9/11 हमले की पृष्ठभूमि और 25 साल बाद की तस्वीर

  • अमेरिका की प्रतिशोध नीति और युद्धों का विस्तार
  • अफगानिस्तान और इराक में मौत और तबाही के आंकड़े
  • अल-कायदा से लेकर ISIS तक : नए आतंकी संगठनों का जन्म
  • तालिबान की वापसी और अमेरिकी असफलता
  • रोनाल्ड रीगन और राजनीतिक इस्लाम की प्रयोगशाला
  • पाकिस्तान, सीआईए और आईएसआई की भूमिका
  • ड्रग्स, हथियार और आतंकवाद का गुप्त कारोबार
  • फिलिस्तीन, गाज़ा और इज़राइल का संकट

9/11 के बाद की दुनिया : शांति की तलाश या नई जंग की तैयारी?

11 सितंबर 2001 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन हमलों को आज 25 साल पूरे हो रहे हैं। अमेरिका की तथाकथित ‘आतंकवाद के खिलाफ जंग’ ने अफगानिस्तान, इराक और कई देशों में लाखों लोगों की जान ली और नए आतंकवादी संगठन खड़े किए। अमेरिका की आतंकी नीतियों की ऐतुहासिक दस्तावेजों के साथ तहकीकात कर रहे हैं डॉ सुरेश खैरनार

9/11 के पच्चीस साल.

आज अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन के ऊपर हुए आतंकवादी हमले को पच्चीस साल पूरे हो रहे हैं. और इन हमलों का बदला लेने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक के अलावा आठ देशों पर जबरदस्ती से युद्ध लाद कर, अपने देश के साढ़े तीन हजार लोगों की जान के एवज में, अफगानिस्तान – इराक के ऊपर हमले करते हुए पच्चीस लाख से भी अधिक लोगों की जानें ली हैं. और उसमें आधे से ज्यादा लोग अकेले इराक के हैं, जिसमें पंद्रह लाख जानें ली गई हैं. और उसमें तीन चौथाई से भी ज्यादा पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चे हैं। आर्थिक पाबंदी के कारण अन्न और दवाओं के अभाव में सबसे ज्यादा बच्चों की जानें ली गई हैं, जो कि नागासाकी-हिरोशिमा के 6 – 9 अगस्त 1945 के दिनों में, एटम बम विस्फोट में मरने वाले लोगों से भी ज्यादा संख्या में बच्चे मरे हैं.

9/11 हमले के बाद, अमेरिका ने अल-कायदा को खत्म करने की आड़ में अफगानिस्तान के साथ यमन, सीरिया, इराक, लीबिया, मिस्र में भी आतंकवाद के नाम पर उसने हमला किया. और 585 लाख करोड़ रुपये खर्च कर के 9.29 लाख लोग मारे गए. इनमें से कुल 84 आतंकी शामिल थे.

अमेरिका की कार्रवाई के बाद अल-कायदा के खत्म होने के बजाय दस से ज्यादा अलग-अलग नाम के आतंकी संगठनों ने जन्म लिया. ISIS, बोको-हरम, इराक से लेकर नाइजीरिया तक 17 देशों में फैल गए. जिसमें जैश-ए-मुहम्मद, लष्कर-ए-तैयबा, हक्कानी समेत 35 गुट जुड़े हुए हैं.

25 सालों में इन गुटों ने 34 हजार हमले किए हैं, जिसमें एक लाख से भी ज्यादा लोगों की जानें गई हैं. और महीने से भी कम समय हो रहा जिस अफगानिस्तानी आतंकवादी संगठन तालिबान के ऊपर अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को सौंपने को लेकर हमला करके बीस साल तक अफगानिस्तान को अपने कब्जे में रखा था, उसी अफगानिस्तान में अमेरिका की सैनिक वापसी के तुरंत बाद ही तालिबान का कब्जा हो गया है. क्या यह डब्ल्यूडब्ल्यूएफ जैसी कुश्ती नहीं लगती ? दुनिया की सबसे ताकतवर सेना अफगानिस्तान में बीस साल बगाराम इलाके में मौज-मस्ती में मशगूल थी ? और साढ़े तीन लाख अफगानिस्तानी सैनिकों और खुद अमेरिका की सेना के नाक के नीचे सिर्फ सत्तर हजार तालिबानी जिन्हें हटाने का दावा पच्चीस साल पहले किया था, तो वही दोबारा सत्ता में आते हैं ? इस बात की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखने के बाद पता चलेगा कि आखिरकार इसका कारण क्या है ?

1985 को व्हाइट हाउस के लॉन में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन अफगानियों के सभी मुजाहिद्दीन नेताओं को मीडिया के सामने प्रस्तुत करते हैं. और उनकी तारीफ करते हुए कहते हैं “कि-यह सज्जन पुरुष नैतिक मापदंडों पर हमारे देश के संस्थापकों के बराबर ठहरते हैं.” यह वह क्षण था, जब अमेरिका ने सोवियत संघ के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखने के लिए राजनीतिक इस्लाम को नए रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की थी.

विएतनाम में हार के आधे दशक बाद अमेरिकी विदेश नीति में दूसरी हार देखने को मिली. इस प्रवृत्ति को बड़े नाटकीय ढंग से 1979 में चित्रित किया गया. जब लोकप्रिय क्रांतियों ने अमेरिका समर्थित दो तानाशाहों की हुकूमत का खात्मा कर दिया. एक निकारागुआ में, तथा दूसरा ईरान में. उस साल के अंत में, सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. तब किसे यह अनुमान था “कि इस घटना के एक दशक बाद ही सोवियत संघ बिखर जायेगा ?”

यदि 9/11 की घटना अमेरिका की खुशियों पर थोड़ी देर के लिए पानी फेर देती है, तो इस घटना से यह प्रश्न भी खड़ा होता है, “कि आखिर किस कीमत पर शीत युद्ध में विजय किया गया ?” इस सवाल के जवाब के लिए आपको राष्ट्रपति रीगन के शासनकाल पर नजर डालनी होगी.

रोनाल्ड रीगन ने दावा किया था “कि तीसरी दुनिया में अमेरिकी समर्थक तानाशाहों की हार स्पष्ट रूप से सोवियत संघ के कारण हुई. इसके बाद रीगन ने आव्हान किया, कि सोवियत संघ को पीछे ढकेलने के लिए हमें अपनी सारी शक्ति झोंक देनी चाहिए, इसके लिए हमें चाहें जो भी उपाय करना पड़े. "अफगानिस्तान दूसरे देशों के मुकाबले, शीत युद्ध का उच्च बिंदु था.

अफगान युद्ध ने निकारागुआ में चल रहे प्रतिक्रांति अभियान को अपेक्षाकृत कमजोर कर दिया. दोनों युद्धों को जीतने के लिए जो तरीके ढूँढे गए थे, उनके बाद के प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया गया. युद्ध में सोवियत संघ की लगभग एक लाख जमीनी सेनाएं लड़ रहीं थीं. अफगानिस्तान युद्ध ने अमेरिका को यह मौका दिया, कि वह सोवियत संघ को विएतनाम सौंप दे. रीगन ने इसे सामरिक उद्देश्य में ढाला, इसलिए कि अफगान युद्ध के प्रति उनका नजरिया क्षेत्रीय के बदले वैश्विक अधिक था. यह युद्ध रीगन प्रशासन ने दस साल तक खींचा. लिहाजा अफगान युद्ध दुनिया में सबसे खतरनाक क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो गया. विएतनाम युद्ध से लेकर अबतक सीआईए का भी यह सबसे बड़ा अर्द्धसैनिक अभियान था. जो सोवियत इतिहास में सबसे लंबे युद्ध के रूप में परिवर्तित हो गया.

1979 की इरानी क्रांति का अफगान युद्ध की नीति पर व्यापक प्रभाव पड़ा. ईरानी क्रांति के कारण अमेरिका तथा राजनीतिक इस्लाम के बीच संबंधों का एक नया स्वरूप सामने आया. इसके पहले, अमेरिका ने दुनिया को बड़े ही सहज रूप से समझा था. एक ओर सोवियत यूनियन तथा आतंकवादी तीसरी दुनिया की राष्ट्रीयता, जिसे अमेरिका ने सोवियत औजार की संज्ञा दी, तो दूसरी तरफ राजनीतिक इस्लाम था, जिसे अमेरिका ने इंडोनेशिया में सुकर्णों के खिलाफ सरीकत-ए-इस्लाम को मदद दी.

उसी तरह पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ जमात-ए-इस्लामी की मदद की. तथा मिस्र में नासिर के खिलाफ सोसायटी ऑफ मुस्लिम ब्रदरहुड की मदद की. आशा यह थी कि राजनीतिक इस्लाम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादीता के विरुद्ध एक स्थानीय प्रतिरोध खडा करेगा. यह विचार इज़राइल से लेकर रुढ़िवादी अरब हुकूमतों तक उस क्षेत्र के दूसरे अमेरिकी मित्रों को भी रास आया. लेकिन यह योजना पूरी तरह नाकामयाब रही.

इज़राइल इस उम्मीद में था कि वह अपने कब्जा किया हुआ क्षेत्र में इस्लामी राजनीतिक आंदोलन को बढ़ावा देगा. और इसका इस्तेमाल फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादियों के विरुद्ध करेगा. इज़राइली गुप्तचर विभाग ने पहले इंतेफादा के दौरान हमास को आगे बढ़ने की पूरी इजाजत दे दी. साथ ही एक विश्वविद्यालय तथा बैंक खाता खोलने की भी छूट भी. इसके अलावा उनकी आर्थिक मदद भी की. यह सब इसलिए कि वह एक मजबूत हमास को दूसरे इंतेफादा के संघटक के रूप में टक्कर दे सके. और आज पिछले दो सालों से उसी हमास ने 7 अक्तूबर 2023 को कुछ इज़राइलियों को बंधक बनाने की बात को लेकर गाजा पट्टी पर लगातार हमले जारी हैं. रोज़ सैकड़ों गाजावासियों को मारा जा रहा है और आधा से अधिक गाजापट्टी ध्वस्त कर दिया और अबतक एक लाख के आसपास फिलिस्तीनियों की मौत हो गई है, जिसमें आधी संख्या बच्चों की है. और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक तरफ शांति के नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के लिए दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुखों को नोबल पुरस्कार देने के लिए नॉमिनेशन करने के लिए तथाकथित शांति समझौते करने की हरकतें करते करते इज़राइल पिछले दो सालों से लगातार हमले कर रहा है और गाजावासियों को अन्न पानी तथा दवाईयों की सप्लाई को रोकते हुए बम गिरा रहा है, बंदूक तथा तोपों से गोलियां बरसाने की हरकतें करते हुए ट्रंप उसे रोकने की जगह गाजावासियों को गाजापट्टी खाली करने के लिए कह रहा है और बेशर्मी से बोल रहा है कि मुझे मेरे परिवार के ट्रंप कन्स्ट्रक्शन के तरफ से सिरिसॉर्ट बनाना है.

मिस्र में, नासिर की मौत के बाद अनवर सादात राजनीतिक इस्लाम के एक मुक्ति दाता के रूप में सामने आये. 1971 से 1975 के बीच में, अनवर सादात ने इस्लाम समर्थकों को जेल से आजाद किया, जो बरसों से जेल में थे. इतना ही नहीं उन्हें पहली बार यह आजादी मिली कि वे अपने विचार खुलकर लोगों के सामने रखें, और स्वयं को संगठित करें. यह अलग बात है कि, उनका समर्थन इज़राइली तथा अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियां कर रही थीं. और इस तरह के पागलपन तथा स्वार्थ से भरी कार्रवाइयों का अप्रत्याशित नतीजा किस तरह मुसीबत बन सकता है ?

काबुल में सोवियत समर्थक सरकार के विरोधियों को गुप्त अमेरिकी सहायता उस वक्त मिलना आरंभ हो गई थी जब सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान पर हमला भी नहीं किया था. तेहरान में अमेरिकी दूतावास को बंधक बनाए जाने के दौरान सीआईए तथा विदेश विभाग के जो दस्तावेज हाथ लगे थे, उनसे यह बात उजागर हुई, कि अमेरिका ने अफगानी विद्रोही नेताओं के साथ पाकिस्तान में अप्रैल 1979 में गुप्त बैठकें आरंभ कर दिया था. यह घटना सोवियत सेनाओं के अफगानिस्तान में घुसने के आठ महीने पहले घटी. इसकी पुष्टि जिगनवि ब्रेंजेंज्की द्वारा की गई, जो राष्ट्रपति कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे. उन्होंने पेरिस के एक अखबार ल नुवेल ऑब्जरवेटर (जनवरी 15-20,1998 ) को दिए, साक्षात्कार में इसका खुलासा किया था. साक्षात्कार का सवाल और जवाब कुछ इस तरह था

प्रश्न-पूर्व निर्देशक सीआईए रॉबर्ट गेट्स ने अपने संस्मरण में लिखा है “कि (फ्राम द शैडोज ) अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों ने अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के घुसने के छ महीने पहले से ही मुजाहिद्दीन को सहायता पहुंचाना आरंभ कर दिया था. इस दौरान आप राष्ट्रपति कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे. इस प्रकार आपने इस मामले में एक अहम भूमिका निभाई थी. क्या यह सही है ?

ब्रेंजेंज्की- इतिहास में दर्ज सरकारी बयान के अनुसार तो सीआईए द्वारा मुजाहिदीन को दी जाने वाली सहायता 1980 से आरंभ हुई थी. यानी सोवियत सेनाओं ने 24 दिसंबर, 1979 को अफगानिस्तान पर हमला किया. उसके काफी बाद से, लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट है. वास्तव में 3 जुलाई 1979 को राष्ट्रपति कार्टर ने पहले आदेश पर हस्ताक्षर किए. जिसके तहत काबुल में कम्युनिस्ट सरकार के विरोधियों को सहायता पहुंचाने का प्रावधान था. और उसी दिन मैंने राष्ट्रपति कार्टर को लिखकर यह स्पष्ट किया “कि हमारी यह सहायता सैनिक हस्तक्षेप की राह मुश्किल करेगी.

कार्टर से लेकर रीगन के समय तक अमेरिकी विदेश नीति में काफी बदलाव आया था. अब यह कॉन्टोनमेंट से रोल-बॅक की तरफ पलट रहे थे. अफगानिस्तान में निकारागुआ की तरह ही कार्टर प्रशासन ने दो तरह के रास्तों को अपनाना उचित समझा. कम्युनिस्ट विरोधियों को उदार स्तर का गुप्त समर्थन दिया जाए. चाहे वह कोई हुकूमत हो या समूह. इसके साथ ही बातचीत के जरिए भी समाधान की कोशिशें जारी रहें.

कॉन्टोनमेंट यानी साथ मिलकर, इस अर्थ में, सहअस्तित्व की तलाश के रूप में संकेतित था. इसके विपरीत, रीगन प्रशासन को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि समझौते के तहत कोई राह निकाली जाए. सहअस्तित्व के बजाय, रीगन नीति का केंद्रीय बिंदु पे-बैंक थाः यानी हर वह काम किया जाए जो अफगान युद्ध को सोवियत संघ के लिए विएतनाम बना दे. मकसद एक ही था “कि सोवियत संघ को हर हाल में परास्त किया जाए.”

सीआईए इस बात के लिये दृढ संकल्प के साथ था “कि अफगानिस्तान में असल उद्देश्य के रास्ते में कोई बाधा नहीं आने पाए.” यानी रूसियों को मारना ही इनका मुख्य उद्देश्य था.

रीगन के सहायक रक्षा सचिव रिचर्ड पर्ल, वाशिंगटन के ऊंची पहुंच वाले हत्यारों में से एक थे. उन्हें जॉर्ज डब्ल्यू बुश के शासनकाल में अधिक जिम्मेदारी सौंपी गई, विशेष रूप से 9/11 की घटना के बाद.

यदि रीगन प्रशासन सोवियत संघ के खिलाफ कट्टर विचारधारा वाले समूहों से पहले मिला हुआ था. तथा समझौतापरक समाधान में उसकी कोई रूचि नहीं थी, तो वहीं क्रम से आए पाकिस्तानी सरकारों के लिए अफगान राष्ट्रीयता अविश्वास की बात थी. यह अधिक तब स्पष्ट हुआ जब अफगान राजा, जहीर शाह को उनके भतीजे तथा पूर्व प्रधानमंत्री, मो. दाऊद ने जुलाई 1973 में देश छोडने के लिए मजबूर कर दिया था.

दाऊद ने सेना के रिपब्लिकन एलायंस को कम्युनिस्ट पार्टी के एक विंग के साथ जोड़ दिया. जिसका नामकरण उसने अपने अखबार परचम के नाम पर कर दिया था.

नई राष्ट्रवादी सरकार ने पश्तूनिस्तान का लोकप्रिय मसला उठाया. और अफगानिस्तान की आधी आबादी पश्तूनिस्तान और पाकिस्तान के नार्थ ईस्ट फ्रंटियर में भी लाखों पश्तून रह रहे हैं. और इसलिए पाकिस्तान सरकार को खुली छूट दे दी. “कि वह अफगानिस्तान के गैरराष्ट्रवादी ताकतों की मदद करे. और इस मामले में जियाउल हक को भी खूब मौका मिला.

सौर क्रांति क्या है

दाऊद की सत्ता के खिलाफ बढ़ रहे जनविरोध के कारण एक और सैनिक तख्ता पलट की घटना सामने आई. जिसे सौर क्रांति के नाम से जाना जाता है. जिसने कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों अंगों परचम और खल्क को सत्ता में एक साथ ला दिया. 17 अप्रैल, 1978 की इस क्रांति के साथ, कम्यूनिस्टों का अंतर्राष्ट्रीयकरण सरकारी तौर पर प्रतिष्ठा का पात्र हो गया. तथा इस्लामवादियों के अंतरराष्ट्रीयकरण को विध्वंसक करार दे दिया गया. उदारवादी तथा कट्टरपंथी इस्लामी प्रतिक्रियावादी काबुल विश्वविद्यालय छोड़कर पाकिस्तान चले गए, जहां उनका जबरदस्त स्वागत हुआ.

1978 के कम्युनिस्ट बिखराव ने पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी नीति में निर्णयात्मक बदल हुआ. कार्टर प्रशासन ने 1977 में पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कमी कर दी थी. इसका कारण यह बताया गया था “कि पाकिस्तान का मानवाधिकार का रिकॉर्ड बहुत खराब है. एक तो सेना द्वारा एक निर्वाचित प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की संवैधानिक हत्या का षडयंत्र रचा गया-तथा दूसरे इसके बढ़ते परमाणु कार्यक्रम का विश्व स्तर पर प्रभाव बढ़ने लगा था.

लेकिन सत्ता पलट, तथा अफगानिस्तान में सोवियत हमले ने सब कुछ बदल दिया. वास्तव में सोवियत हमले के कुछ दिनों बाद ही, कार्टर ने जिया उल हक को फोन पर यह पेशकश की थी कि यदि वह कम्यूनिस्टों के खिलाफ विद्रोहियों की मदद करते हैं, तो अमेरिका उन्हें एक करोड़ डॉलर की आर्थिक तथा सैनिक सहायता देगा. लेकिन जिया की मांग ज्यादा थी. इसलिए जिया-कार्टर दोस्ती परवान नहीं चढ़ सकी. दोनों देशों के बीच संबंधों में गर्माहट रीगन प्रशासन के काल में आई, जब पाकिस्तान को एक बडी आर्थिक और सैनिक सहायता की पेशकश की गई. और इस तरह अमेरिकी सहायता पाने वाले देशों में पाकिस्तान तीसरे स्थान का मुल्क हो गया. यानी इज़राइल और मिस्र के बाद.

रीगन के राष्ट्रपतित्व के काल में ही अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए तथा पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी का करीबी रिश्ता बना. और दोनों एजेंसियों ने साझे रूप से सोवियत शक्तियों के साथ निपटने के लिए मुजाहिद्दीनों को अधिक से अधिक शस्त्र पहुंचाना, और कम्युनिस्ट विरोधियों को इस्लामिक आतंकवादियों की भर्ती करने के लिए. और यहीं से संगठित रूप से आतंकवादी संगठन के लिए उर्वरक भूमि पैदा करने के लिए, सिर्फ मुस्लिम मुल्कों से ही नहीं, तो अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों से भी इस्लामिक आतंकवादी पाकिस्तान के विभिन्न मदरसों में आकर ट्रेनिंग ली, जिसमें एक बहुत ही मशहूर उदाहरण शेख अब्दुल्ला अज्जाम का है. जिसे लॉरेंस राइट नाम के पत्रकार ने अस्सी के दशक में द न्यूयार्कर में जेहाद के चौकीदार का खिताब दिया था.य ह फिलीस्तीनी धर्मशास्त्री था और उसने अल-अजहर विश्वविद्यालय से इस्लामी कानून में पीएचडी की थी. उसके बाद जेद्दाह के किंग अब्दुल अजीज विश्वविद्यालय में पढाने के लिए नियुक्त हुआ था. और उसके शागिर्दों में ‘ओसामा बिन लादेन’ भी था.

अज्जाम ने सीआईए के संरक्षण में सारी दुनिया का दौरा किया. उसने सऊदी टेलिविजन में, और अमेरिका में हुईं रैलियों में वक्ता के रूप में भाग लिया. और धर्मयोद्धा के रूप में सीआईए की पूंजी थे. और धर्मयोद्धाओं की भर्ती के लिए अस्सी के दशक में अमेरिका के हर भाग में यात्राएं करते रहे. और अफगानिस्तान की लड़ाई के लिए लड़ाकों की भर्ती करते रहे.

अज्जाम ‘हमास’ के संस्थापकों में से एक थे. अज्जाम का संदेश स्पष्ट था: जेहाद में शिरकत न केवल आज वैश्विक जिम्मेदारी है, बल्कि यह मजहबी दायित्व भी है. इस जेहाद का मतलब सिर्फ दुश्मनों को यानी रूसियों को मारना ही नहीं है, बल्कि शहादत प्राप्ति के बाद का जन्नत का सफर करना है. जहाँ पर 72 कुँवारी बेहद खूबसूरत लडकियां, आपके स्वागत के लिए तैयार खड़ी हैं.

अज्जाम का जेहाद का फार्मूला बहुत ही आसान था कि कोई बातचीत नहीं, कोई कांफ्रेंस नहीं, कोई वार्तालाप नहीं सिर्फ और सिर्फ बंदूक ही उसका जवाब था. और यह फार्मूला बड़े कारगर तरीके से आईएसआईएस और सीआईए के साझे उद्देश्य को ध्वनित करता था.

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने, अफगान जेहाद को संगठित किया था. तथा उसके प्रमुख उद्देश्य को इस प्रकार उजागर किया:, धर्मयुद्ध के द्वारा, एक अरब मुसलमानों को एक सूत्र में जोड़ना.

सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान की भूमि पर ईसाई धर्मयुद्ध (क्रूसेड) जेहाद की बनिस्बत क्रूसेड उस बौद्धिक दायरे को अधिक उजागर करता है, जिसके तहत ये कार्रवाईयां की जाती थीं. एक दूसरा उद्देश्य यह था, कि दो इस्लामी संप्रदाय (शिया और सुन्नी) के बीच और दूरी को बढ़ावा दिया जाए. अफगानी जेहाद असल में अमेरिकी जेहाद था. लेकिन यह चरमोत्कर्ष पर पहुंचा रीगन दोबारा सत्ता में आए तब, मार्च 1985 में.

रीगन ने नैशनल सिक्योरिटी डिसीजन डायरेक्टीव 166 पर हस्ताक्षर किया. इसमें यह अधिकार मिल गया था, “कि मुजाहिद्दीन को गुप्त रूप से मिलने वाली सहायता में इजाफा किया जाए.” नए रूप से परिभाषित किए गए, युद्ध की पूरी जिम्मेदारी सीआईए प्रमुख विलियम केसी को सौंपी गई. जिसने 1986 में तीन महत्वपूर्ण कदम उठाएं. पहला यह कि कांग्रेस को इस बात के लिए सहमत किया जाए, कि अमेरिकी तेज मारक क्षमता वाली विमान भेदी मिसाइलें उपलब्ध कराई जाएगी. और अफगानिस्तान के आगे तजाकिस्तान, उजबेकिस्तान जैसे मुस्लिम आबादी वाले सोवियत गणराज्यों में गोरिल्ला युद्ध का विस्तार किया जाए. और तीसरा पूरी दुनिया के प्रतिक्रियावादी इस्लाम को मानने वाले लोगों को भर्ती कर के, पाकिस्तान में लाया जाए. और सैनिक प्रशिक्षण देकर, दूसरे तथा तीसरी दुनिया भर के काफिरों के खिलाफ एक धर्मयुद्ध के रूप में उग्र किया जाए.

और यह फार्मूला अफगानिस्तान में निकारागुआ से भी ज्यादा अर्थों में गंभीर रूप लिया. युद्ध के घेरे में पूरी दुनिया की इस्लामी जनता थी. तो ISIS, अल-कायदा, और तालिबान, बोको हराम यह उसी की पैदाइश हैं.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने अफगानिस्तान पर तालिबान के दोबारा सत्ता आने को लेकर कहा था कि गुलामी से मुक्त करने वाले आजादी के सिपाही हैं. यह वही पाकिस्तान है, जिसके सभी पूर्वी शासकों ने कमअधिक प्रमाण में सभी तरह के आतंकवादी संगठनों को पनपने का मौका दिया है. जिसमें इमरान खान भी अपवाद नहीं हैं. और अब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर खुलकर आए दिन भारत के खिलाफ नफरत फैलाते हुए भारत में आतंकवादियों के द्वारा पहलगाम से लेकर पुलवामा तक की घटनाओं को अंजाम देने के बावजूद भी अमेरिका उसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से भी ज्यादा का दर्जा देते हुए दो महीने में दो बार उसे अमेरिका में सम्मान से बुलाया गया है. मुझे आश्चर्य नहीं होगा कि शाहबाज शरीफ की जगह अमेरिका की इस तरह की एक सेना के आदमी को बार-बार बुलाने के बाद वह पाकिस्तान में पुनः सेना का शासन लगा सकता है.

जिया से लेकर मुशर्रफ, और जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर इमरान खान भले तथाकथित चुनकर आने का दावा करते होंगे पर पाकिस्तान के अठहत्तर साल के इतिहास का कोई भी चुनाव फ्री एण्ड फेअर नहीं होने के कारण. सभी प्रधानमंत्री आईएसआई और पाकिस्तान की सेना के आगे, कुछ भी करने का आत्मविश्वास नहीं रख सकते हैं. और इसीलिये उनके एक भी निर्णय स्वतंत्र नहीं होते हैं. वर्तमान प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ भी. फील्डमार्शल आसिम मुनीर के सामने कमजोर लग रहे हैं. और डोनल्ड ट्रंप उसे जिस तरह से पुचकार रहे हैं. शायद जल्द ही वह पाकिस्तान को पुनः सेना के शासन में करने के आसार नजर आ रहे हैं.

और तालिबान को तो जन्म देने के लिए आईएसआई ने सीआईए के संरक्षण में सारी भूमिका अदा की है. यह बात मुशर्रफ ने खुद अपनी आत्मकथा ‘इन द लाइन ऑफ फायर ए,मेमोयर’ फ्री प्रेस अमेरिका से प्रकाशित की है. और साढ़े तीन सौ पन्नों में, पांचवें प्रकरण में 199 से 275 तक यानी लगभग 76 पन्ने, सिर्फ “द वॉर ऑन टेरर” के नाम से जो लिखा है. वह पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों में क्या भूमिका रही है ? यह साफ तौर पर लिखा है. और वह खुद आतंकवादियों के हमलों से, तीन बार बाल-बाल बचे हैं.

अफगान जेहाद को संगठित करने के लिए, पैसे की कमी को, ड्रग के व्यापार से पूरा करने की कोशिश की है. और इसे सीआईए के अधीन, संगठित तथा केंद्रीकृत रूप से चलाया गया. जैसे-जैसे मुजाहिद्दीनों ने अफगानिस्तान की भूमि पर कब्ज़ा जमाना शुरु किया, उन्होंने क्रांतिकारी टैक्स के तौर पर किसानों को अफीम उगाने के लिए आव्हान किया. उसका परिणाम यह निकला कि अफीम की कीमत गेहूं के मुकाबले पाँच गुना बढ़ गई. इसके अलावा वहां ड्रग्स तैयार करने के लिए कारखानों की कमी नहीं थी. सीमापार पाकिस्तान में, अफगान नेताओं, तथा स्थानीय व्यापारियों द्वारा आईएसआई के संरक्षण में सैकड़ों प्रयोगशालाएं चलाई जा रही थीं. 1988′ द नेशन’ में लॉरेंस लिफ्शुल्स ने इस बात को चिन्हित किया है. कि “वो हेरोइन के कारखाने, जो नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रांत में स्थित थे. उन्हें जनरल जिया ऊल हक के करीबी, जनरल फजल हक के संरक्षण में चलाया जा रहा था.

और सबसे अहम बात, इस नशीले पदार्थों के ट्रांसपोर्ट के लिए, पाकिस्तानी सेना के नेशनल लोजेस्टीक सेल द्वारा की जा रही थी. इन्हीं ट्रकों में सीआईए द्वारा दिए गए हथियारों को कराची तक पहुंचाया जाता था. और उसके साथ हेरोइन भी. आईएसआई के कागजात की वजह से इन ट्रकों को पुलिस चेक नहीं करतीं थीं.

पाकिस्तान के अखबार ‘द हेराल्ड’ ने सितंबर 1985 में एक खबर प्रकाशित की थी. “कि नशीले पदार्थों को नेशनल लोजेस्टीक सेल द्वारा, ( एन. एल. सी. ) सीलबंद करके, अपने ट्रकों से ढोया जाता है. और उनकी पुलिस द्वारा तलाशी नहीं ली जाती है. और यह काम पिछले तीन-साढे तीन साल से बेरोक-टोक चल रहा है. अंततः सीआईए ने इसे कानूनी संरक्षण दिया. अन्यथा इस अवैध व्यापार में इतनी वृद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती थी. इस दशक में, खुले ड्रग व्यापार के दौरान इस्लामाबाद का, अमेरिकी ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन किसी बडी खेप को पकड़ने में, तथा व्यापारियों को कैदी बनाने में नाकाम रहा. अमेरिकी अधिकारियों ने अफगानियों द्वारा नशीले पदार्थों के कारोबार के आरोप को इसलिये खारिज कर दिया कि, “वह सोवियत संघ के खिलाफ चल रहे, युद्ध में कारगर साबित हो सकें.

अफगान जेहाद के पहले, अफगानिस्तान में हेरोइन की पैदाइश नहीं होती थी. वहां अफीम की खेती होती थी. जिसे वहां के गाँव के छोटे तथा क्षेत्रीय बाजारों में बेचा जाता था. अफगान जेहाद समाप्त होने तक, तस्वीर नाटकीय रूप से बदल गई थी. पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमावर्ती क्षेत्र अफीम तथा हेरोइन की पैदावार का बडा केंद्र बन गया. वहां विश्व के 75% अफीम की पैदावार होने लगी थी. जिसकी कीमत कई बिलियन डॉलर जाकर ठहरती थी. 2001 के आरंभ में जारी एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि युनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल ड्रग कंट्रोल प्रोग्राम ने 1979 के आसपास अफगान अफीम की पैदावार में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की.

इसी साल अमेरिकी प्रायोजित जेहाद की शुरुआत हुई थी. 1979 से बना अवैध नशीले पदार्थों के व्यापार आज भी जारी है. और 1980 मे जिस क्षेत्र में सिर्फ 5% अफीम की पैदावार होती थी, वहीं दस साल के भी पहले 71% पहुंच गया. वही अफगानिस्तान के भविष्य में बर्मा जैसा साम्य दिखाई देता है. यह एक दुसरा पहाड़ी क्षेत्र था, जो शीत युद्ध के प्रारंभ में सीआईए का हस्तक्षेप का शिकार बना था.

सीआईए ने शैन स्टेट में राष्ट्रवादी चीनी सैनिकों को सहायता देने के लिए 1950 मे बर्मा में अफीम की पैदावार को बढावा देने का काम किया.

अलफ्रेड मकौय के निष्कर्ष के अनुसार, इस तरह के एजंसी सीआईए की गतिविधियों से मुजाहिद्दीन गोरिल्लाओं को पैदा करने के लिए 1980 में अफगानिस्तान में अफीम की पैदावार को विस्तार दिया. तथा पाकिस्तान के अंदर स्थित हेरोइन की प्रयोगशालाओं को विश्व बाजार से जोड़ दिया है.

हेरोइन आधारित अर्थव्यवस्था ने, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को दूषित कर दिया है. और इसकी राष्ट्रपति रीगन ने ये मुजाहिद्दीन नैतिक तौर पर अमेरिका के संस्थापकों के बराबर हैं, इस जुमले ने और प्रतिष्ठा देने का काम किया.

सबसे बुरा उदाहरण, गुलबुद्दीन हिकमतयार का था. जिसने सीआईए द्वारा दिए गए, आधे गुप्त स्रोतों को प्राप्त किया. जिसकी दस सालों में कुल कीमत दो बिलियन डॉलर थी. उसने तेजी से अफगान मुजाहिद्दीन पर अपना वर्चस्व स्थापित करना शुरू कर दिया था.

भले नौ ग्यारह के बाद अमेरिका ने यू टर्न लेते हुए, पाकिस्तान को डरा-धमकाकर यह खुद तत्कालीन पाकिस्तान के प्रमुख जनरल मुशर्रफ ने खुद अपनी आत्मकथा’ इन द लाइन ऑफ फायर ए मेमोयर’ में लिखा है. “कि किस तरह से तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल ने फोन पर, धमकी भरे लहजे में कहा था. कि आप हमारे साथ हो या नहीं ?” 9/11 की घटना के तुरंत बाद ही. पाकिस्तान को भारत से अलग होकर आज अठहत्तर साल हो रहे हैं. और पाकिस्तान की आईएसआई और पाकिस्तान की सेना का भारत द्वेष का एकमात्र अजेंडा के कारण पाकिस्तान की प्रगति नहीं के बराबर है. और अमेरिकी कुबडीयो के भरोसे चलनेवाली पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था, इस तरह के बयानबाजी, या यह भी कोई सोची समझी रणनीति के तहत, आईएसआई के इशारों पर होने की संभावना है. क्योंकि अमेरिकी सैनिकों को एक न एक दिन अफगानिस्तान से निकलना तो था. और तालिबान के ऊपर मैंने अपने संपूर्ण लेख में अमेरिका की कम्यूनिस्ट विरोध के कारण अल कायदा से लेकर तालिबान को तैयार करने के लिए क्या भूमिका रही है ? और इसके लिए पाकिस्तान की मदद से 83 हजार डॉलर का खर्चा करके इस राक्षस का निर्माण किया है. तो क्या अमेरिका अफगानिस्तान को सिर्फ तालिबान के हवाले कर के चुपचाप बैठा रहेगा ? और चीन और रशियाके भरोसे अफगानिस्तान को छोड़ने की संभावना मुझे तो बिलकुल भी नहीं लगती है. हो सकता पाकिस्तान का उपयोग इसी के लिए कर रहा होगा. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कायम दुश्मन या दोस्ती नाम की कोई भी बात कभी भी नहीं होती है.

स्रोत - (1)Mahmood Mamdani,a Good Muslim Bad Muslim . Permanent Black,(2) Ahmed Rashid,s, Descent in to Chaos, publish Penguin books, (3),Inside Global Network of Terror Al Qaeda ,Rohan Gunaratna Publish by Roli Books,( 4 ), Parvez Musharraf’s ,In the Line of Fire A Memoir publish by, Free Press,(5)Mohammed Hanif,s, A case of Exploding Mangoes publish by Random house India

डॉ. सुरेश खैरनार,

10 सितम्बर 2025 ,नागपुर.