इज़राइल के जन्म का इतिहास : यहूदियों का संघर्ष और ज़ायोनी आंदोलन
इज़राइल के जन्म का इतिहास, यहूदियों का प्राचीन धर्म, ज़ायोनीवाद, होलोकॉस्ट, बैल्फ़ोर घोषणा और फिलिस्तीन संघर्ष की गहराई से पड़ताल कर रहे हैं डॉ. सुरेश खैरनार...

यहूदियों का प्राचीन इतिहास और तोराह
- यूरोप में यहूदियों पर अत्याचार और होलोकॉस्ट
- ज़ायोनीवाद का उदय और थियोडोर हर्ज़ल की भूमिका
- ब्रिटेन, बैल्फ़ोर घोषणा और फिलिस्तीन का सवाल
- इज़राइल राष्ट्र की स्थापना और फिलिस्तीनियों का विस्थापन
- गाज़ा, वेस्ट बैंक और आधुनिक समय का संघर्ष
- अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की भूमिका
आज का इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद
इज़राइल के जन्म का इतिहास सिर्फ यहूदियों की कहानी नहीं, बल्कि विश्व राजनीति, धर्म और उपनिवेशवाद की पेचीदा यात्रा है। हजारों साल पुराने तोराह और यहूदी परंपराओं से लेकर यूरोप में हुए नरसंहार और होलोकॉस्ट तक, यहूदियों का संघर्ष लगातार जारी रहा। ज़ायोनी आंदोलन और थियोडोर हर्ज़ल के सपनों ने जब ब्रिटेन की बैल्फ़ोर घोषणा के साथ रूप लिया, तब फिलिस्तीन की जमीन पर एक नए राष्ट्र — इज़राइल — की नींव रखी गई। लेकिन इस जन्म की कीमत फिलिस्तीनियों के विस्थापन और आज तक जारी संघर्ष के रूप में चुकानी पड़ी। यह लेख इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद की जड़ों को समझने और आज के दौर के हालात को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास है।
यहूदियों वंश के लोगों का इतिहास बहुत पुराना है. ईसा के पूर्व, ताम्रयुग में पांच या छ हजार साल पहले का, दुनिया का पहला अब्राहमिक मोनोलिथिक, मोनोथेसिस और एथनिक अब्राहम के द्वारा स्थापित धर्म के रूप में जाना जाता है. यहूदियों के धर्म ग्रंथ को तोराह (Torah) बोला जाता है. तोराह, हिब्रू बाइबिल की पहली पाँच पुस्तकों से मिलकर बना है, जिनमें उत्पत्ति, निर्गमन, लैव्यव्यवस्था, गिनती और व्यवस्थाविवरण शामिल हैं। यहूदी मान्यताओं के अनुसार, तोराह को ईश्वर ने पैगंबर मूसा को सिनाई पर्वत पर दिया था, और यह यहूदी लोगों के लिए ईश्वर की शिक्षाओं और मार्गदर्शन का सार है।
तोराह का मतलब कानूनी शिक्षा. कोई तालमुद भी बोलता है. और कोई ओल्ड टेस्टामेंट जो हिब्रू में लिखा है, उसे भी धर्म ग्रंथों में शुमार करते हैं. और विश्व में पहला धर्म के रूप में स्थापना होने के बावजूद, आज संपूर्ण विश्व में कुल मिलाकर दो करोड़ से भी कम यहूदियों की संख्या है. और इतिहास के क्रम में कितनी बार इन धर्मावलंबियों को विस्थापन का शिकार होना पड़ा है. और सबसे महत्वपूर्ण बात इसी धर्म के संस्थापक अब्राहम के ही वंशजों में से एक 'क्रिस्चियन' (Christian) धर्म, आज से दो हजार पच्चीस (2025) और उसके बाद पंद्रह सौ साल पहले इस्लाम, और हेब्रिइझम (Hebraism) और 'हेलेकिझम' (Hellenism) की शाखाओं का जन्म हुआ है. मतलब इन सभी धर्मों को सेमेटिक धर्म बोला जाता है. सेमेटिक धर्मों में वे धर्म शामिल हैं जिनकी उत्पत्ति मध्य पूर्व में हुई है और जिनकी कुछ ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताएँ समान हैं। इन धर्मों का संबंध बाइबिल के पात्र नूह के पुत्र शेम से माना जाता है, इसलिए इन्हें सेमेटिक धर्म कहा जाता है।
लेकिन विश्व के स्थापित धर्मों में से सबसे पुराना धर्म होने के बावजूद भयंकर रक्तपात, और उस कारण पलायन,( जिसे अंग्रेजी में 'एक्साडस' बोला जाता है) का सिलसिला बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में यूरोपीय देशों में, तथा रूस और पोलैंड में, यहूदियों के साथ अत्याचार हुए हैं. और वह खत्म होने के पहले ही हिटलर ने 1930 जर्मनी के चांसलर बनने के बाद जो यहूदियों का नरसंहार नियोजित तरीके से किया, वह विश्व इतिहास का अब तक का सबसे घृणास्पद और अमानवीय था. और इस कारण यहूदियों की जनसंख्या आज बड़ी मुश्किल से संपूर्ण विश्व में डेढ़ से दो करोड़ के बीच है, जिसमें से एक करोड़ से भी कम इजराइल में गत सतहत्तर (77) सालों से रह हैं. जबरदस्ती आकर यहूदियों ने फिलिस्तीनियों के साथ वैसे ही बर्बरता करते हुए फिलिस्तीन में 1948 में अपने इज़राइल नाम से नए राष्ट्र की नींव तो डाली, लेकिन उसमें फिलिस्तीनियों के खून और मास तथा हड्डियों की कांक्रीट से वह नींव बनी है. और अब पिछले दो सालों से गाजा पट्टी में लगातार हमले करते हुए फिलिस्तीन का अस्तित्व मिटाने का काम किया जा रहा है.
सतहत्तर(77) सालों से यहूदियों ने फिलिस्तीनियों के अस्तित्व से लेकर उनकी जमीन दखल करते हुए 'फादर ऑफ मॉडर्न इजराइल' थियोडोर हर्ज़ल (Theodor Herzl) के अनुसार स्थानीय लोगों को साम- दाम - दंड के द्वारा खदेड़ने की वजह से, आज फिलिस्तीन का अस्तित्व, एक राई के दाने के आकार का हो गया है.
और आने वाले 7 अक्तूबर को दो वर्ष होने जा रहे हैं. गाजा पट्टी में हमास की आड़ में गाजा का अस्तित्व खत्म करने के लिए, अमेरिका की मदद से युद्ध जारी है. जिसमें एक लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई और सबसे हैरानी की बात इन मृतकों में पंद्रह साल के बच्चों की संख्या सब से अधिक है. गाजा पट्टी की जनसंख्या (Population of the Gaza Strip) 23 लाख थी, लेकिन इज़राइल ने आधे से अधिक गाजापट्टी को ध्वस्त कर दिया है. इसलिए गाजापट्टी की सबसे बड़ी आबादी विस्थापित होकर खुले आसमान के नीचे रहने के लिए मजबूर हो गई है. पानी तथा बिजली तथा दवा और अन्न के अभाव रह रहे हैं.
आज का मुख्य मुद्दा है, यहूदियों के बारह सौ वर्ष के अंतराल के बाद अपना स्वतंत्र देश होना चाहिए ऐसी कल्पना को 'ज़ायोनीवाद (Zionism)' बोला जाता है. इसकी मुख्य वजह कई सारे यूरोपीय देशों से यहूदियों को निकाल बाहर करने की वजह से यहूदियों में से कुछ लोगों को लगने लगा कि, हमारा अपना देश होना चाहिए.
क्योंकि शुरू में रूस फिर बाद में पूर्व यूरोपीय देशों के बाद जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ हिंसक घटनाओं के साथ भयंकर अत्याचार किए गए. उन्नीसवीं शताब्दी के शुरु में यहूदियों की आबादी 25-30 लाख के आसपास थी, उसमें से 90% यहूदी यूरोपीय देशों में रह रहे थे. और फिलिस्तीन में सिर्फ पांच हजार यहूदियों की आबादी थी. तब फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या ढाई से तीन लाख थी, जिसमें सबसे बड़ी संख्या में सुन्नी मुस्लिम समुदाय के लोग थे. और बचे हुए 25-30 हजार क्रिस्चियन लोग थे.
1882 में ज़ायोनी विचारों की नींव लिओ पिन्स्कर की किताब 'ऑटोइमैनसिपेशन' (Autoemancipation), 1882 में प्रकाशित हुई, जो आधुनिक ज़ायोनीवाद के सबसे महत्वपूर्ण संस्थापक दस्तावेजों में से एक मानी जाती है, ने भूमिका तैयार करने का सबसे महत्वपूर्ण प्रयास किया. पिन्स्कर एक रूसी यहूदी डॉक्टर और कार्यकर्ता थे, जिन्होंने यहूदी लोगों के लिए एक अलग राष्ट्र की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। क्योंकि यूरोपीय देशों में मुख्य प्रवाह में शामिल करने के, सभी प्रयास किए गए, लेकिन वह सफल नहीं हो सकते, ऐसी लिओ पिन्स्कर की पक्की धारणा बन चुकी थी. और इसीलिये यहूदियों का अपना अलग देश होने का आग्रह था, लेकिन उसने फिलिस्तीन की भूमि पर ही अपना राष्ट्र होना चाहिए यह कभी भी नहीं कहा. लेकिन यहूदियों ने अपनी मातृभूमि की तरफ चलना चाहिए, ऐसा संकेत जरूर दिया था. और उसके इस तर्क से रूस में रह रहे यहूदियों के युवाओं को काफी प्रभावित किया था. और 1890 के दशक में जियोनिस्ट विचारों का प्रभाव बढ़ा है. क्योंकि तब तक यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं था, कि कौन सी जगह पर यहूदियों का राष्ट्र बनेगा ?
क्योंकि फिलिस्तीन की जमीन खेती तथा अन्य उद्योगों के लिए प्रतिकूल होगी, और वहां का जीवन बहुत कठिन कष्टों से भरा हुआ हो सकता है, इसलिए फिलिस्तीन में नहीं करते हुए, कहीं अन्य क्षेत्रों में करने का विचार चल रहा था. और इसीलिए 1890 में दस लाख रशियन यहूदियों की बस्ती को, अर्जेंटीना में खड़ा करने का प्रयास शुरू किया गया. इसके लिए बैरन मॉरिस डी हिर्श (Baron Maurice de Hirsch) (1831–1896) नाम के यहूदी उद्योगपति ने चार करोड़ डॉलर का निवेश करने के संकल्प की घोषणा की. और इस योजना को शुरू करने के पांच दशकों में सिर्फ 45 हजार यहूदी जनसंख्या थी, जो यूरोपीय देशों के अत्याचारों से तंग आकर 1950 में यह संख्या 4 लाख तक पहुंची थी. लेकिन उसके बावजूद वहां पर यहूदियों के अलग देश बनने की कल्पना समाप्त हो गई थी.
पिन्स्कर के बाद झिओनिस्ट विचारों को सबसे अधिक ताकत से ऑस्ट्रियन पत्रकार थिओडोर हर्झल (1860 - 1904 ) ने 1896 के दौरान हिब्रू भाषा में (Der Judenstaat) और अंग्रेजी भाषा में 'द जूइश स्टेट' शीर्षक किताब में, झियोनिझम की संकल्पना को, और अधिक मजबूत करने का प्रयास किया.
Why did Theodor Herzl want to create the Jewish homeland in Uganda or South America, but traditionalist Jews required the homeland to be created in present-day Israel, against his original idea?
हर्झल ने विएना विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की थी, और पत्रकारिता के क्षेत्र में पश्चिमी यूरोपियन देशों में घूमने का मौका मिलने की वजह से, उसने देखा कि सभी जगहों पर यहूदियों के खिलाफ माहौल है. और सिर्फ कानून बनाने से वह कम नहीं होंगे. ऐसी उसकी धारण बनी. इसीलिये उसने यहूदी लोगों के 'राष्ट्रवाद और धर्म' इन दोनों मुद्दों पर, अपनी किताब में यहूदी लोगों को अपना खुद का देश बनाने का स्पष्ट आवाहन किया. और झियोनिझम को लेकर चल रहे अलग - अलग आंदोलनों को, इकट्ठा होने के लिए माहौल पैदा किया. और अब झियोनिझम का सवाल स्थानीय स्तर से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आने के लिए मददगार साबित हुआ. और सबसे आश्चर्य की बात थिओडोर हर्झल ने भी यहूदियों का देश कहां होगा, यह बात कहीं नहीं लिखा है. फिलिस्तीन की भूमि पर होने का उल्लेख न करते हुए उसने अर्जेंटीना और अमेरिका के पश्चिम भाग जैसे पर्यायों का सुझाव दिया था. और यह जगह फिलिस्तीन की तुलना में ज्यादा समृद्ध और प्रगतिशील थी. लेकिन इसके बावजूद उसने सोचा कि "फिलिस्तीन का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व ध्यान में रखते हुए, विश्व भर में फैले हुए यहूदियों को ज्यादा आकर्षित करेगी." और सचमुच ही थिओडोर हर्झल की कल्पना की वजह से यूरोपीय देशों में रह रहे यहूदी, जो निराशा और दिशाहीनता की वजह से ग्रस्त हो चुके थे, उन्हें फिलिस्तीन की कल्पना से प्रभावित होकर उन्हें एक निश्चित दिशा मिल गई.
और अगले वर्ष स्विट्ज़रलैंड के बाझल नाम के जगह पर, थिओडोर हर्झल ने 200 यहूदियों की कांफ्रेंस का आयोजन किया था. और हर्झल के संदेश "कि हम यहूदियों ने अपने - अपने रहने के जगहों पर, और वहां की संस्कृति के साथ, शामिल होने के जबरदस्त प्रयास करने के बावजूद, हमें अत्यंत अपमानास्पद और हीनता की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया गया है. हमारे इसके लिए किए गए सभी प्रयास व्यर्थ गए. और इसलिए हम यहूदियों के लिए स्वतंत्र देश बनाने के अलावा अब कोई चारा नहीं है." और अपनी कल्पना को साकार करने के लिए उसने यहूदियों को आक्रामक होकर ऐसे नए जगह पर घुसकर उस प्रदेश में बसने के लिए आवाहन किया.
हर्झल की मृत्यु के 26 वर्षों के बाद 1930 में उसकी डायरी पहली बार प्रकाशित होने के बाद पता चला कि यूरोपीय देशों के यहूदियों के साथ वैसे ही अविश्वास और गुस्से का माहौल बना हुआ था, तो उसने उन्हें खदेड़े जाने के लिए एक अफवाह फैला दी कि "विश्व भर में एक करोड़ यहूदी गुप्तचर फैले हुए हैं. और उन्हें उन देशों में किसी भी तरह की विभाजनकारी या हिंसक कृतियां नहीं करनी चाहिए. ऐसा जिन देशों को लगता है. उन्होंने यहूदियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्रनिर्माण के लिए ही, चल रही झियोनिझम की संकल्पना को मानकर यहूदियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्रनिर्माण के लिए मदद करना चाहिए.
हर्झल के इस तरह के कपटपूर्ण लेखन की वजह से उसने आगे जाकर लिखा कि "यहूदियों ने फिलिस्तीन में घुसकर आहिस्ता-आहिस्ता स्थानीय लोगों की जमीन पर कब्जा कर के, उन्हें अपने पास रोजगार का अवसर नहीं मिलेगा, ऐसा माहौल बनाना है. और बिल्कुल यही तरीका अपनाने के बाद ही यहूदियों का आगमन फिलिस्तीन की जमीन पर अतिक्रमण के माध्यम से करने की रणनीति, थिओडोर हर्झल ने अपनी मृत्यु के पहले 1904 तक वर्तमान इजराइल की नींव डालने वाला हो गया.
उसके पहले से ही मध्य पूर्व एशिया में फिलिस्तीनियों का रहन-सहन अरबों के जैसा ही था. कुछ थोड़ी बहुत आबादी यहूदियों की भी थी. लेकिन अब यहूदियों ने सुनियोजित तरीके से फिलिस्तीन की भूमि पर, स्थानीय अरबों से जमीन को खरीदने का सिलसिला शुरू किया. और अपनी खरीदी हुई जमीन पर अरबों को काम पर नहीं रखना चाहिए, यह थिओडोर हर्झल कि सलाह का पूरा पालन करने हुए. 1878-1908 के दौरान यहूदियों ने 67-50 लाख हेक्टर जमीन में से, एक लाख से अधिक हेक्टेयर जमीन खरीदने के बाद अपना आधिपत्य जमाने की शुरुआत की. और बहुत ही जल्द जिओनिस्ट बैंक तथा यहूदियों का राष्ट्रीय स्तर पर एक न्यास बनाने के बाद जियोनिज्म के अनुसार सांस्कृतिक और सामाजिक आदान-प्रदान के कार्यक्रम सभी स्तरों पर शुरू किए गए. और यहूदियों की सेना तैयार करने की शुरुआत की.
और इस कारण बड़ी संख्या में यहूदियों के आने की शुरुआत हो गई. 1881 से 1900 के बीच इन उन्नीस सालों में 25 हजार यहूदी फिलिस्तीन में स्थानांतरित होकर आए, लेकिन फिलिस्तीन में रहना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वहां की आबोहवा में मच्छरों का उत्पात था. इस वजह से मलेरिया का प्रकोप से बचने के लिए, पेरिस स्थित बैरन एडमंड डी रॉथ्सचाइल्ड (Edmond de Rothschild)। उन्हें "ज्ञात उपकारी" ("HaNadiv HaYadu'a") के नाम से भी जाना जाता है ने काफी बड़ी मात्रा में मलेरिया नियंत्रण के लिए पैसे भेज दिए, जो सिलसिला आज भी जारी है. जब भी इजराइल के ऊपर किसी भी तरह का संकट या समस्या पैदा होती है, तो अमेरिका में बैठी हुई जिओनिस्ट लॉबी में से, यहूदियों की बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर हॉलीवुड तथा सबसे बड़े बैंकों के मालिक ज्यादातर यहूदी ही हैं. और वह अमेरिका में किसी भी दल की सरकार हो, उस पर दबाव बनवाकर अमेरिका को हर हालत में, इजराइल को मदद करने से लेकर, यूएनओ में उसके तरफ से अपने वीटो का अधिकार का, इस्तेमाल करते हुए इज़राइल के गुनाहों का समर्थन करती है. जैसे अभी चल रहा यूएनओ के अधिवेशन में अकेला अमेरिका गाजा में चल रहा नरसंहार का बेरहमी से समर्थन करते हुए इज़राइल को साथ दे रहा है.
अभी चल रहे यूएनओ के अधिवेशन में काफी यूरोपियन देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसका बेंजामिन नेतन्याहू ने सिर्फ विरोध ही नहीं किया हमास को खत्म करने की आड़ मे फिलिस्तीन का अस्तित्व ही खत्म करने का संकल्प दोहराया है.
ब्रिटेन, जिसका भारत जैसे विशाल देश पर शासन था, उस समय भारत में अंग्रेज़ों के विरोधी आंदोलनों के तेज़ होने से चिंतित था। इंग्लैंड को यह डर था कि रूस या फ्रांस कहीं भारत पर अपना प्रभाव स्थापित न कर लें। इसलिए भारत पर अपना आधिपत्य बनाये रखने के इरादे से उसने आसपास के क्षेत्रों में भी अपना प्रभुत्व कायम करने की नीति अपनाई; ऐसे में ईरान (इराण) सबसे अधिक उपयुक्त देश दिखाई दे रहा था। साथ ही, भारत में अपनी सेनाएँ शीघ्र पहुँचाने के लिये कौन-सा मार्ग सबसे तेज होगा — इस कारण से सुएज़ नहर का महत्व बढ़ा: नहर बनने पर इंग्लैंड से लगभग चालीस दिनों में सेनाएँ भारत पहुँच सकती थीं।
ईंधन की खोज के सिलसिले में आबादान (1916) में तेल के कुएँ मिलने से भी इंग्लैंड तथा अमेरिका को बहुत लाभ हुआ। प्रथम विश्व युद्ध (1918 में समाप्त) और द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ के समय से मध्य पूर्व और एशिया का भू-राजनीतिक महत्त्व बहुत बढ़ गया था। दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोपीय शक्तियों की क्षमताएँ क्षीण हो गयीं और अपने उपनिवेशों को नियंत्रित करना कठिन हो गया; साथ ही उन क्षेत्रों की जनता में स्वाधीनता की आकांक्षाएँ भी तीव्र हुईं — परिणामस्वरूप आज़ादी की लहरें उठीं और इजिप्त, इराक, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन व लिबिया जैसे राज्यों का उदय हुआ। इसी क्रम में बाल्फ़ोर घोषणा-पत्र के चलते इज़राइल की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।
झिओनिस्ट आन्दोलन के लंदन स्थित प्रवक्ता हाईम वाईझमन का झिओनिस्ट विचारों के प्रसार में बड़ा योगदान रहा। रूस में जन्मे वाईझमन की शिक्षा बर्लिन और स्विट्ज़रलैंड के क्राइबर्ग में हुई थी; उन्होंने रसायनशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। बर्लिन में अध्ययन काल में ही उन्हें झिओनिज़्म की पहचान हुई और थोड़े ही समय में उन्होंने विश्व-झिओनिस्ट संगठन की शाखाएँ रूस में खोलने में सफलता पाई। 1904 में मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में रसायनशास्त्र का अध्यापन शुरू करने के बाद उन्होंने वहीं भी झिओनिस्ट विचारों के प्रसार का कार्य तेज़ किया और ब्रिटिश प्रभावशाली राजनेताओं से संबंधों पर विशेष ध्यान दिया। मुद्दों को बिना संकोच और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की कला में वाईझमन निपुण थे। लंबा, दुबला और फ़्रेंच कट दाढ़ी के कारण उनका व्यक्तित्व कई लोगों को लेनिन जैसा भी लगा। प्रभावशाली लोगों के बीच अपनी छाप छोड़ने की कला में वे कुशल थे।
1906 के ब्रिटिश संसदीय चुनाव के दौरान उन्हें टोरी नेता आर्थर बैल्फ़र से मिलने का अवसर मिला; इसके बाद बैल्फ़र ने झिओनिस्ट कारणों के पक्ष में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। 1916 के प्रथम महायुद्ध के दौरान ब्रिटेन को अन्सिटोन नामक रसायन की तीव्र आवश्यकता थी, जो गोलियों और विस्फोटकों के निर्माण में काम आता था। फ्रांस के विरुद्ध चलाये जा रहे युद्ध के लिए अनुमानतः कम-से-कम 30,000 टन अन्सिटोन चाहिए थे। जब यह बात ब्रिटिश सैन्य नेतृत्व तक पहुँची, तो उस समय के भावी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने किसी अवसर पर यह जानकारी वाईझमन को दी। वाईझमन ने शीघ्र और सस्ती तकनीक से अन्सिटोन बनाकर ब्रिटिश सेना के शीर्ष अधिकारियों का सम्मान जीता। उन्हें पुरस्कार की पेशकश हुई, पर उन्होंने न खुले रूप में, बल्कि ठोस माँग के साथ कहा: “मुझे मेरी यहूदी कौम के लिये एक स्वतंत्र देश चाहिए।” वाईझमन ने अन्तर्मन ही में फिलिस्तीन की भूमि पर यहूदियों के लिये राष्ट्र बनाने की योजना बना ली थी।
1920 के सॅन-रेमो सम्मेलन के निर्णय के अनुसार फिलिस्तीन के भविष्य का निर्धारण करने का अधिकार ब्रिटिशों को दिया गया। ब्रिटेन के 28 वर्षों के फिलिस्तीन पर शासन के अंतिम चरण में, वहाँ की कुल जनसंख्या में 85% यानी लगभग 66.82 लाख लोग अरब थे, फिर भी ब्रिटेन ने निर्णय यहूदियों के पक्ष में करना शुरू कर दिया। आज की फिलिस्तीन समस्या इसी ऐतिहासिक क्रम का परिणाम है। वे ही अरबों की बहुलता के बावजूद फिलिस्तीन के बड़े हिस्से—वेस्ट बैंक से लेकर गाज़ा पट्टी तक—को एक तरह से “खुले कारागार” जैसा रहना पड़ा।
पिछले दो वर्षों में गाज़ा पट्टी पर इज़रायल की सैन्य कार्रवाइयों ने उसे लगभग तबाह कर देने का प्रयास प्रतीत कराया है। और वही अमेरिका, जो रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने का दावा करता है, उसके तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इज़राइल को युद्ध रोकने के लिये कहने के स्थान पर इसे समर्थन देते हुए कहा कि “गाज़ा खाली करो — मुझे वहां पर सर्जिकल ऑपरेशन करना है।” आश्चर्यजनक रूप से वह व्यक्ति नोबेल शांति पुरस्कार की अपेक्षाएँ भी रखता है।
डॉ. सुरेश खैरनार
28 सितंबर 2025, नागपुर.


