतः सुदृढ़, मजबूत, साधन-संसाधन सम्पन्न एवं शक्तिशाली अर्थव्यवस्था वाला देश बनना चाहता है। उदारीकरण, बाजारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण और शहरीकरण के इस युग, दौर में निरन्तर प्रगति करते हुए अपनी एक विशिष्ट पहचान प्रतिस्थापित करना चाहता है। सवाल उठता है कि क्या यह संभव है? और यदि हां, तो कैसे? उत्तर है कि कोई भी देश अपनी मानव संसाधन विकास के द्वारा इस लक्ष्य एवं उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है एवं पूरी दुनिया में अपनी साख, संवृद्धि एवं सफलता का झण्डा लहरा सकता है।

इतिहास में इसके उदाहरण मिलते हैं कि इंग्लैंण्ड, जापान, जर्मनी, कोरिया, नार्वे, स्वीडन, सिंगापुर, मलेशिया जैसे छोटे-छोटे देशों से लेकर अमेरिका, रूस, चीन जैसे बढ़े देशों के उच्च एवं उत्कृष्ट कोटि के मानव संसाधन ने यह मिसाल दी है। वहां के मानव संसाधन विकास के कारण इन देशों ने पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करते हुए अपने देश को सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, कूटनीतिक एवं सुरक्षात्मक दृष्टि से या कहें कि आंतरिक आत्मनिर्भरता एवं बाहरी सुरक्षा दोनों ही पक्ष से पूर्णतः सुदृढ़, मजबूत, साधन-संसाधन सम्पन्न एवं शक्तिशाली अर्थव्यवस्था वाला देश के रूप में प्रतिस्थापित किया है।

सामान्यतया मानव संसाधन का आशय या अर्थ किसी देश अथवा राज्य में रहने-निवास करने वाली उस जनता, जनसंख्या से होता है; जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी देश/अर्थव्यवस्था में योगदान देते/करते हैं; जिनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी देश/अर्थव्यवस्था के विकास में भूमिका होती है; जिनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी देश/अर्थव्यवस्था के विकास में भागीदारी होती है। या कहें कि किसी देश अथवा अर्थव्यवस्था की कुल जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या का अनुपात, उसकी कुल जनसंख्या में युवा पीढ़ी का अनुपात से होता है।

मानव संसाधन का तात्पर्य क्या है | What is the meaning of human resources

दरअसल मानव संसाधन का तात्पर्य किसी देश अथवा राज्य में रहने-निवास करने वाली उसकी जनसंख्या की गुणवत्ता, श्रेष्ठता, उत्कृष्टता अर्थात् उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सोच, दृष्टिकोण, विचारशैली, कार्यकुशलता, कार्यदक्षता, कार्यप्रवृति, कार्यक्षमता, दूरदर्शिता, उत्पादकता, उद्यमशीलता आदि गुणों से होता है। अर्थात किसी देश में जनसंख्या की बहुलता एवं अधिकता की तुलना में गुणात्मक श्रेष्ठता अधिक महत्वपूर्णं एवं सार्थक होती है।

मानव संसाधन विकास क्या है | What is human resource development

स्पष्ट है कि मानव संसाधन विकास से तात्पर्य किसी देश अथवा राज्य में रहने-निवास करने वाली जनसंख्या के गुणात्मक विकास से है। किसी देश अथवा राज्य की विशाल जनसंख्या को ’मानवीय पूंजी’ के रूप में तब्दील करना ही मानव संसाधन विकास है।

वास्तव में मानव संसाधन विकास एक पूरी प्रक्रिया का नाम है जिसके अंतर्गत किसी देश अथवा राज्य के विभिन्न समाजों, जातियों, धर्मों, समूहों, वर्गों एवं सम्प्रदायों में रहने वाले लोगों की शिक्षा, ज्ञान, कौशल, क्षमता, दक्षता, प्रवृति, उत्पादकता एवं दृष्टिकोण का परिवर्धन, परिमार्जन एवं परिसंस्करण किया जाता है। उनकी आदतों, व्यवहारों एवं प्रवृत्तियों को शिक्षा, प्रशिक्षण, तकनीकी कुशलता आदि माध्यमों से विकसित, परिमार्जित किया जाता है। जनसंख्या का गुणात्मक सुधार एवं कौशल विकास किया जाता है, ताकि देश या राज्य की जनसंख्या ‘दायित्व’ नहीं अपितु ‘सम्पत्ति’ के रूप में देश के समग्र विकास में अपनी महत्वपूर्णं भूमिका एवं योगदान दे सके। स्पष्ट है कि जनसंख्या का गुणात्मक सुधार, परिमार्जन एवं कौशल विकास ही मानव संसाधन विकास है।

वास्तव में मानव संसाधन विकास से अभिप्राय किसी देश या राज्य में विद्यमान जनसमूह को शिक्षित, कुशल, अनुभवी, साहसी, प्रशिक्षित आदि बनाने से है।

कई लोगों का मानना है कि मानव संसाधन विकास का आशय शिक्षा एवं प्रशिक्षण का विस्तार एवं फैलाव है। किसी देश अथवा राज्य की विशाल जनसंख्या को मानव संसाधन विकास की एक पूरी प्रक्रिया के द्वारा मानवीय पूंजी के रूप में विकसित एवं परिष्कृत किया जा सकता है। किसी देश की विशाल आबादी को कार्यशील जनसंख्या में परिवर्तित करके देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में भागीदार एवं सहभागी बनाया जा सकता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो किसी देश अथवा राज्य की अर्थव्यवस्था के विकास के रूप में मानव संसाधन विकास के माध्यम से निवेश करके आर्थिक एवं सामाजिक विकास की नई परिभाषा गढ़ी जा सकती है। इसलिए तो कहा जाता है कि विकास के लिए प्राकृतिक साधनों एवं ससंाधनों की तुलना में मानवीय संसाधन अधिक महत्वपूर्णं, उपयोगी एवं सार्थक कदम होता है।

सुस्पष्ट है कि जो देश अथवा राज्य मानव संसाधन विकास पर जितना अधिक धन निवेश करता है, भविष्य में वह देश अथवा राज्य उतना अधिक विकास करता है। जो देश अथवा राज्य अपनी जनसंख्या को जितनी अधिकता के साथ कार्यकुशल, सुयोग्य, गुणवान, ज्ञानवान, बुद्धिवान, धैर्यवान, उद्यमशील एवं सृजनशील बनाती है, वह देश अथवा राज्य आर्थिक विकास एवं प्रगति के पथ पर उतनी ही तेजी के साथ आगे बढ़ता है। किसी भी राज्य अथवा राष्ट्र में मानव संसाधन विकास की प्रामाणिकता को जितनी जल्दी सुनिश्चित किया जाता है, वहां आर्थिक विकास की संभावना उतनी ही जल्दी सुनिश्चित, फलीभूत एवं साकार होती है। यही कारण है कि आजकल प्रत्येक देश/राज्य, कंपनियों और संस्थानों में मानव संसाधन विकास पर भारी मात्रा में निवेश किया जाने लगा है। इससे देश की जनसंख्या में प्राविधिक ज्ञान, कुशलता, योग्यता, विशेषज्ञता एवं दूरदर्शिता आदि गुणों का विकास संभव हो रहा है। इससे आर्थिक एवं सामाजिक विकास की संकल्पना पूरी हो रही है।

स्पष्ट है कि किसी क्षेत्र, राज्य, देश की जनसंख्या की और वास्तव में वहां के मानव संसाधन की तार्किक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उत्कृष्ट उद्यमिता एवं नवप्रवर्तन की भावना, मौलिक अभिप्रेरणा उस देश, राज्य या क्षेत्र को सामाजिक एवं आर्थिक विकास के शिखर पर ले जा सकते हैं।

इसलिए कहा जाता है कि मानव संसाधन विकास एवं आर्थिक विकास में उच्च कोटि का धनात्मक, प्रत्यक्ष एवं सकारात्मक सह-संबंध होता है।

आर्थिक विकास को तेजी से कैसे बढ़ाया जा सकता है | How to accelerate economic development.

आर्थर लुईस ने ठीक ही कहा है कि ‘आर्थिक विकास मानवीय प्रयत्नों का परिणाम है।’ शिक्षा, कौशल एवं प्रशिक्षण सुविधाओं की उपलब्धता की गुणवत्ता को अधिक प्रामाणिकता के साथ सुनिश्चित करके मानव संसाधन विकास के माध्यम से आगे बढ़ाते हुए आर्थिक विकास को तेजी से गति एवं नई दिशा दी जा सकती है। जनता के स्वास्थ्य, पोषण, कुपोषण एवं संतुलित आहार आदि बातों पर ध्यान देकर लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ाकर मानव संसाधन विकास के द्वारा आर्थिक विकास को तेजी से बढ़ाया जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान के परम्परागत विरासत एवं स्रोतों में नवीन विचार एवं दृष्टिकोण का विकास एवं समावेशन के माध्यम से मानव संसाधन विकास द्वारा आर्थिक विकास को गति दी जा सकती है।

नई पीढ़ी को तार्किक, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय रूप से प्रशिक्षित, परिवर्धित एवं विकसित करके मानव संसाधन विकास को प्रशिक्षित कर आर्थिक विकास को तेजी से बढ़ाया जा सकता है। किसी देश की जनसंख्या में सकारात्मक व्यावसायिक सोच एवं दृष्टिकोण का विकास कर मौलिक उद्यमशीलता के माध्यम से आर्थिक विकास को नई ऊंचाईयों की ओर ले जाया जा सकता है। इसलिए मोदी सरकार को इस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए।

ॉ. लखन चौधरी

(लेखक; अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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