अमेरिकी तानाशाही को चुनौती: वेनेज़ुएला मुद्दे पर इंदौर में गूंजा प्रतिरोध
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के विरोध में इंदौर में वामपंथी व लोकतांत्रिक संगठनों का प्रदर्शन, ट्रम्प की दादागिरी के ख़िलाफ़ भारत से मुखर भूमिका की माँग।

Leftist and democratic organizations protested in Indore against US actions in Venezuela, demanding a strong stance from India against Trump's bullying tactics.
वेनेज़ुएला पर अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ सड़कों पर उतरा इंदौर, भारत से निर्णायक भूमिका की माँग
- ताक़तवर के सौ खून माफ़ नहीं: वेनेज़ुएला पर हमले के विरोध में इंदौर का आक्रोश
- नेज़ुएला संकट पर इंदौर में प्रदर्शन, ट्रम्प की कार्रवाई को बताया अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन
- अमेरिकी राष्ट्रपति के कदम के खिलाफ ज्ञापन, भारत से वेनेज़ुएला के समर्थन की माँग
- वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कार्रवाई के विरोध में वामपंथी संगठनों का संयुक्त प्रदर्शन
- वेनेज़ुएला पर हमला असभ्य गुंडागिरी की निशानी
- अमेरिकी तानाशाही का विरोध करना भारत का अनिवार्य कर्त्तव्य
- वेनेज़ुएला पर हमला: अंतरराष्ट्रीय कानूनों की खुली अवहेलना
- इंदौर में वामपंथी और लोकतांत्रिक संगठनों का संयुक्त प्रतिरोध
- अमेरिकी तेल-राजनीति और वैश्विक युद्धों का सच
भारत से अपेक्षा: संप्रभुता, स्वाभिमान और अंतरराष्ट्रीय न्याय की रक्षा
इंदौर, 13 जनवरी 2026 (विनीत तिवारी). अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अन्य देशों की संप्रभुता पर किये जा रहे हमले के खिलाफ़ अनेक वामपंथी एवं लोकतान्त्रिक संगठनों ने मिलकर 12 जनवरी 2026 की शाम कमिश्नर कार्यालय के सामने महात्मा गांधी मार्ग पर प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा।
प्रदर्शन के समय नारे लगाते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि “अमेरिका की तेल की प्यास के चलते अनेक देशों के लोगों का खून बहाया जा रहा है, यह हम नहीं होने देंगे।”
नारे लगे कि अमेरिकी दादागिरी और गुंडागिरी को और शोषण को रोका जाए। दिलचस्प पोस्टर और बैनर लोगों का ध्यान खींच रहे थे और आते-जाते लोग उन पर लिखी बातों से सहमति जताते दिखे।
राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन में कहा गया कि हाल में अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस ट्रम्प और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को उनके अपने देश वेनेज़ुएला की राजधानी करकस स्थित उनके निवास से अगुवा कर लिया है। इस कृत्य के लिए उन्होंने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति और वहाँ की प्रथम महिला पर जो ड्रग्स तस्करी के इलज़ाम लगाये हैं, वे न तो अभी तक प्रमाणित किये जा सके हैं, न ही अमेरिका को किसी भी स्थिति में यह अधिकार है कि वह अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक देश की सम्प्रभुता पर हमला करके वहाँ के राष्ट्र प्रमुख को पकड़ सके। अंतराष्ट्रीय स्तर पर दो देशों के बीच किसी भी विवाद के निपटारे के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ), इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (आईसीजे) और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) और अन्य संस्थाएँ मौजूद हैं। अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला पर की गयी यह कार्रवाई स्पष्टतया अंतरराष्ट्रीय नियमों और कानूनों का खुला उल्लंघन है।
ज्ञापन में आगे कहा गया कि अमेरिका के राजनीतिक नेतृत्व ने अपरिपक्व, दम्भी और ताक़त के नशे में मदांध जनविरोधी रुख अपनाते हुए उत्तरी कोरिया, रूस, चीन, ईरान, क्यूबा, मेक्सिको, कोलम्बिया सहित अन्यान्य देशों को भी धमकी दी है कि उन पर भी अमेरिकी कहर टूट सकता है। इसी सिलसिले में ट्रम्प महोदय की एक टिप्पणी ख़ासतौर पर भारत और भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सम्बोधित है जिसमें उन्होंने भारत के राजनीतिक नेतृत्व के प्रति बहुत ही चलताऊ और अपमानजनक टिप्पणी की है।
दुनिया में बढ़ते हुए युद्ध के हालात पर ज्ञापन में कहा गया कि इस बात को भी दुनिया अच्छे से जानती है कि रूस और यूक्रेन के दरम्यान जंग छेड़ने और नाटो के मसले के पीछे भी अमेरिकी षड्यंत्र है, और फ़लस्तीन के ग़ज़ा में जारी नरसंहार के पीछे भी इजरायल को हासिल अमेरिकी शह है। और अब अमेरिकी राष्ट्रपति एक सनकी की तरह व्यवहार करते हुए अपनी सनक में दुनिया को नाभिकीय युद्ध के मुहाने पर ला रहे हैं।
ज्ञापन में अंत में राष्ट्रपति महोदय द्रौपदी मुर्मू को संबोधित करते हुए कहा गया कि भारत की संवैधानिक प्रमुख होने के नाते हमारा आपसे निवेदन है कि आप भारत सरकार को निर्देशित करें कि भारत सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की गई टिप्पणी का माकूल जवाब दे और देश के स्वाभिमान की रक्षा करे। ज्ञापन में माँग की गई कि भारत सरकार वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी फ्लोरेस की ससम्मान अमेरिका से रिहाई की माँग करे। भारत सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा उठाये गए ऐसे क़दम की तीव्र आलोचना करनी चाहिए और और अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई की माँग करनी चाहिए। भारत सरकार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के युद्ध भड़काने और दूसरे देशों की संप्रभुता पर हमला करने वाले वक्तव्यों की निंदा करनी चाहिए, और भारत को दुनिया के विकासशील देशों के बीच एकता क़ायम करने की पहल करनी चाहिए ताकि कोई भी देश किसी अन्य देश की संप्रभुता पर हमला न बोले। ताकतवर के सौ खून माफ वाला कानून मानव सभ्यता में नहीं चलना चाहिए।
ज्ञापन के अंत में उक्त संगठनों की ओर से कहा गया कि हमारी सरकार को अमेरिका के नवउपनिवेशवादी रवैये के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान चलाना चाहिए। हमारी आज़ादी और हमारा लोकतंत्र उपनिवेशवाद ख़िलाफ़ संघर्ष की बुनियाद पर स्थापित हुआ है। ऐसे में हमें किसी भी तरह के उपनिवेशवाद, विस्तारवाद और अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवादी गुंडागिरी के ख़िलाफ़ मुखर होकर आवाज़ उठानी चाहिए। दूरगामी समय में यही भारत के लिए भी श्रेयस्कर होगा और मनुष्यता के लिए।
ज्ञापन देने वालों में प्रमुख रूप से प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी, राम आसरे पांडे, सीपीआई के चुन्नीलाल वाधवानी, असंगठित मज़दूर काँग्रेस के राहुल निहोरे, महेश गौहर, सीपीआई (एम) के सी एल सरावत, कैलाश लिम्बोदिया, भगीरथ कछवाय, छगन चौहान, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की डॉ जया मेहता, विवेक सिकरवार, मधुमिता, समाजवादी पार्टी के सैय्यद साजिद आदि मौजूद थे।
इससे पूर्व 8 जनवरी को इंदौर के रीगल चौराहे पर भी इन सभी संगठनों ने मिलकर प्रभावी प्रदर्शन किया था जहाँ एक बैनर सबका ध्यान खींच रहा था – भागीरथपुरा से वेनेज़ुएला तक, इंसाफ़ की लड़ाई एक है। वहीं गांधी प्रतिमा के सम्मुख साम्राज्यवाद की बुराई के प्रतीक के तौर पर डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर को भी जलाया था। वहाँ अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) और एसयूसीआई के अनेक कार्यकर्ता भी मौजूद थे।


