बदलती दुनिया में UN महासभा क्यों अहम है? 193 देशों के वैश्विक मंच की 80 साल की भूमिका और आज की चुनौतियाँ
Why is the UN General Assembly significant in a changing world? The 80-year role of this global forum of 193 nations and today's challenges.

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बदलती दुनिया में UN महासभा क्यों अहम है? 193 देशों के वैश्विक मंच की 80 साल की भूमिका और आज की चुनौतियाँ
- UN महासभा की अहमियत क्यों बनी हुई है? युद्ध, शांति और वैश्विक कूटनीति के 80 साल
- 80 साल बाद भी UN महासभा क्यों जरूरी है? 193 देशों के साझा मंच की बदलती भूमिका
संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थापना के आठ दशक बाद भी यह दुनिया के 193 देशों का सबसे व्यापक बहुपक्षीय मंच बना हुआ है। युद्ध और शांति, विकास, जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार, वैश्विक असमानता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, महासभा में सभी 193 सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व है और प्रत्येक देश का एक वोट होता है।
इस लेख में UN महासभा की बदलती भूमिका को 1945 से 2026 तक के ऐतिहासिक और समकालीन संदर्भ में समझाने की कोशिश की गई है। शीत युद्ध के दौरान कोरिया और स्वेज़ संकट से लेकर उपनिवेशवाद और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष तक, महासभा ने किस तरह अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया, इसका विश्लेषण किया गया है।
लेख में वैश्विक दक्षिण के उभार, नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की मांग, शीत युद्ध की समाप्ति, 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट और G7 तथा BRICS जैसे नए बहुपक्षीय मंचों के दौर में UN महासभा की बदलती भूमिका पर भी चर्चा है।
2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु संकट, महामारी की तैयारी और विकास संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है। 22 से 28 सितंबर 2026 के General Debate में दुनिया के नेता अपनी प्राथमिकताएँ रख रहे हैं। High-Level Week में जलवायु कार्रवाई, समुद्र-स्तर वृद्धि, महामारी की रोकथाम और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दे भी एजेंडे में हैं।
संयुक्त राष्ट्र समाचार की इस खबर से जानिए, बदलती विश्व व्यवस्था में UN महासभा क्यों अब भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का महत्वपूर्ण मंच बनी हुई है और छोटे तथा मध्यम आकार के देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा की क्या अहमियत है....
बदलती दुनिया में यूएन महासभा की अहमियत
स्थापना के आठ दशक बाद भी संयुक्त राष्ट्र महासभा दुनिया के 193 देशों का प्रमुख साझा मंच है, जहाँ युद्ध और शान्ति से लेकर विकास, जलवायु परिवर्तन और मानवाधिकारों तक, आज की बड़ी वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा होती है.
न्यूयॉर्क स्थित अन्तरराष्ट्रीय संकट समूह (International Crisis Group) में संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय कूटनीति के निदेशक रिचर्ड गोवन वर्षों से संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और उसके उतार-चढ़ाव का अध्ययन करते रहे हैं.
महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह से पहले यूएन न्यूज़ से बातचीत में उन्होंने बताया कि बढ़ते वैश्विक विभाजन और बदलती दुनिया के बावजूद आज भी महासभा अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति का अहम मंच क्यों बनी हुई है.
यूएन न्यूज़: 1945 में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय, उसके संस्थापकों ने महासभा के लिए कैसी भूमिका की कल्पना की थी?
रिचर्ड गोवन: मेरा मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों को उम्मीद थी कि ज़्यादातर अहम फ़ैसले सुरक्षा परिषद में होंगे. लेकिन संगठन के काम शुरू करते ही बड़ी शक्तियों के बीच मतभेद बढ़े और कई राजनैतिक बहसें महासभा की ओर चली गईं.
1940 के दशक और 1950 के शुरुआती वर्षों में फ़लस्तीन और कोरिया जैसे मुद्दों पर महासभा ने अहम भूमिका निभाई, जबकि शीत युद्ध के तनाव के कारण सुरक्षा परिषद अक्सर गतिरोध में फँसी रहती थी.
यूएन न्यूज़: अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बढ़ते तनाव और वैश्विक विभाजन के दौर में महासभा ने किस तरह काम किया?
रिचर्ड गोवन: 1940 और 1950 के दशक में महासभा के अधिकाँश देश अमेरिका के मित्र या सहयोगी थे. इसलिए जब अमेरिका और सोवियत संघ के मतभेदों से सुरक्षा परिषद में गतिरोध पैदा होता, तो अमेरिका अक्सर महासभा का रुख़ करता था.
जब कोरियाई युद्ध पर सुरक्षा परिषद में चर्चा सम्भव न रही, तो आगे की कार्रवाई पर बहस की अगुवाई महासभा ने की.
1956 में महासभा के सामने एक साथ दो बड़े संकट आए - स्वेज़ संकट और हंगरी पर सोवियत आक्रमण. स्वेज़ संकट को समाप्त करने में मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र के पहले (सैन्य) शान्तिरक्षा अभियान को मंज़ूरी भी महासभा ने ही दी. शीत युद्ध के दौरान संकट प्रबन्धन में यह उसकी सबसे अहम भूमिकाओं में से एक थी.
यूएन न्यूज़: 1960 के दशक में नए स्वतंत्र देशों के जुड़ने से महासभा की सदस्यता तेज़ी से बढ़ी. इससे उसकी प्राथमिकताएँ कैसे बदलीं?
रिचर्ड गोवन: महासभा का इतना विस्तार संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों की कल्पना से परे था. शायद उन्हें लगता था कि इसकी सदस्यता 80 या 90 देशों तक ही रहेगी.
नए स्वतंत्र देशों के लिए महासभा दुनिया के सामने अपनी आवाज़ रखने का अहम मंच बनी. इसी दौर में दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद जैसे मुद्दे उसकी प्राथमिकताओं में प्रमुखता से उभरे.
1960 के दशक में महासभा ने रंगभेद की निन्दा करते हुए कई प्रस्ताव पारित किए. 1970 के दशक में रंगभेद-शासित दक्षिण अफ़्रीका की सदस्यता भी निलम्बित कर दी गई. यह महासभा में ‘वैश्विक दक्षिण’ के एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरने का संकेत था.
यूएन न्यूज़: जैसे-जैसे विकासशील देश महासभा में अधिक संगठित और प्रभावशाली हुए, उन्होंने किस तरह संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकताएँ बदलीं?
रिचर्ड गोवन: विकासशील देशों ने महासभा का इस्तेमाल दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद, अफ़्रीका में पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन और फ़लस्तीन जैसे मुद्दे उठाने के लिए किया. 1970 के दशक में फ़लस्तीन का मुद्दा भी अधिक प्रमुखता से सामने आया.
वे वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को भी अन्यायपूर्ण मानते थे. 1974 में महासभा ने विकासशील देशों के लिए अधिक न्यायपूर्ण नई अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग वाला प्रस्ताव पारित किया.
इसके बाद 1970 और 1980 के दशकों में वैश्विक आर्थिक असमानताओं पर लम्बी और कठिन कूटनैतिक बातचीत चली.
यूएन न्यूज़: क्या इन देशों ने संयुक्त राष्ट्र से बाहर भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया?
रिचर्ड गोवन: शीत युद्ध के दौरान महासभा, औपनिवेशिक शासन से मुक्त देशों के लिए विश्व मंच पर अपनी आवाज़ उठाने का प्रमुख माध्यम थी. रंगभेद के ख़िलाफ़ महासभा के अभियान का व्यापक असर पड़ा और 1990 के दशक की शुरुआत में उस व्यवस्था के अन्त में भी उसका योगदान रहा.
नई, अधिक न्यायपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था तो नहीं बन सकी, लेकिन महासभा ने अनेक देशों को वैश्विक मुद्दों पर अपनी आवाज़ रखने का मंच ज़रूर दिया.
यूएन न्यूज़: शीत युद्ध के अन्त के बाद अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की नई उम्मीद जगी. महासभा और संयुक्त राष्ट्र के लिए क्या नए अवसर खुले?
रिचर्ड गोवन: शीत युद्ध के बाद राजनयिक अपने वैचारिक मतभेद कुछ हद तक पीछे छोड़कर संयुक्त राष्ट्र को मज़बूत करने पर अधिक रचनात्मक ढंग से काम कर सके.
शीत युद्ध के दौरान कम्युनिस्ट और पश्चिमी गुटों के राजनयिकों के बीच संवाद बेहद सीमित था. लेकिन उसके बाद सहयोग का नया दौर शुरू हुआ.
राजदूतों ने संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के साथ मिलकर नए विचार आगे बढ़ाए. इसी प्रक्रिया से शान्तिनिर्माण आयोग जैसी नई संस्थाएँ बनीं, जिसे 2005 में मंज़ूरी मिली.
यूएन न्यूज़: नई सहस्राब्दी में वैश्वीकरण तेज़ हुआ और नई आर्थिक, पर्यावरणीय व राजनैतिक चुनौतियाँ सामने आईं. 2000 के दशक में किन मुद्दों ने महासभा की भूमिका सबसे अधिक प्रभावित की?
रिचर्ड गोवन: 2008-2009 के वैश्विक वित्तीय संकट ने महासभा को बड़ा झटका दिया. कई सदस्य देशों का मानना था कि संकट से निपटने में संयुक्त राष्ट्र की अहम भूमिका होनी चाहिए.
लेकिन अमेरिका और अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने G20 के ज़रिए काम करना चुना, जिसकी वैश्विक दक्षिण के देशों ने आलोचना की.
इसी दौर में पर्यावरण और पृथ्वी की रक्षा के मुद्दे भी महासभा में अधिक प्रमुखता से उठने लगे.
यूएन न्यूज़: अगर आप 1945 में संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों से बात कर रहे होते, तो आज की महासभा की कौन-सी बात उन्हें सबसे अधिक चौंकाती?
रिचर्ड गोवन: संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से जुड़े कई प्रमुख लोगों को लगता था कि यह व्यवस्था पुराने साम्राज्यवादी ढाँचे को बनाए रखेगी.
लेकिन हुआ इसके उलट. महासभा ने देशों को उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने, विश्व मंच पर अपनी जगह बनाने और स्थापित शक्तियों को चुनौती देने का अवसर दिया.
उपनिवेशवाद के अन्त की प्रक्रिया में महासभा की केन्द्रीय भूमिका रही. अगर उस दौर में विंस्टन चर्चिल जैसे किसी नेता से कहा जाता कि आगे चलकर ऐसा होगा, तो वे बेहद हैरान होते.
यूएन न्यूज़: संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ के रूप में, आप आज न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की मौजूदगी को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?
रिचर्ड गोवन: आज दुनिया में G7 और BRICS जैसे कई कूटनैतिक समूह और मंच मौजूद हैं.
लेकिन बहुत से छोटे और मध्यम आकार के देशों के लिए महासभा अब भी वैश्विक मामलों पर अपनी बात रखने का मुख्य मंच है.
अक्सर कहा जाता है कि संयुक्त राष्ट्र का प्रभाव कम हो रहा है, लेकिन हर सितम्बर रिकॉर्ड संख्या में विश्व नेता महासभा को सम्बोधित करने न्यूयॉर्क पहुँचते हैं.
महासभा आज भी मायने रखती है. किसी तात्कालिक वैश्विक संकट पर प्रतिक्रिया देने के लिए भी दुनिया इसी मंच की ओर देखती है.
इसका कोई वास्तविक विकल्प नहीं है. महासभा को किसी और शहर में ले जाया जा सकता है, लेकिन कई नेताओं के लिए वैश्विक मीडिया और कूटनीति के केन्द्र न्यूयॉर्क में, अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुँचाने का अवसर ख़ास मायने रखता है.
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FAQs
1. UN महासभा क्या है?
UN महासभा संयुक्त राष्ट्र का मुख्य deliberative, policymaking और representative organ है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देश शामिल हैं और प्रत्येक सदस्य देश का एक वोट होता है।
2. UN महासभा की स्थापना कब हुई?
संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थापना 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत हुई थी। यह संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के साथ अस्तित्व में आई और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहुपक्षीय चर्चा का प्रमुख मंच बनी।
3. UN महासभा में कितने देश हैं?
UN महासभा में वर्तमान में 193 सदस्य देश हैं। प्रत्येक सदस्य देश को एक वोट प्राप्त है।
4. UN महासभा और UN Security Council में क्या अंतर है?
महासभा व्यापक बहुपक्षीय चर्चा और नीति-निर्माण का मंच है, जबकि सुरक्षा परिषद की प्राथमिक जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़ी है। महासभा सामान्यतः सिफारिशें करती है और बजट तथा संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न संस्थागत मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
5. क्या UN महासभा के प्रस्ताव बाध्यकारी होते हैं?
महासभा के अधिकांश प्रस्ताव सदस्य देशों के लिए सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी निर्णयों की तरह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते। हालांकि वे अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक सहमति, मानदंड और कूटनीतिक दबाव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
6. 1956 के स्वेज संकट में UN महासभा की क्या भूमिका थी?
1956 के स्वेज संकट के दौरान सुरक्षा परिषद में गतिरोध की स्थिति में महासभा ने कार्रवाई की और First UN Emergency Force (UNEF I) की स्थापना में भूमिका निभाई। इसे UN के पहले शांति अभियानों में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
7. UN महासभा वैश्विक दक्षिण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के नए स्वतंत्र देशों के लिए महासभा अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी राजनीतिक और आर्थिक चिंताओं को उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी। सदस्यता बढ़ने के साथ उपनिवेशवाद, रंगभेद, विकास और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे महासभा के एजेंडे में प्रमुख हुए।
8. क्या G7 और BRICS के बढ़ते प्रभाव से UN महासभा की भूमिका कम हो गई है?
G7 और BRICS जैसे मंच वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन वे UN महासभा की तरह 193 सदस्य देशों वाला सार्वभौमिक मंच नहीं हैं। UN के अनुसार, महासभा सभी सदस्य देशों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा और अपनी स्थिति रखने का अवसर देती है।
9. 2026 में UN महासभा के प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
2026 के High-Level Week में युद्ध और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जलवायु कार्रवाई, सतत विकास, समुद्र-स्तर वृद्धि, महामारी की रोकथाम और तैयारी, विकास का अधिकार तथा नस्लवाद जैसे मुद्दे प्रमुख एजेंडे में हैं।
10. 2026 में UN General Assembly General Debate कब हो रहा है?
81वें सत्र का General Debate 22 से 26 सितंबर और फिर 28 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क स्थित UN Headquarters में हो रहा है।
11. क्या UN महासभा आज भी महत्वपूर्ण है?
UN महासभा आज भी दुनिया के सभी 193 सदस्य देशों को एक ही बहुपक्षीय मंच पर लाने वाली संस्था है। इसका महत्व केवल तत्काल निर्णयों में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बहस, मानक-निर्माण, कूटनीतिक संवाद और वैश्विक राजनीतिक सहमति बनाने की प्रक्रिया में भी है।
12. UN महासभा वैश्विक संकटों पर क्या कर सकती है?
महासभा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकटों पर चर्चा, प्रस्ताव और सिफारिशें कर सकती है। यदि सुरक्षा परिषद किसी स्थायी सदस्य के नकारात्मक वोट के कारण शांति एवं सुरक्षा के मामले में कार्रवाई नहीं कर पाती, तो 1950 की “Uniting for Peace” व्यवस्था के तहत महासभा कुछ परिस्थितियों में सामूहिक उपायों की सिफारिश करने के लिए तत्काल बैठक कर सकती है।


