ईरान बनाम अमेरिका: बातचीत या युद्ध? पश्चिमी ‘सिविल लिबर्टीज़’ दावों की सच्चाई

  • मिडिल ईस्ट फिर विस्फोटक! ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच नया टकराव?
  • ईरान की ट्रंप को दो टूक- सिर्फ़ बातचीत के लिए ही नहीं, बल्कि युद्ध के लिए भी तैयार पुतिन की हुई एंट्री

Fresh unrest in Iran | A geopolitical game unfolding amidst US-Israel rhetoric?

नई दिल्ली, ३१ जनवरी २०२६. मिडिल ईस्ट एक बार फिर इतिहास के उसी मुहाने पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ हर बयान, हर सैन्य तैनाती और हर ‘कूटनीतिक पेशकश’ के पीछे छिपे इरादों को पढ़ना ज़रूरी हो जाता है। ईरान में आंतरिक अशांति, वॉशिंगटन और तेल अवीव से आती आक्रामक बयानबाज़ी, और पश्चिम द्वारा ‘सिविल लिबर्टीज़’ के समर्थन के दावों (Western claims of supporting 'civil liberties') के बीच यह सवाल तेज़ हो गया है कि क्या मानवाधिकारों की भाषा दरअसल जियोपॉलिटिकल दबाव का औज़ार बन चुकी है?

अमेरिका की रणनीति: बातचीत या दबाव?

दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि वह ईरान के नेताओं से संपर्क में हैं। यह दावा ऐसे समय पर आया है, जब अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी और मज़बूत की है। इतिहास गवाह है कि वॉशिंगटन की ‘बातचीत’ अक्सर सैन्य दबाव और प्रतिबंधों की छाया में होती है। यही कारण है कि इस दावे को तेहरान में संदेह की नज़र से देखा जा रहा है।

ईरान के विदेश मंत्री, अब्बास अराघची, शुक्रवार को वॉशिंगटन के लिए एक पक्का मैसेज लेकर तुर्की की राजधानी पहुंचे: तेहरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के बारे में डिप्लोमैटिक हल के लिए तैयार है, लेकिन वह दबाव में बातचीत नहीं करेगा, और न ही अगर अमेरिका ने फिर से गलत अंदाज़ा लगाया तो वह पूरी लड़ाई में शामिल होने से हिचकिचाएगा।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने तुर्की के राष्ट्रपति से मुलाकात की। बाद में एक प्रेस कान्फ्रेंस में तुर्की के विदेश मंत्री फिदान ने कहा:

हमें उम्मीद है कि ईरान के अंदरूनी मामले ईरानी लोग बिना किसी बाहरी दखल के शांति से सुलझा लेंगे।

तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय ने एक बयान जारी कर इस बात पर ज़ोर दिया कि अंकारा ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करने के लिए तैयार है। तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय का यह बयान क्षेत्रीय कूटनीति में तुर्की की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।

ईरान के विदेश मंत्री, अब्बास अराघची ने दो टूक शब्दों में कहा कि ईरान की मिसाइल क्षमता और डिफ़ेंस सिस्टम पर “कभी कोई बातचीत नहीं” होगी।

तुर्की में ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने प्रेस से कहा:

"मैं यह भी साफ़-साफ़ कहूँगा: ईरान की मिसाइलों और ईरान के डिफ़ेंस सिस्टम पर कभी कोई बातचीत नहीं होगी।"

उन्होंने कहा-

'हमारे पिछले अनुभवों ने लगातार दिखाया है कि यूनाइटेड स्टेट्स कभी भी वफ़ादार नहीं रहा है और उसने अच्छी नीयत से काम नहीं किया है।

ईरान सभी डिप्लोमैटिक प्रोसेस के लिए तैयार है।

यूनाइटेड स्टेट्स ने कई बिचौलियों के ज़रिए बार-बार हमसे बातचीत की रिक्वेस्ट की है और इन रिक्वेस्ट को दोहराता रहता है।

बातचीत शुरू करने के लिए धमकियां खत्म होनी चाहिए।'

उन्होंने साफ कहा- जैसे ईरान बातचीत के लिए तैयार है, वैसे ही वह युद्ध के लिए भी तैयार है, इज़राइल के साथ 12 दिन के युद्ध से भी ज़्यादा।

दूसरी तरफ एक बयान में, ईरान की कैबिनेट ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के बारे में यूरोपियन यूनियन के विदेश मंत्रियों के फैसले की निंदा की।

ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी, अली लारीजानी ने कहा: जिन देशों की सेनाओं ने IRGC के खिलाफ EU के हालिया प्रस्ताव में हिस्सा लिया था, उन्हें आतंकवादी माना जाएगा, इसलिए इसका नतीजा उन यूरोपीय देशों को भुगतना होगा जिन्होंने ऐसा कदम उठाया।

ईरानी संसद के स्पीकर कलीबाफ ने IRGC के खिलाफ यूरोपियन यूनियन की राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई की कड़ी निंदा की।

उधर ईरानी सेना के प्रवक्ता ने डोनाल्ड ट्रंप पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा: "ट्रंप के बावजूद, भविष्य का सही अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि वह एक नार्सिसिस्टिक और भ्रम में रहने वाला इंसान है जो अपनी बातें बदल देता है।

हम अलग-अलग युद्ध के हालात के लिए तैयार हैं, जिसके बारे में मुझे बताने की इजाज़त नहीं है।

उधर रूसी इंटरफैक्स न्यूज़ एजेंसी ने बताया कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ने रूस के प्रेसिडेंट व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की है।

युद्ध की चेतावनी: सिर्फ़ बयान नहीं

ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह सिर्फ़ बातचीत के लिए ही नहीं, बल्कि युद्ध के लिए भी तैयार है—

यहाँ तक कि इज़राइल के साथ हुए 12 दिनों के युद्ध से भी बड़े टकराव के लिए।

ईरान संकट केवल एक देश की आंतरिक अशांति या एक न्यूक्लियर विवाद भर नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था का प्रतिबिंब है, जहाँ मानवाधिकार और सिविल लिबर्टीज़ की भाषा अक्सर ताक़त की राजनीति के सामने बौनी पड़ जाती है।

सवाल यह नहीं कि ईरान में क्या हो रहा है—

सवाल यह है कि कौन, क्यों और किस हद तक इसमें दखल देना चाहता है।

अगर वाकई मध्य पूर्व में शांति चाहिए, तो अमेरिका और यूरोपीय यूनियन की धमकी और प्रतिबंध नहीं, बल्कि ईमानदार कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है।